वाराणसी Land acquisition मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 154 से अधिक याचिकाकर्ताओं की याचिकाएं खारिज कीं

यह विवाद वाराणसी के बैरवां और करनदादी गांवों में Land acquisition अधिनियम, 1894 के तहत की गई अधिग्रहण कार्यवाही से जुड़ा है. यह Land acquisition वर्ष 2000 में शुरू हुआ था और इसे लेकर पहले भी तीन बार अदालतों में मुकदमेबाजी हो चुकी है. विशेष Land acquisition अधिकारी, वाराणसी ने 10 जनवरी 2024 को शेष भूमि के लिए एक अवार्ड (मुआवजा निर्धारण आदेश) पारित किया था, जिसे इन याचिकाओं में चुनौती दी गई थी.
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय कुमार सिंह ने दलील दी कि अवार्ड पुराने कानून के तहत पारित किया गया, जबकि इसे Land acquisition, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत होना चाहिए था.बाजार मूल्य का निर्धारण 2013 अधिनियम के लागू होने की तारीख (1 जनवरी 2014) के आधार पर होना चाहिए था, न कि पुराने अवार्ड (20 सितंबर 2012) के आधार पर.
अनुमानित मुआवजे का 80% जमा नहीं किया गया, जिससे Land acquisition की वैधता पर सवाल
कब्जा लेने से पहले अनुमानित मुआवजे का 80% जमा नहीं किया गया, जिससे Land acquisition की वैधता पर सवाल उठता है.प्राधिकरण अधिग्रहीत भूमि का उपयोग “ट्रांसपोर्ट नगर” के निर्धारित उद्देश्य के बजाय निजी संस्थाओं को व्यावसायिक दरों पर बेचने में कर रहा है.
वाराणसी विकास प्राधिकरण की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि अवार्ड, इसी अदालत द्वारा पूर्व में 31 मई 2023 को दिए गए निर्देशों के अनुरूप ही पारित किया गया है, जिसमें दिल्ली एयरटेक सर्विसेज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का पालन करने को कहा गया था. उनके अनुसार 80% मुआवजे की जमा राशि से जुड़ा मुद्दा पहले ही तय हो चुका है और दोबारा नहीं उठाया जा सकता.
खंडपीठ ने पाया कि विवादित अवार्ड में बाजार मूल्य का आधार 20 सितंबर 2012 वाले पूर्व अवार्ड को बनाया गया है, जो सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली एयरटेक फैसले के अनुरूप ही है. अदालत ने कहा कि चूंकि मुआवजे की राशि पहले ही जमा की जा चुकी थी और 2003 में कब्जा भी ले लिया गया था, इसलिए धारा 11-ए के तहत Land acquisition के समाप्त होने का सवाल ही नहीं उठता. कोर्ट ने यह भी कहा कि Land acquisition के उद्देश्य में बदलाव संबंधी आपत्ति पहले के मुकदमों में भी उठाई जा सकती थी, लेकिन नहीं उठाई गई, इसलिए अब इस आधार पर चुनौती स्वीकार्य नहीं है.
जालसाजी फर्जीवाड़ा के आरोपी की सशर्त जमानत मंजूर
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जय प्रकाश तिवारी की एकल पीठ ने इटावा के सिविल लाइन्स थाना क्षेत्र में दर्ज मामले में आरोपी सफल गुप्ता उर्फ लाला को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है.याची पर जालसाजी और फर्जीवाड़े का आरोप है.याची अधिवक्ता का कहना था कि उसे झूठा फंसाया गया है और वे पूरी तरह निर्दोष हैं. एफआईआर में उनका नाम नहीं था; उनका नाम सह-आरोपी राहुल गुप्ता के इकबालिया बयान से जांच के दौरान सामने आया. उनके कब्जे से जाली मुहर, स्टाम्प, इनवॉइस या कोई अन्य फर्जी दस्तावेज बरामद नहीं हुआ.
सह-आरोपी महेश चंद्र उर्फ महेश चंद्र अग्रवाल को पहले ही 17 अप्रैल 2026 को एक रिट याचिका में सुरक्षा मिल चुकी है. आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और वे 1 जून 2026 से जेल में बंद हैं.मुकदमों की भारी लंबित संख्या के चलते ट्रायल जल्द पूरा होने की संभावना नहीं है. राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता ने जमानत का पुरजोर विरोध किया.
अपराध की प्रकृति, साक्ष्य, आरोपी की संलिप्तता और सजा की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने बिना मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए सशर्त जमानत याचिका स्वीकार कर ली. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानती जमानतदारों की पहचान और निवास प्रमाण की सत्यापन प्रक्रिया संबंधित प्राधिकारी द्वारा पूरी की जाएगी, और शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में ट्रायल कोर्ट जमानत रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगा.