जिला अदालतों की Slow Speed पर हाईकोर्ट की टिप्पणी, देरी व्यक्तिगत दोष नहीं, संस्थागत व्यवहार का नतीजा, 40 साल मुकदमा चलाना शुभ संकेत नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला अदालतों में मुकदमों की Slow Speed और जिला न्याय पालिका द्वारा मांगी गई जानकारी न देने पर गंभीर चिंता जताई है. जस्टिस विनोद दिवाकर ने चार याचिकाओं की सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला 26 मई 2026 को सुरक्षित रख लिया था और 28 सितंबर 26 को यह फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि Slow Speed के चलते यह देरी किसी एक व्यक्ति का दोष नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवहार का नतीजा है.
कोर्ट जिन चार याचिकाओं पर फैसला सुना रही थी वे निम्न थे:-
- उर्मिला मिश्रा- प्रयागराज के नैनी थाने का 2009 का आपराधिक मामला 16 साल में 178 से ज्यादा बार लगा, पर आरोप तय नहीं हुए.
- सरफराज अहमद:- 2008 में एफआईआर और 2010 में चार्जशीट के बाद करीब 143 तारीखें लगीं, पर कार्यवाही आगे नहीं बढ़ी.
- वीएस पालीट्यूब- सिर्फ 59,000 रुपये के चेक बाउंस का 2013 का मामला 100 से ज्यादा बार लगा. आरोपी नियमित रूप से पेश नहीं हुआ.
- पप्पू मेट:-जमानत में दो जमानतदार मांगे गए थे. हाईकोर्ट ने पहले ही 11 दिसंबर 2025 को निजी मुचलका 5,000 रुपये और एक जमानतदार पर रिहाई का आदेश दे दिया था.

हाईकोर्ट ने बच्ची देवी मामले में जमानत की प्रक्रिया तय की थी. कोर्ट के अनुसार 12 अगस्त 2025 के बाद भी 9,775 अग्रिम जमानत और 1,56,155 नियमित जमानत आदेशों में दो जमानतदार मांगे गए. कोर्ट ने कहा -गाजियाबाद, लखनऊ, सीतापुर, बुलंदशहर और सहारनपुर में ऐसे आदेश ज्यादा मिले. जिलों से रिपोर्ट मांगी गई, तो केवल 25 ने जवाब दिया और वह भी ज्यादातर अधूरा था. कोर्ट ने आगरा जिला जज की रिपोर्ट की सराहना भी की. मिर्जापुर में 1981 के चार मामले अब तक लंबित मिले.
कोर्ट ने निर्देश जारी किया कि प्रयागराज के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट उर्मिला मिश्रा का मामला समयबद्ध तरीके से निपटाएं. बार-बार छूट की अर्जियां खारिज हों, जरूरत पड़ने पर जमानत बांड जब्त हों, और सम्मन-वारंट तामील में लापरवाह पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हो. कोर्ट ने निर्देश दिया कि सरफराज अहमद का मुकदमा भी इन्हीं निर्देशों के अनुसार चलेगा.
मुकदमों की Slow Speed और जिला न्याय पालिका द्वारा मांगी गई जानकारी न देने पर चिंता जताई
कोर्ट ने निर्देश दिया कि पालीट्यूब मामले में आरोपी हर तारीख पर हाजिर हो. न आए तो कानपुर नगर के एसएसपी उसकी मौजूदगी सुनिश्चित करें और फिर भी न आए तो हिरासत में लेकर ट्रायल पूरा हो. कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश से फुल कोर्ट बुलाने और हाईकोर्ट रूल्स, 1952 के पालन पर संवाद शुरू करने पर विचार का अनुरोध किया गया.
कोर्ट ने कहा कि कहा फैसले की प्रति केंद्रीय विधि मंत्रालय के न्याय विभाग को भेजी जाए. कहा कि रजिस्ट्रार जनरल पूरे रिकार्ड का डिजिटलीकरण सुनिश्चित करें. कोर्ट ने कहा कि 20 साल से ज्यादा समय तक आरोप तय न होना, और कुछ मामलों का 40 साल से ज्यादा चलना, संस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है. देरी व्यक्तिगत दोष नहीं, संस्थागत व्यवहार का नतीजा 40 साल मुकदमा चलाना शुभ संकेत नहीं है.
एसडीएम को छह सप्ताह में आदेश पालन निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उप जिलाधिकारी हरिश्चंद्र को अपने पूर्व आदेश का पालन करने के लिए छह सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है. जस्टिस विकास बुधवार की एकल पीठ ने यह आदेश पारित किया. याची शिव कुमार सिंह ने अवमानना याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था कि हाईकोर्ट के 23 फरवरी 2026 को पारित आदेश का आज तक पालन नहीं हुआ, जबकि आदेश की प्रति संबंधित अधिकारी को तामील कराई जा चुकी है. याची की ओर से अधिवक्ता अभय प्रताप सिंह और इंद्रजीत चौरसिया ने पैरवी की.
कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि कोर्ट के आदेश की जानबूझकर अवहेलना का मामला बनता है. हालांकि, इस स्तर पर विपक्षी को नोटिस जारी नहीं किया गया. कोर्ट ने अनुपालन का एक और मौका देते हुए एसडीएम को आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने की तारीख से छह सप्ताह में कोर्ट के निर्देशों का पालन करने को कहा है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विपक्षी निर्धारित समय में आदेश का पालन नहीं करता है, तो याची को दोबारा हाईकोर्ट आने की छूट होगी.