अलग-अलग व्यक्तिगत क्षमता में Arms License धारकों का धोखाधड़ी मामले में CrPC की धारा 223 के तहत संयुक्त विचारण संभव
HC ने आरोप तय करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को किया रद्द

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में Arms License के लिए कथित तौर पर फर्जी शपथ पत्र देने से जुड़े आपराधिक मामले में सह-अभियान के साथ संयुक्त विचारण और आरोप तय करने के आदेश को खारिज कर दिया है. न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ ने अमित कुमार उर्फ अमित दुबे की याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया. अदालत ने माना कि व्यक्तिगत क्षमता से अलग-अलग समय पर Arms License के लिए आवेदन करने वाले व्यक्तियों को एक ही लेनदेन का हिस्सा मानकर एक साथ नहीं परखा जा सकता.
यह पूरा मामला फर्रुखाबाद जिले के थाना मोहम्मदाबाद से जुड़ा है. जिला मजिस्ट्रेट फर्रुखाबाद और पुलिस अधीक्षक फतेहगढ़ की जांच रिपोर्ट व पत्रों के आधार पर 29 सितंबर 2021 को एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी.
शिकायत के अनुसार, आवेदक अमित कुमार उर्फ अमित दुबे और सह-अभियान अनुराग कुमार उर्फ अनुराग दुबे पर आरोप था कि उन्होंने विभिन्न बोर के Arms License (जैसे डबल बैरल 12 बोर बंदूक, एन.पी. 32 बोर रिवॉल्वर और एन.पी. 315 बोर राइफल) के लिए अलग-अलग तिथियों पर फर्जी जन्मतिथि और नोटरी शपथ पत्रों के जरिए Arms License के वास्ते आवेदन किए थे.
जांच के बाद, पुलिस ने दोनों अभियुक्तों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 419, 420, 467, 468 और 471 के तहत चार्जशीट दाखिल की थी. इसके बाद, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, फर्रुखाबाद ने 6 जनवरी 2022 को इस पर संज्ञान लिया और 16 जुलाई 2025 को दोनों के खिलाफ आरोप (charges) तय कर दिए गए. इसी आदेश को आवेदक ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी.
दोनों अलग-अलग व्यक्तिगत क्षमता में Arms License धारक
आवेदक के वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि आवेदक और सह-अभियान को एक साथ संयुक्त रूप से चार्ज और विचारित नहीं किया जा सकता, क्योंकि: वे अलग-अलग व्यक्तिगत क्षमता में Arms License धारक हैं. उनके Arms License आवेदन और दस्तावेज अलग-अलग तिथियों व समय पर प्रस्तुत किए गए थे, जो किसी एक ही आपराधिक लेनदेन का हिस्सा नहीं कहे जा सकते. आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 223 (जो वर्तमान में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के प्रावधानों से संबंधित है) के तहत ऐसे व्यक्तियों का संयुक्त विचारण वैध नहीं है.

बचाव पक्ष ने मम्मन खान बनाम स्टेट आफ हरिया और बलबीर बनाम हरियाणा राज्य जैसे महत्वपूर्ण सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब तक अपराधों में ‘समान लेनदेन’ या एक ही आपराधिक साजिश का स्पष्ट संबंध न हो, तब तक अलग-अलग व्यक्तियों को एक साथ नहीं घसीटा जा सकता. राज्य की ओर से पेश अपर महाधिवक्ता ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि याचिका विचारण के बेहद उन्नत चरण में दाखिल की गई है, जहाँ अभियोजन पक्ष के नौ गवाहों की गवाही पूरी हो चुकी है.
केवल तकनीकी आधार पर, बिना किसी वास्तविक नुकसान या पूर्वाग्रह (prejudice) को साबित किए, आरोप तय करने के आदेश को खारिज नहीं किया जा सकता.तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों (जैसे सुशील कुमार तिवारी बनाम हरे राम साह) के अनुसार, संयुक्त विचारण की प्रक्रिया में यदि कोई मामूली अनियमितता भी हो, तो भी यह स्वतः ही पूरे मुकदमे को शून्य नहीं कर देती.
दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्रियों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद, उच्च न्यायालय ने माना कि हालांकि आवेदक और सह-अभियान एक ही प्राथमिकी से जुड़े हैं, लेकिन Arms License प्राप्त करने के लिए झूठे शपथ पत्र दाखिल करने का कार्य अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्र रूप से किया गया था. इन्हें एक ही अपराध का एकीकृत हिस्सा नहीं माना जा सकता.
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के आलोक में, विभिन्न व्यक्तियों द्वारा अलग-अलग समय पर किए गए ऐसे कृत्यों को ‘समान लेनदेन’ के दायरे में नहीं रखा जा सकता. तदनुसार, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, फर्रुखाबाद द्वारा 16 जुलाई 2025 को पारित आरोप तय करने का आदेश कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है. अदालत ने आवेदक द्वारा दायर आवेदन (U/S 528 BNSS) को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया.