Shiksha Mitras को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, स्पेशल टीईटी परीक्षा में शामिल होने की अनुमति की मांग में दाखिल 220 की याचिका खारिज

बृहस्पतिवार को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता केवल इसलिए विशेष परीक्षा में शामिल होने का दावा नहीं कर सकते कि वो सामान्य टीईटी में बैठने के लिए योग्य हैं. यह आदेश जस्टिस मंजू रानी चौहान ने Shiksha Mitras वसीम अहमद सहित 220 लोगों की याचिकाओं पर पारित किया है. कोर्ट ने माना कि Shiksha Mitras की कानूनी स्थिति नौकरी कर रहे शिक्षकों से अलग है और संविधान राज्य से उस अंतर को खत्म करने के लिए नहीं कहता जो किसी वैध कानूनी उद्देश्य पर आधारित हो.
राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की ओर से अधिवक्ता वैभव त्रिपाठी ने याचिकाओं का विरोध किया. यूपी में सरकार ने उन शिक्षकों के लिए अलग से टीईटी आयोजित करने का फैसला लिया गया है, जो अभी सरकारी नौकरी कर रहे हैं और राज्य के तमाम स्कूलों में पढ़ा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने टीईटी को सभी शिक्षकों के लिए अनिवार्य किया है.
अगले एक साल में सभी को टीईटी पास करना होगा, ऐसा नहीं करने पर नौकरी चली जाएगी. ऐसे में यूपी सरकार ने अलग से टीईटी यानी स्पेशल टीईटी आयोजित करने का ऐलान किया. इस परीक्षा में सिर्फ वही शिक्षक शामिल हो सकते हैं, जो सरकारी नौकरी पाकर स्कूलों में पढ़ा रहे हैं.
लंबे समय से यूपी के Shiksha Mitras नौकरी पक्की करने की मांग कर रहे हैं
पिछले लंबे समय से यूपी के Shiksha Mitras नौकरी पक्की करने की मांग कर रहे हैं. वहीं जब स्पेशल टीईटी का मौका आया तो उन्हें इससे भी बाहर रखा गया. ऐसे में अब उनकी मांग थी कि उन्हें भी इस पात्रता परीक्षा में बैठने का मौका दिया जाएगा. इसे लेकर प्रदर्शन भी हुए और हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की गई, लेकिन अब Shiksha Mitras को कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. कई Shiksha Mitras ऐसे हैं, जिन्होंने टीईटी परीक्षा पास नहीं की है, ऐसे में उन्हें टीचर भर्ती में शामिल होने या फिर पक्का होने के लिए ये परीक्षा पास करनी जरूरी है.
सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि राज्य को किसी अन्य वर्ग के उम्मीदवारों को निर्धारित न्यूनतम योग्यता तक लाने से रोकने के लिए समानता की संवैधानिक गारंटी लागू नहीं की जा सकती. अवसर की समानता का मतलब यह नहीं है कि प्रत्येक उम्मीदवार हमेशा योग्यता के एक ही स्तर पर बना रहे.
इसके लिए आवश्यक है कि, एक बार भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद, उस भर्ती के प्रयोजनों के लिए समान रूप से स्थित व्यक्तियों के साथ कानून के अनुसार और मनमानी प्राथमिकता के बिना व्यवहार किया जाए. विशेष टीईटी केवल संबंधित सेवारत शिक्षकों को प्रारंभिक योग्यता प्राप्त करने में सक्षम बनाता है. यह उनके चयन या नियुक्ति का निर्धारण नहीं करता है.
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा व्यक्त की गई यह आशंका कि विशेष टीईटी का आयोजन, अपने आप में, अनुच्छेद 14 और 16 के तहत उनके अधिकारों को क्षीण कर देगा, समय से पहले और गलत धारणा है. विशेष टीईटी अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट (सुप्रा) में घोषित कानून और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसकी समीक्षा में दिए गए सीमित विस्तार का परिणाम है. इसका उद्देश्य संबंधित सेवारत शिक्षकों को 31 अगस्त 2028 तक टीईटी हासिल करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विचार किया गया अवसर प्रदान करना है. यह उनके पक्ष में नियुक्ति या पदोन्नति का कोई अधिमान्य अधिकार नहीं बनाता है.
इन परिस्थितियों में, इस न्यायालय को यह मानने का कोई आधार नहीं मिलता है कि विवादित सरकारी आदेश, केवल इसलिए कि यह संबंधित सेवारत शिक्षकों के लिए एक विशेष टीईटी प्रदान करता है, संविधान के अनुच्छेद 14 या 16 का उल्लंघन करता है या उन याचिकाकर्ताओं के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है जो पहले ही टीईटी उत्तीर्ण कर चुके हैं.
याचिकाकर्ता लागू नियमों के अनुसार भर्ती प्रक्रिया में भाग लेने के हकदार रहेंगे और निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा करने वाले अन्य सभी उम्मीदवारों के साथ उन पर विचार किया जाएगा. केवल यह तथ्य कि सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्देशों के अनुसार एक अन्य वर्ग को समान अनिवार्य योग्यता प्राप्त करने का अवसर दिया जा रहा है, शत्रुतापूर्ण भेदभाव या अवसर की समानता से इनकार नहीं करता है.