हादसा सड़क पर करंट के कारण हुआ तो बिजली विभाग के अधिकारियों की Negligence मानी जाएगी, 26.65 लाख रुपये मुआवजा भुगतान का आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद किया ट्रायल कोर्ट का फैसला, घटना के दिन से अंतिम भुगतान की तिथि तक 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देना होगा

एक बार जब यह साबित हो जाता है कि हादसा सड़क पर चलते समय बिजली के झटके के कारण हुई थी तो संबंधित अधिकारियों को निश्चित रूप से Negligence माना जाना चाहिए. वादी (पप्पू) प्रतिवादी के ट्रांसफार्मर से बिजली का झटका लगने के कारण हुई चोटों के लिए कुल ₹ 26,65,000 के मुआवजे का हकदार है. वह मुआवजा राशि पर 6% प्रति वर्ष की दर से, केस दायर करने की तिथि यानी 30.5.1997 से लेकर प्रतिवादी से राशि की वसूली होने तक मुकदमे के दौरान और भविष्य के ब्याज का भी हकदार है.
निचली अदालत ने मुकदमे को खारिज करने में गलती की है इसलिए इसे रद्द किया जाता है. अपील को पूरे खर्च के साथ स्वीकार किया जाता है. यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस संदीप जैन ने आगरा के पप्पू की याचिका पर सुनाया है. कोर्ट ने प्रतिवादी को निर्देश दिया है कि वह एक महीने के भीतर उपरोक्त राशि का भुगतान करे. ऐसा न करने पर वादी डिक्री की राशि की वसूली के लिए प्रतिवादी के खिलाफ निष्पादन की कार्यवाही शुरू करने के लिए स्वतंत्र होगा.
चूंकि वादी स्थायी रूप से दिव्यांग है और दूसरों पर निर्भर है, इसलिए प्रतिवादी से वसूल की गई मुआवजे की राशि, ब्याज सहित, निचली अदालत द्वारा किसी भी राष्ट्रीयकृत बैंक या डाकघर के एक फिक्स्ड डिपॉजिट खाते में जमा की जाएगी, जिस पर अधिकतम मासिक ब्याज मिलता हो, और जिसे वादी अपनी आजीविका के लिए हर महीने निकाल सकेगा. अदालत की अनुमति के बिना, वादी फिक्स्ड डिपॉज़िट से कोई भी राशि नहीं निकाल सकेगा.
चिकित्सा उपचार और अन्य विशेष परिस्थितियों के लिए, वादी को फिक्स्ड डिपॉजिट से राशि निकालने की अनुमति होगी लेकिन इसके लिए निचली अदालत की अनुमति आवश्यक होगी. वादी अनपढ़ और गरीब है, इसलिए डिक्री को लागू करवाने के लिए वह संबंधित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सहायता ले सकता है. संबंधित जिला न्यायाधीश को निर्देश दिया जाता है कि वे इस मामले में वादी की सहायता करें, ताकि डिक्री का लाभ प्राप्त करने के लिए उसे लूटा न जाए.
यह घटना वादी की अपनी लापरवाही (Negligence) के कारण हुई
यह अपील वादी पप्पू द्वारा CPC की धारा 96 के तहत, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, कोर्ट नंबर 7, आगरा द्वारा O.S. संख्या 171/2003 (पप्पू बनाम उत्तर प्रदेश बिजली बोर्ड) में 29.10.2005 को पारित किए गए निर्णय और डिक्री के विरुद्ध दायर की गई थी. ट्रायल कोर्ट ने वादी का वह मुकदमा खारिज कर दिया गया था. केस में उसने 01.03.1997 को ट्रांसफार्मर से बिजली का झटका (Negligence) लगने के कारण हुई चोटों के लिए मुआवजे की मांग की थी. मुकदमे को इस आधार पर खारिज किया गया कि यह घटना वादी की अपनी लापरवाही (Negligence) के कारण हुई थी.
तथ्यों के अनुसार वादी-अपीलकर्ता पप्पू ने अपने अभिभावक हरि सिंह के माध्यम से, प्रतिवादी यूपी राज्य बिजली बोर्ड के विरुद्ध O.S. संख्या 171/2003 दायर किया. इसमें यह अभिकथन किया गया कि वह लगभग 7 वर्ष का था, जो कपिल देव शास्त्री जूनियर हाई स्कूल, नगला पाड़ी, आगरा में दूसरी कक्षा में पढ़ रहा था.
प्राथमिक विद्यालय की इमारत के गेट के पास एक खुले मैदान में 11,000/400 वोल्ट और 100 KVA क्षमता का एक ट्रांसफार्मर लगाया था. विद्यालय की इमारत की सीढ़ियों और उस स्थान के बीच की दूरी, जहाँ उक्त ट्रांसफार्मर स्थापित था, 3 फीट से अधिक नहीं थी. ट्रांसफार्मर को खुले में रखा गया था और उसकी सुरक्षा के लिए कोई बाड़, बैरिकेडिंग या अन्य कोई साधन मौजूद नहीं था.

01.03.1997 को शाम लगभग 5 बजे, जब वह स्कूल की इमारत के पास अन्य बच्चों के साथ खेल रहा था, तब उसका संपर्क गलती (Negligence) से ट्रांसफॉर्मर के 11 KV वाले हिस्से से हो गया. बिजली का झटका लगने से उसके दोनों हाथ और बांहें बुरी तरह जल गईं. जिसके चलते वादी के दोनों हाथ और बांहें काटनी पड़ीं. इस दुर्घटना के संबंध में आगरा जिले के न्यू आगरा पुलिस स्टेशन में एक FIR दर्ज कराई गई थी.
वादी का यह विशेष मामला है कि यह दुर्घटना प्रतिवादी के अधिकारियों द्वारा की गई गंभीर और अकल्पनीय लापरवाही (Negligence) के कारण हुई थी. वादी ने अपने दोनों हाथ खो दिए हैं, जिसके कारण उसका जीवन अत्यंत दयनीय हो गया है. वह न तो खाना खा सकता है, न अपने कपड़े पहन सकता है, न अपने हाथ-मुंह धो सकता है या दांत ब्रश कर सकता है, और न ही अपनी सुबह की दैनिक क्रियाएं कर सकता है.
वादी ने प्रतिवादी के ट्रांसफ़ॉर्मर से बिजली का झटका लगने के कारण उसे हुई चोटों के लिए ₹ 58.47 लाख के मुआवजे का दावा किया. प्रतिवादी ने अपने लिखित बयान में वादी के दावों को टालमटोल करते हुए नकार दिया. यह दावा किया गया कि ट्रांसफार्मर बोर्ड के नियमों और विनियमों के अनुसार ही लगाया गया था. इस बात से साफ तौर पर इनकार किया गया कि प्रतिवादी के अधिकारियों ने कभी भी कानून के तहत जरूरी कोई सुरक्षा उपाय नहीं किए.
यह स्वीकार किया गया कि वादी की अपनी लापरवाही (Negligence) के कारण एक घटना हुई, जिसमें वादी को बिजली का झटका लगा. यह दावा किया गया कि कथित दुर्घटना में प्रतिवादी की ओर से कोई लापरवाही (Negligence) नहीं थी; यह दुर्घटना वादी की अपनी लापरवाही (Negligence) और गलती के कारण हुई थी. इसलिए, वादी की ओर से हुई चूक के लिए प्रतिवादी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और प्रतिवादी वादी द्वारा मांगे गए किसी भी हर्जाने का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं था.
दावा किया गया कि वादी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली के समक्ष शिकायत संख्या 9484/24/97-98 दायर की थी. आयोग ने अपने आदेश दिनांक 20.5.1999 के माध्यम से प्रतिवादी को निर्देश दिया कि वह वादी को पहले से भुगतान की गई ₹20,000/- और ₹5,000/- की राशि के अतिरिक्त ₹1 लाख का भुगतान करे.
उक्त आदेश के अनुपालन में, प्रतिवादी ने 4.7.2000 को ₹1 लाख का भुगतान किया, जिस पर वादी को मासिक ब्याज मिल रहा था. प्रतिवादी ने शिष्टाचार के तौर पर और मानवीय आधार पर सांत्वना मुआवजे के रूप में वादी को ₹1.25 लाख की राशि का भुगतान किया है, जिसे वादी ने स्वीकार कर लिया है.
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दावा किया गया कि वादी को मौजूदा खतरे की जानकारी थी, और वह उचित रूप से ऐसे खतरे या प्रतिवादी की कथित लापरवाही (Negligence) से बच सकता था. वादी का यह कानूनी कर्तव्य था कि वह अपनी सुरक्षा का ध्यान रखे, जो उसने नहीं रखा. प्रतिवादी कथित घटना के लिए उत्तरदायी नहीं था और परिणामस्वरूप, उस पर वादी को कथित क्षतिपूर्ति का भुगतान करने का कोई कानूनी दायित्व नहीं था. यह वाद ‘भारतीय विद्युत अधिनियम’ की धारा 33 के तहत वर्जित था. यह वाद गलत आधार पर प्रस्तुत किया गया था और व्यय सहित खारिज किए जाने योग्य था.
FIRST APPEAL No. – 713 of 2021 Pappu V/s U.P. State Electricity Board Its Principal Officer
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