गैंगस्टर एक्ट के तहत सिर्फ Gang Chart में मामले होने से अपराध साबित नहीं होता, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द की 24 साल पुरानी कार्यवाही

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि गैंगस्टर एक्ट के तहत सिर्फ Gang Chart में मामले होने से अपराध साबित नहीं होता. इस कमेंट के साथ साथ कोर्ट ने वर्ष 2002 से लंबित गैंगस्टर एक्ट के तहत चल रही एक 24 साल पुरानी आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह से रद्द कर दिया है. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल Gang Chart में किसी व्यक्ति का नाम होने या आपराधिक मामलों की सूची होने मात्र से गैंगस्टर एक्ट के तहत अपराध सिद्ध नहीं माना जा सकता, जब तक कि निष्पक्ष और ठोस जांच से यह साबित न हो कि उन कृत्यों का उद्देश्य समाज में भय फैलाना या अनुचित लाभ अर्जित करना था.
यह फैसला जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने दिनेश उर्फ टीटू एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (आवेदन संख्या 482 नंबर 8313 वर्ष 2002) के मामले में सुनवाई करते हुए सुनाया. मामले की शुरुआत 8 नवंबर 2001 को हुई थी, जब मथुरा जिले के गोवर्धन थाने के तत्कालीन थानाध्यक्ष अजय कुमार अग्रवाल ने जिलाधिकारी (DM) द्वारा अनुमोदित Gang Chart के आधार पर मामला दर्ज कराया था.
पुलिस का आरोप था कि दिनेश उर्फ टीटू एक संगठित गिरोह का सरगना (गैंग लीडर) है और श्रीकांत उर्फ लाले, चक्रवर्ती, शंकर तथा गणेश उसके सक्रिय सदस्य हैं. आरोप लगाया गया था कि यह गिरोह आम जनता को डरा-धमकाकर असामाजिक गतिविधियों में लिप्त है और अवैध तरीके से धन अर्जित करता है.
पुलिस ने Gang Chart में चार पुराने मामलों का हवाला देते हुए एफआईआर दर्ज की
पुलिस ने Gang Chart में चार पुराने मामलों (केस क्राइम नंबर 153/2001, 309/2001, 199/2001 और 260A/2000) का हवाला देते हुए उत्तर प्रदेश गिरोहबंद एवं असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1986 की धारा 2/3 के तहत एफआईआर दर्ज की. जांच के बाद विशेष न्यायाधीश (गैंगस्टर एक्ट), आगरा की अदालत में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया गया, जिस पर 29 जुलाई 2002 को अदालत ने संज्ञान लिया था.
आवेदकों के अधिवक्ताओं ने उच्च न्यायालय के समक्ष तर्क दिया कि जिन आधारभूत मामलों के बल पर गैंगस्टर एक्ट की कार्यवाही शुरू की गई थी, उनमें से तीन मामलों (153/2001, 199/2001 और 260A/2000) में आरोपी 2003, 2004 और 2024 के दौरान सक्षम आपराधिक न्यायालयों द्वारा बरी किए जा चुके हैं. केवल एक मामला (केस क्राइम नंबर 309/2001) ऐसा बचा था, जिसमें आरोपियों को आईपीसी की धारा 323/34 के तहत मामूली सजा हुई थी और बाकी गंभीर धाराओं (जैसे धारा 392 व 506 आईपीसी) से वे अपीलीय अदालत (अपर सत्र न्यायाधीश, मथुरा) द्वारा बरी हो चुके हैं.

इस सजा के खिलाफ भी उच्च न्यायालय में आपराधिक पुनरीक्षण (Criminal Revision No. 874 of 2017) विचाराधीन है. बचाव पक्ष का कहना था कि सिर्फ धारा 323 (मामूली मारपीट) के तहत दोषसिद्धि के आधार पर किसी व्यक्ति को ‘गैंगस्टर’नहीं ठहराया जा सकता. ऐसी स्थिति में मुकदमे को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग है.
राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) ने आवेदकों की याचिका का विरोध किया. अभियोजन का तर्क था कि जब वर्ष 2002 में गैंगस्टर एक्ट के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी, उस समय Gang Chart में दर्ज सभी मुकदमे लंबित थे. इसलिए बाद में हुई बरी की कार्रवाइयां शुरुआती प्रक्रिया को अवैध नहीं बना सकतीं. राज्य का कहना था कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की संतुष्टि के बाद ही Gang Chart को मंजूरी दी गई थी, अतः इसमें अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है.
जस्टिस संदीप जैन की पीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद मामले में कानून के कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित किया:
- सर्वोच्च न्यायालय के नजीर का हवाला: अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों विनोद बिहारी लाल बनाम यूपी राज्य (2025) और शिव प्रताप सिंह उर्फ चीनू बनाम यूपी राज्य (2026) का हवाला दिया. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि गैंगस्टर एक्ट अपने आप में कोई अलग अपराध निर्मित नहीं करता, बल्कि यह केवल किसी व्यक्ति के ‘गैंगस्टर’ होने की स्थिति को परिभाषित करता है.
- स्वतंत्र विवेक का अभाव: उच्च न्यायालय ने पाया कि Gang Chart तैयार करने और उसे मंजूरी देने में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों (CO, SSP) और जिलाधिकारी ने अपने स्वतंत्र विवेक का प्रयोग नहीं किया था. Gang Chart को केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता की तरह आगे बढ़ा दिया गया था, जो कि नियमों का उल्लंघन है.
- गैंग की वैधानिक परिभाषा: कोर्ट ने दोहराया कि केवल आपराधिक मामले दर्ज होने से कोई गिरोह नहीं बन जाता. धारा 2(b) के तहत यह साबित होना अनिवार्य है कि वह कृत्य सार्वजनिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने या अवैध आर्थिक व भौतिक लाभ कमाने के उद्देश्य से हिंसा, धमकी या दबाव के बल पर किया गया था. धारा 323 आईपीसी का अपराध इस श्रेणी में नहीं आता.
- बरी होने का प्रभाव: भले ही यूपी गैंगस्टर नियम 2021 रेट्रोस्पेक्टिव (पिछली तारीख से) लागू न होते हों, लेकिन प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के तहत आधारभूत मुकदमों में बरी होना गैंगस्टर मुकदमे की नींव को कमजोर करता है.
उच्च न्यायालय ने माना कि जब आधारभूत मामलों में से तीन में आरोपी बरी हो चुके हैं और चौथे मामले में केवल मामूली धारा के तहत मामला बनता है, तब गैंगस्टर एक्ट की कार्यवाही को जारी रखना याचिकाकर्ताओं के मानवाधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है.
अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए विशेष न्यायाधीश (गैंगस्टर एक्ट), आगरा की अदालत में लंबित गैंगस्टर स्पेशल ट्रायल नंबर 317/2002 (राज्य बनाम दिनेश व अन्य) की संपूर्ण कार्यवाही, चार्जशीट और 29 जुलाई 2002 के संज्ञान आदेश को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया.