भले ही Document के निष्पादन पर कोई विवाद न हो फिर भी दस्तावेज की सामग्री हमेशा जिरह का विषय हो सकती है, 3 की बर्खास्तगी रद
हैंड राइटिंग का मिलान न होने पर बैंक प्रबंधन ने कर दिया था बर्खास्त, हाई कोर्ट ने बैंक को दी नए सिरे से कार्रवाई की छूट

भले ही Document के निष्पादन पर कोई विवाद न हो फिर भी Document की सामग्री हमेशा जिरह का विषय हो सकती है ताकि हस्तलेख विशेषज्ञ के निष्कर्ष को गलत साबित किया जा सके और यह अनिवार्य रूप से ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ का हिस्सा है. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विक्रम डी चौहान की बेंच ने स्टेट बैंक के दो कर्मचारियों की सेवा से बर्खास्तगी के आदेश को रद कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं ऐसे में बैंक नए सिरे से अनुशासनात्मक कार्यवाही कर सकता है. बैंक को यह स्वतंत्रता भी होगी कि वह याचिकाकर्ताओं की बहाली के बाद उन्हें निलंबित कर दे.
यदि बैंक नए सिरे से जांच करने का निर्णय लेता है तो लिखित परीक्षा के समय याचिकाकर्ताओं की पहचान से संबंधित सभी सामग्रियों (Document) जिसमें फोटोग्राफ, अंगूठे का निशान और हस्ताक्षर शामिल हैं पर विचार करेगा. यह रिट याचिका सचिन कुमार और दो अन्य की तरफ से दाखिल की गयी थी. उन्हें बैंक की सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था. याचिका में क्षेत्रीय प्रबंधक भारतीय स्टेट बैंक क्षेत्रीय व्यापार कार्यालय मेरठ और उप महाप्रबंधक प्रशासनिक कार्यालय नोएडा द्वारा दिये गये आदेश को चुनौती दी गयी थी.
मामले के तथ्यों के अनुसार भारतीय स्टेट बैंक में क्लर्क के पद पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया था. याचिकाकर्ता सचिन कुमार और संजीव कुमार ने सामान्य श्रेणी के तहत जबकि विपिन कुमार ने अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत आवेदन किया. तीनों परीक्षा में शामिल हुए. इसमें सफल होने के बाद उन्हें इंटरव्यू के लिए कॉल किया गया. इसमें भी सफल होने के बाद तीनों को 2010 में अलग अलग ब्रांचों में नियुक्ति दे दी गयी. छह महीने का प्रोबेशन पीरियड पूरा होने के बाद उन्हें बैंक में स्थायी भी कर दिया गया.
नोटिस Document में धोखाधड़ी से नौकरी प्राप्त करने का आरोप लगाया गया था
2013 में याचिकाकर्ता संख्या 1 और 3 को एक नोटिस जारी किया गया. इसमें धोखाधड़ी (Document) से नौकरी प्राप्त करने का आरोप लगाया गया था. याचिकाकर्ताओं ने इसका जवाब दे दिया. इसके बाद उन्हें सस्पेंड कर दिया गया. निलंबन आदेश से व्यथित होकर याचियों ने रिट-ए संख्या 19868/2013 (सचिन कुमार और 2 अन्य बनाम एसबीआई अध्यक्ष के माध्यम से और 2 अन्य) दायर की. उक्त रिट याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने तीन महीने में अनुशासनात्मक कार्यवाही पूरी कर लेने का आदेश दिया.
इसके बाद अनुशासनात्मक कार्यवाही के अंतर्गत याचिकाकर्ताओं को आरोप-पत्र जारी किया गया. आरोप था कि उन्होंने परीक्षा में अनुचित साधनों/छद्म-रूप (Document) धारण का सहारा लेकर बैंक सेवा में नियुक्ति प्राप्त की थी. याचिकाकर्ताओं ने आरोप-पत्र (Document) का उत्तर प्रस्तुत करते हुए आरोपों का खंडन किया.
उन्होंने शिकायतकर्ता का विवरण तथा उस शिकायत की प्रति (Document) भी मांगी, जिसके आधार पर उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही प्रारंभ की गई थी. याचिकाकर्ताओं ने शिकायतकर्ता के साथ-साथ उस निरीक्षक की भी प्रति-परीक्षा कराने की मांग की, जिसके समक्ष वे लिखित परीक्षा में उपस्थित हुए थे. इसके पश्चात बैंक ने आरोपों की जांच हेतु जांच अधिकारी नियुक्त किया.

याचिकाकर्ताओं ने अनुशासनात्मक/जांच कार्यवाही में भाग लिया. इसके बाद कारण बताओ नोटिस (Document) जारी किया गया. इसका उत्तर देने के बाद याचिकाकर्ताओं को सेवा से बर्खास्त कर दिया. आदेश से व्यथित होकर याचिकाकर्ताओं ने विभागीय अधिकारी के समक्ष अपील दायर की. अपील को निरस्त कर दिया गया.
कोर्ट में पक्ष रखते हुए याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि विभागीय कार्यवाही के दौरान विभाग की ओर से कोई भी गवाह पेश नहीं किया गया. उन्होंने अपील में हस्तलेख विशेषज्ञ का प्रति-परीक्षण करने की अनुमति मांगी थी जो नहीं दी गई.
अपीलीय प्राधिकारी ने मांग को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट की प्रामाणिकता और वास्तविकता (Document) को याचिकाकर्ताओं द्वारा नकारा नहीं गया था, इसलिए हस्तलेख विशेषज्ञ का प्रति-परीक्षण करने की कोई आवश्यकता नहीं थी. अधिवक्ता ने कहा कि हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट केवल एक राय होती है.
लिखित परीक्षा बैंक के भर्ती विभाग द्वारा आयोजित की गई थी और निरीक्षक वहाँ उपस्थित था. प्रवेश पत्र (Document) पर भी निरीक्षक की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए गए थे. ऐसे में विभाग के लिए अनिवार्य था कि वह निरीक्षक को एक विभागीय गवाह के रूप में परीक्षित करता. प्रवेश पत्र (Document) पर अंगूठे का निशान भी था जो निरीक्षक की उपस्थिति में ही लिया गया था, यह भी एक ऐसा संकेतक कारक हो सकता था जिस पर विचार करके यह तय किया जा सकता था कि याचिकाकर्ताओं ने लिखित परीक्षा में भाग लिया था या नहीं.
बैंक के वकील ने इस रिट याचिका का विरोध किया है और यह दलील दी कि अनुशासनात्मक कार्यवाही में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लिखावट विशेषज्ञ की रिपोर्ट Document ही एकमात्र साक्ष्य के रूप में पाई गई थी और इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं की सेवाएँ समाप्त कर दी गई हैं तथा उनकी अपील खारिज कर दी गई है.
याचिकाकर्ताओं ने लिखावट विशेषज्ञ की रिपोर्ट (Document) की प्रामाणिकता और सत्यता को स्वीकार कर लिया है. जब एक बार किसी दस्तावेज (Document) को प्रामाणिक और सत्य मान लिया गया हो तो फिर लिखावट विशेषज्ञ से जिरह करने की आवश्यकता ही उत्पन्न नहीं होती. बर्खास्तगी आदेश पूरी तरह से फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी द्वारा जारी हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट (Document) पर भरोसा करते हुए पारित किया गया था.
केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा’मुरारी लाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ (AIR 1980 SC 531) मामले में लिखावट विशेषज्ञ की रिपोर्ट के महत्व के संबंध में टिप्पणी का भी जिक्र किया गया:-
“हमारा यह पक्का मत है कि ऐसा कोई कानून का नियम, या समझदारी का नियम नहीं है (जो कानून का नियम बन गया हो), जिसके अनुसार किसी लिखावट विशेषज्ञ की राय को कभी भी तब तक नहीं माना जाना चाहिए, जब तक कि उसकी काफी हद तक पुष्टि न हो जाए. लेकिन, लिखावट की पहचान करने वाले विज्ञान की अपूर्ण प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, जैसा कि हमने पहले बताया था, हमारा दृष्टिकोण सावधानी भरा होना चाहिए. राय के कारणों की सावधानीपूर्वक जांच और परीक्षण किया जाना चाहिए.
अन्य सभी प्रासंगिक सबूतों पर विचार किया जाना चाहिए. उचित मामलों में, पुष्टि की मांग की जा सकती है. जिन मामलों में राय के कारण ठोस होते हैं और कोई ऐसा विश्वसनीय सबूत नहीं होता जो उस पर संदेह पैदा करे, वहां लिखावट विशेषज्ञ की बिना पुष्टि वाली गवाही को स्वीकार किया जा सकता है. ऐसे मामले पर कोई भी कठोर नियम नहीं हो सकता, जो अंततः, गवाही के महत्व के प्रश्न से अधिक कुछ नहीं है. हमने यह सब इसलिए कहा है क्योंकि यह तर्क अक्सर निचली अदालतों में सुनने को मिलता है, और इस न्यायालय के निर्णयों से संदर्भ से हटकर लिए गए वाक्यों को अक्सर पेश किया जाता है.”
लिखावट विशेषज्ञ की राय (Document) कोई पूर्ण सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह तुलना और अवलोकन के विज्ञान पर आधारित है. अनुशासनात्मक कार्यवाही में, जिस प्रश्न की जांच की जाती है, उसका उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि क्या कर्मचारी किसी ऐसे कदाचार का दोषी है जिसके लिए उसे दंडित किया जाना उचित हो. सबूत का मानक ‘संभावनाओं की प्रधानता’ पर आधारित होता है.
यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा कि वे कर्मचारी को दंडित करने के लिए पर्याप्त हैं या नहीं. यह प्रश्न कि क्या लिखावट विशेषज्ञ की रिपोर्ट (Document) ही कर्मचारी के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने और अनुशासनात्मक कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त हो सकती है, प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.
सुनवाई के दौरान पेश किया गया तथ्य
कोर्ट ने माना कि यह एक स्वीकृत तथ्य है कि अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान, लिखावट विशेषज्ञ की कभी भी जांच (गवाही) नहीं की गई. इसके अलावा, उक्त विशेषज्ञ से जिरह करने की अनुमति भी याचिकाकर्ताओं को नहीं दी गई. साथ ही, जिस कॉल लेटर (Document) पर याचिकाकर्ताओं के विवादित हस्ताक्षर की जांच लिखावट विशेषज्ञ द्वारा की गई थी, उस पर याचिकाकर्ताओं की तस्वीर और अंगूठे का निशान भी मौजूद था.
इसे भी पढ़ें…. ‘अपराध के किसी भी कृत्य के लिए कंपनी या फर्म के बोर्ड ऑफ Director ही जिम्मेदार’
लिखित परीक्षा के लिए जारी किए गए उक्त कॉल लेटर में यह भी कहा गया था कि याचिकाकर्ताओं का अंगूठे का निशान निरीक्षक की उपस्थिति में लगाया गया था और कॉल लेटर पर याचिकाकर्ताओं के हस्ताक्षर भी निरीक्षक की उपस्थिति में ही लिए गए थे. इसके अलावा, इनविजिलेटर ने यह भी सर्टिफाई किया है कि याचिकाकर्ताओं के हस्ताक्षर (Document) उसकी मौजूदगी में लिए गए थे और लिखित परीक्षा के कॉल लेटर पर याचिकाकर्ताओं की फोटो को इनविजिलेटर ने वेरिफाई किया था.
बैंक के वकील ने इस बारे में कोई सफाई नहीं दी है कि विभागीय कार्यवाही में इनविजिलेटर को गवाह के तौर पर क्यों नहीं पेश किया गया. इस बात की भी कोई सफाई नहीं दी है कि याचिकाकर्ताओं की फोटो को इनविजिलेटर ने वेरिफाई (Document) किया था. बैंक के वकील ने इस कोर्ट के सामने इस बात पर कोई विवाद नहीं उठाया है कि कॉल लेटर पर लगी फोटो याचिकाकर्ताओं की नहीं है.
कोर्ट ने कहा कि यह ध्यान देना जरूरी है कि विवादित आदेश को पारित करते समय, निष्कर्ष हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट पर आधारित थे जबकि जाँच अधिकारी या अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा कोई स्वतंत्र निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया था. अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने विवादित आदेश पारित करते समय, कॉल लेटर (Document) पर याचिकाकर्ताओं के अंगूठे के निशान और फ़ोटो के प्रभाव पर भी विचार नहीं किया.
इसे भी पढ़ें…. Family Court के आदेश की समीक्षा नहीं कर सकता ग्राम न्यायालय
बैंकों में भर्ती के लिए होने वाली परीक्षा निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए. यदि परीक्षा में कोई गड़बड़ी पाई जाती है, तो यह जाँच निकाय का काम था कि वह इसकी रिपोर्ट करे. परीक्षा प्रक्रिया में उम्मीदवार की पहचान वेरिफाई करने के लिए कई तंत्र (Document) शामिल किए गए थे, क्योंकि कॉल लेटर में याचिकाकर्ताओं की फोटो (जिसे इनविजिलेटर ने वेरिफाई किया था), अंगूठे के निशान और हस्ताक्षर मौजूद थे.
बर्खास्तगी का विवादित आदेश, हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट के आधार पर, कॉल लेटर पर याचिकाकर्ताओं के हस्ताक्षर और नमूना हस्ताक्षरों के बीच पाए गए अंतर पर भरोसा करते हुए पारित किया गया है. अन्य दो कारक तस्वीर और अंगूठे का निशान (Document), जो याचिकाकर्ताओं की पहचान के कारक भी थे, उन पर विवादित आदेश पारित करते समय विचार नहीं किया गया.
अनुशासनात्मक कार्यवाही में, “संभावनाओं की प्रबलता” सबूत का वह कानूनी मानक है जिसका उपयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि कोई कर्मचारी कदाचार का दोषी है या नहीं. इसका अर्थ है कि प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर यह अधिक संभावित है कि कथित घटना घटित हुई थी. निर्णय सभी उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के सावधानीपूर्वक मूल्यांकन पर आधारित होना चाहिए. तराजू पूरी तरह से संतुलित होना चाहिए और कदाचार के निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए सभी साक्ष्यों, तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए.
बेंच ने फैसले में कहा
बैंक के लिए यह अनिवार्य था कि वह लिखित परीक्षा के समय याचिकाकर्ताओं की उपस्थिति के संबंध में उनकी पहचान के सभी कारकों/माध्यमों को सत्यापित करके लिखित परीक्षा में याचिकाकर्ताओं की भागीदारी (Document) को सत्यापित करता. याचिकाकर्ताओं की उम्मीदवारी पर संदेह करके बैंक वास्तव में अपनी ही परीक्षा प्रक्रिया और बैंक द्वारा नियुक्त निरीक्षक द्वारा किए गए Document सत्यापन को चुनौती दे रहा है. प्रतिवादी-बैंक का यह मामला नहीं है कि भर्ती विभाग ने परीक्षा प्रक्रिया में किसी भी दोष की सूचना दी हो. अनुशासनात्मक कार्यवाही में हस्तलेख विशेषज्ञ की जांच नहीं की गई थी.
अनुशासनात्मक कार्यवाही का दायरा इतना व्यापक होना चाहिए था कि वह बैंक द्वारा आयोजित लिखित परीक्षा में याचिकाकर्ताओं की भागीदारी की पहचान से संबंधित सभी साक्ष्यों, सामग्री, तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार कर सके. वर्तमान मामले में केवल हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट (Document) पर ही विचार किया गया है जो कि केवल एक राय के स्वरूप की है और जिसकी प्रति-परीक्षा भी नहीं की गई थी.
WRIT – A No. – 38777 of 2015 Sachin Kumar and 2 others Versus Union of India and 3 others