Sub-Inspector, प्लाटून कमांडर भर्ती में अंतिम सुनवाई 9 अक्टूबर को, नियुक्ति पत्र जारी करने पर रोक बरकरार रहेगी
जवाब दाखिल करने में टाल-मटोल करने पर कोर्ट ने दिया आदेश, कहा, आंसर की विवाद पर सरकार व भर्ती बोर्ड दाखिल कर सकते हैं जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस में Sub-Inspector (नागरिक पुलिस), प्लाटून कमांडर (पीएसी) और अग्निशमन द्वितीय अधिकारी सहित अन्य संबंधित 4543 पदों पर भर्ती प्रक्रिया के तहत चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी करने पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है. कोर्ट ने सरकार की ओर से बार बार स्थगन मांगे जाने पर यह रोक लगाई है. याचिका की अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को होगी. कोर्ट ने कहा सरकार व पुलिस भर्ती बोर्ड चाहे तो जवाब दाखिल कर सकते हैं.
यह आदेश जस्टिस अनीस कुमार गुप्ता ने Sub-Inspector भर्ती के अभ्यर्थियों श्याम सुंदर व दो अन्य व यश पांडेय व 44 अन्य की याचिकाओं की सुनवाई करते हुए दिया. याचियों के अधिवक्ता ने बताया कि याचिकाओं में Sub-Inspector भर्ती परीक्षा की उत्तर कुंजी में कुछ प्रश्नों के उत्तरों की सत्यता और शुद्धता को चुनौती दी गई है. हालांकि Sub-Inspector भर्ती का अंतिम परिणाम पहले ही घोषित किया जा चुका है. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि राज्य सरकार/भर्ती बोर्ड की ओर से बार-बार स्थगन मांगा जा रहा था.
अगली सुनवाई तक Sub-Inspector भर्ती के क्रम में कोई भी नियुक्ति पत्र जारी न किया जाए
मामले की स्थिति को देखते हुए कोर्ट ने आदेश दिया कि मामले की अगली सुनवाई तक Sub-Inspector भर्ती के क्रम में कोई भी नियुक्ति पत्र जारी न किया जाए. साथ ही इस मामले को अन्य संबद्ध याचिकाओं के साथ नौ अक्टूबर को दोपहर दो बजे फ्रेश मामले के रूप में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगली तारीख पर किसी भी पक्ष को कोई स्थगन नहीं दिया जाएगा.
कोर्ट ने साथ ही विपक्षियों को विवादित प्रश्नों की उत्तर कुंजी के संबंध में याचिकाओं का परीक्षण कर अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने की छूट दी है. कोर्ट ने एडवोकेट आकांक्षा को जिम्मेदारी दी है कि मामले को 9 अक्टूबर को दिन में दो बजे सुनवाई के लिए लिस्टेड किये जाने की सूचना सभी जिम्मेदारों को उपलब्ध करावें.
सेवानिवृत्त नायब तहसीलदारों की गिरफ्तारी पर रोक
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जौनपुर में दर्ज एक आपराधिक मामले में दो सेवानिवृत्त नायब तहसीलदारों को अंतरिम राहत देते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है. जस्टिस अजय भनोट और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने यह आदेश जय सिंह मौर्य व एक अन्य की याचिका में पारित किया.
याचिकाकर्ता वर्ष 2014 और 2015 में नायब तहसीलदार के पद से सेवानिवृत्त हुए थे. उनके खिलाफ 15 सितंबर 2026 को थाना लाइन बाजार, जिला जौनपुर में एफआईआर दर्ज हुआ, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 420, 467, 468 और 471 लगाई गई हैं. आरोप 2011-2012 में की गई राजस्व प्रविष्टियों से जुड़े हैं.
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता रवींद्र नाथ यादव और अभिषेक कुमार यादव ने कहा कि संबंधित प्रविष्टियां सद्भावना में, पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों और अभिवचनों के आधार पर अपने सरकारी कर्तव्य के निर्वहन में की गई थीं. प्राथमिकी विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, क्योंकि इसके जरिए राजस्व प्रविष्टियों से जुड़े दीवानी विवाद को आपराधिक मामले का रूप दिया जा रहा है. तर्क दिया गया कि प्राथमिकी दुर्भावना से प्रेरित है और याचिकाकर्ताओं को बलि का बकरा बनाने तथा उनसे पैसे वसूलने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है.
कहा कि जब कोई आरोपी प्राथमिकी रद्द कराने के लिए धारा 482 सीआरपीसी या अनुच्छेद 226 के तहत अदालत आता है और दावा करता है कि कार्यवाही तुच्छ, तंग करने वाली या बदला लेने की नीयत से शुरू की गई है, तो अदालत का दायित्व है कि वह प्राथमिकी को अधिक सावधानी से देखे. ऐसे मामलों में केवल प्राथमिकी के कथनों तक सीमित न रहकर रिकॉर्ड की अन्य परिस्थितियों और जांच में जुटाई गई सामग्री पर भी गौर किया जा सकता है. अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सहारा लिया.
कोर्ट ने कहा कि मामले पर विचार की आवश्यकता है. कोर्ट ने राज्य सरकार व विपक्षी अधिवक्ताओं को चार सप्ताह में जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया. कोर्ट ने अगली सुनवाई तक, या पुलिस रिपोर्ट दाखिल होने तक (जो भी पहले हो), याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी.