Biodiversity Law के पेपर में मिले 0 अंक, छात्र की याचिका खारिज, बार काउंसिल और लॉ कमीशन को भेजी जाएगी कॉपी

18 मार्च 2026 को घोषित परिणाम में उसे Biodiversity Law विषय में शून्य अंक मिले, जबकि उसने सभी प्रश्न हल किए थे और 50 से अधिक अंक की उम्मीद कर रहा था. सूचना के अधिकार के तहत Biodiversity Law विषय उत्तर पुस्तिका की प्रति लेने के बाद छात्र ने पुनर्मूल्यांकन की मांग की, लेकिन विश्वविद्यालय ने कोई कार्रवाई नहीं की. इसके बाद उसने हाई कोर्ट का रुख किया.
पिछली सुनवाई में कोर्ट ने विश्वविद्यालय को Biodiversity Law विषय का मूल प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका पेश करने का निर्देश दिया था
पिछली सुनवाई में कोर्ट ने विश्वविद्यालय को Biodiversity Law विषय का मूल प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका पेश करने का निर्देश दिया था. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्टैंडिंग काउंसल से एक प्रश्न (3-सी) का उत्तर पढ़ने को कहा. उत्तर सुनने के बाद स्वयं वकील ने स्वीकार किया कि उसे उत्तर का कोई अर्थ समझ नहीं आया और उसमें न कोई तार्किकता थी, न कानूनी समझ. कोर्ट ने भी पाया कि Biodiversity Law विषय की उत्तर पुस्तिका में विषय से जुड़ी कोई समझ नहीं झलकती.
कोर्ट ने कहा कि अकादमिक मूल्यांकन में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा बेहद सीमित है, जब तक कि मनमानी, दुर्भावना या स्पष्ट प्रक्रियागत त्रुटि साबित न हो. रिकॉर्ड की जांच में कोर्ट को परीक्षक की ओर से कोई मनमानी नहीं मिली. कोर्ट ने गहरी चिंता जताते हुए कहा कि यह कोई इकलौता मामला नहीं है, ऐसे मामले बार-बार कोर्ट के सामने आ रहे हैं जो कानूनी शिक्षा के गिरते स्तर को दर्शाता है. कोर्ट ने यह भी कहा कि हो सकता है छात्र को उचित मार्गदर्शन, ओरिएंटेशन और शिक्षण न मिला हो, इसलिए दोष केवल छात्र का नहीं बल्कि संस्थान का भी है.
कोर्ट ने रजिस्ट्रार (कंप्लायंस) को निर्देश दिया कि इस आदेश, प्रश्नपत्र (Biodiversity Law)और उत्तर पुस्तिका (छात्र की पहचान छिपाकर) की प्रति बार काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रिंसिपल सेक्रेटरी और लॉ कमीशन ऑफ इंडिया के मेंबर सेक्रेटरी को भेजी जाए, ताकि वे संस्थान के अकादमिक मानकों और कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता पर विचार कर सकें. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां किसी संस्थान, शिक्षक या परीक्षक के खिलाफ निष्कर्ष नहीं मानी जाएं.
शादीशुदा बेटी को पिता की राशन दुकान आवंटन अर्जी के शीघ्र निस्तारण का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिवंगत पिता के नाम से जारी उचित दर दुकान के लाइसेंस को उनकी विवाहित पुत्री को आवंटित करने से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित प्राधिकारी को याची की अर्जी के शीघ्र निस्तारण का निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा कि याची के आवेदन पर अब तक कोई फैसला नहीं लिया गया है तो उस पर जल्द से जल्द कार्रवाई की जाए.
यह आदेश जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने सुषमा सिंह की याचिका पर उसके अधिवक्ता अनुराग त्रिपाठी को सुनकर दिया है. याची के पिता के पास उचित दर दुकान का लाइसेंस था. पिता के निधन के बाद याची ने राशन दुकान स्वयं के नाम आवंटित करने की मांग की. याची का तर्क है कि शादीशुदा बेटी होने के बावजूद वह नियमानुसार परिवार की परिभाषा के तहत आती है इसलिए मृतक आश्रित कोटे से यह दुकान उसे आवंटित की जानी चाहिए.
सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता अनुराग त्रिपाठी ने ने अर्जी की फोटोकॉपी प्रस्तुत की. कोर्ट ने याचिका को निस्तारित करते हुए स्पष्ट किया कि प्राधिकारी स्तर पर याची की अर्जी पर अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है तो इस प्रक्रिया को जल्द पूरा किया जाए. साथ ही याची को छूट दी है कि इस मुद्दे पर कानून की नवीनतम स्थिति को संलग्न करते हुए नया प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर सकती है.