इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज की UP Cricket Association की याचिका, सीबीआई से जांच कराने और बीसीसीआई के मान्यता देने की जांच कराने से इंकार

1955 में बनी “द यूपीसीए” सोसाइटी ने 3 सितंबर 2005 को अपने 3/5वें बहुमत सदस्यों के प्रस्ताव से खुद को भंग कर दिया और अपनी सारी संपत्ति, देनदारियां व कार्य कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के तहत नवगठित “यूपीसीए” (कंपनी) को सौंप दिए. याचिकाकर्ता एसोसिएशन का दावा था कि Cricket Association का यह विघटन कानूनी तौर पर वैध नहीं था और चूंकि सरकार सोसाइटी में “योगदानकर्ता” थी, इसलिए बिना राज्य सरकार की सहमति के विघटन नहीं हो सकता था .
याचिकाकर्ता ने बीसीसीआई से भी देनदारियां हस्तांतरित करने, यूपीसीए पर प्रतिबंध लगाने, सीबीआई जांच और उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग की थी. कोर्ट ने पाया कि सोसाइटी का विघटन धारा 13 के प्रावधानों के अनुरूप हुआ था और इसे 21 साल बाद चुनौती नहीं दी जा सकती. राज्य सरकार यह साबित नहीं कर पाई कि वह सोसाइटी में “योगदानकर्ता” या हितधारक थी, इसलिए दूसरे प्रावधान की बाध्यता लागू नहीं होती.
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यूपी Cricket Association बीसीसीआई की पूर्ण सदस्य है और लोढ़ा समिति की सिफारिशों के अनुरूप अपना संविधान संशोधित कर चुकी है
धारा 14/14ए केवल तभी लागू होती जब संपत्ति किसी को हस्तांतरित न की गई हो . यहां संपत्ति समान उद्देश्यों वाली गैर-लाभकारी कंपनी को हस्तांतरित की जा चुकी थी, जो सोसाइटी के बायलॉज (क्लॉज 2(आर)) के अनुरूप था. यूपी Cricket Association बीसीसीआई की पूर्ण सदस्य है और लोढ़ा समिति की सिफारिशों के अनुरूप अपना संविधान संशोधित कर चुकी है.सीबीआई जांच और प्रतिबंध की मांग को कोर्ट ने “निराधार” और निजी संपत्ति विवाद बताया, कहा जिसके लिए उचित मंच जैसे एनसीएलटी उपलब्ध हैं.

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता चाहे तो अपनी शिकायतें राज्य सरकार या बीसीसीआई के समक्ष रख सकता है, लेकिन विघटन या संबद्धता के मुद्दे पर हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता. याचिका बिना किसी हर्जाने के खारिज कर दी गई. बेंच ने कहा कि UP Cricket Association पर बैन लगाने या CBI से जांच करवाने के लिए याचिकाकर्ता की मांग पूरी तरह से बेबुनियाद है. यह असल में एक भंग हो चुकी सोसाइटी की संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़ा निजी विवाद है, जिसके लिए उचित मंच उपलब्ध थे, फिर भी याचिकाकर्ता ने यह रिट याचिका दायर करने का फैसला किया.
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा है कि संबंधित पक्षों द्वारा दलीलें पेश किए जाने के बाद जो बात साफ तौर पर सामने आई है, वह यह है कि “उत्तर प्रदेश Cricket Association ” नाम की सोसाइटी को सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 की धारा 13 के प्रावधानों के अनुसार भंग नहीं किया गया है, सोसाइटी के सदस्यों के लिए यह कानूनी रूप से सही होगा कि वे भंग होने के समय मौजूद सदस्यों के बहुमत से यह तय करें कि कर्ज और देनदारियों को चुकाने के बाद बची हुई कोई भी संपत्ति सरकार को दी जाएगी, ताकि उसका इस्तेमाल धारा 1 में बताए गए किसी भी मकसद के लिए किया जा सके.
याचिकाकर्ता के तर्क का जवाब देते हुए उत्तर प्रदेश Cricket Association के अधिवक्ता ने कहा कि 1860 के एक्ट की धारा 13 में साफ तौर पर कहा गया है कि सोसाइटी के सदस्य (कुल सदस्यों में से कम से कम 3/5 सदस्य) यह तय कर सकते हैं कि सोसाइटी को भंग कर दिया जाए और सोसाइटी की संपत्ति के निपटान और सेटलमेंट, उसके दावों और देनदारियों के लिए, उस सोसाइटी पर लागू नियमों के अनुसार कदम उठाए जाएंगे.
03.09.2005 को हुई The UP Cricket Association की असाधारण आम बैठक में, 3/5 सदस्यों ने सर्वसम्मति से यह तय किया कि सोसाइटी की सभी संपत्तियां, देनदारियां और कामकाज 1956 के एक्ट की धारा 25 के तहत लाइसेंस प्राप्त नई कंपनी को ट्रांसफर कर दिए जाएं और जिस तारीख को उक्त कंपनी को 1956 के एक्ट की धारा 25 के तहत लाइसेंस मिलेगा उसी तारीख से सोसाइटी भंग मानी जाएगी.
बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता और प्रतिवादियों के बीच विवाद का मुद्दा यह है कि एक तरफ याचिकाकर्ता का आरोप है कि भले ही सोसाइटी को भंग कर दिया गया है, लेकिन एक्ट, 1860 की धारा 13 की दूसरी शर्त के आदेश का पालन नहीं किया गया है और इसी आधार पर वह एक्ट, 1860 की धारा 14 और धारा 14A का हवाला देते हुए कहता है कि सोसाइटी के भंग होने के बाद, कर्ज और देनदारियों को चुकाने के बाद बची हुई कोई भी संपत्ति सरकार को दी जानी चाहिए, ताकि उसका इस्तेमाल एक्ट, 1860 की धारा 1 में बताए गए किसी भी मकसद के लिए किया जा सके.
चूंकि राज्य यह साबित नहीं कर पाया है कि संबंधित सोसाइटी में सरकार का कोई योगदान या कोई अन्य हित था, इसलिए उसकी सहमति की जरूरत नहीं थी और सोसाइटी द्वारा 05.09.2005 के अपने पत्र के जरिए डिप्टी रजिस्ट्रार को सोसाइटी के भंग होने की सूचना भेजे जाने के लगभग 21 साल की अवधि के दौरान सोसाइटी को भंग करने के बारे में राज्य सरकार की आपत्ति को सही नहीं ठहराया जा सकता.
पिछले दो दशकों में बहुत कुछ बदल चुका है, जो हमारे लिए किसी भी तरह के दखल से इनकार करने का एक और कारण है और इसलिए सोसाइटी का भंग होना 1860 के एक्ट की धारा 13 के प्रावधानों के खिलाफ नहीं माना जा सकता.
बेंच ने कोट करायाक्या “UPCA” जो एक रजिस्टर्ड लिमिटेड कंपनी है 3.09.2005 से प्रभावी “The UP Cricket Association” सोसाइटी के भंग होने पर उसकी सभी संपत्तियों, देनदारियों और कार्यों को अपने अधिकार में ले सकती थी? इस पर पूरी चर्चा सुनने के बाद बेंच ने कहा कि यह कोर्ट पाती है कि “UP Cricket Association ने 03.09.2005 से “UP Cricket Association” सोसाइटी के भंग होने पर उसकी संपत्ति, देनदारियों और कामकाज को अपने अधिकार में लिया. यह 1956 के एक्ट के दायरे में था और सोसाइटी की देनदारियों, संपत्ति और कामकाज को अपने अधिकार में लेने से रोकने वाला कोई भी विरोधाभासी प्रावधान (खासकर 1860 के एक्ट की धारा 13 के तहत) मौजूद नहीं था.
क्या अधिकारियों को यह निर्देश देने के लिए ‘रिट ऑफ मैंडमस’ जारी किया जा सकता है कि वे भंग हो चुकी “The UP Cricket Association ” की सभी संपत्तियों, खातों और संसाधनों को याचिकाकर्ता के नाम ट्रांसफर करें? क्या BCCI को यह निर्देश दिया जा सकता है कि वह भंग हो चुकी “The UP Cricket Association” पर डाली गई देनदारियों को ट्रांसफर करे?
बेंच ने कहा कि “U.P. Cricket Association (सोसाइटी) की संपत्ति, देनदारियों और कामकाज को अपने अधिकार में लेना 1956 के एक्ट के कानूनी दायरे में था. अधिकारियों को ऐसा कोई आदेश नहीं दिया जा सकता जिसमें उन्हें “UPCA” सोसाइटी की संपत्ति, खाते और संसाधन याचिकाकर्ता के पक्ष में ट्रांसफर करने या BCCI को निर्देश देने के लिए कहा जाए कि वह अपने ऊपर मौजूद देनदारियों को भंग हो चुकी सोसाइटी को ट्रांसफर करे.
WRIT – C No. – 3329 of 2026; The Cricket Association of Uttar Pradesh Vs Uttar Pradesh Cricket Association and 6 others