“आपराधिक मुकदमा और Departmental Disciplinary Proceeding अलग दायरे में चलती हैं और दोनों एक-दूसरे पर निर्भर नहीं होतीं”
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद की आरक्षी के खिलाफ दूसरी शादी के आरोप के आधार पर की गयी Departmental Disciplinary Proceeding, याची को मिलेंगे कानून के अनुसार सभी लाभ

कानूनी स्थिति एकदम साफ है कि एक आरोप के लिए आपराधिक मुकदमा और Departmental Disciplinary Proceeding अलग-अलग दायरे में चलती हैं और दोनों एक-दूसरे पर निर्भर नहीं होतीं. सिर्फ इसलिए कि किसी कर्मचारी को आपराधिक मुकदमे में बरी कर दिया गया है उसे उस बरी होने के आधार पर अपने-आप नौकरी पर वापस नहीं रखा जा सकता. ट्रायल कोर्ट ने यदि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सभी सबूतों की जांच की है और उसके साथ निष्कर्ष निकाला है कि शिकायतकर्ता याचिकाकर्ता द्वारा दूसरी शादी के अस्तित्व को साबित करने में नाकाम रहा है.
ऐसी परिस्थितियों में आपराधिक मुकदमे में याचिकाकर्ता का बरी होना एक सम्मानजनक बरी होना है और यह किसी भी संदेह के लाभ के आधार पर नहीं था. आपराधिक मुकदमे में याचिकाकर्ता के साफ और सम्मानजनक बरी होने के मद्देनजर Departmental Disciplinary Proceeding में दोषी होने के निष्कर्षों को यदि बने रहने दिया जाता है तो यह याचिकाकर्ता के लिए अन्यायपूर्ण अनुचित और दमनकारी होगा.
इन बातों को ध्यान में रखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अनीस कुमार गुप्ता की बेंच ने कांस्टेबल की याचिका स्वीकार कर ली और जांच अधिकारी द्वारा Departmental Disciplinary Proceeding अपनी रिपोर्ट में दर्ज किए गए निष्कर्षों को अमान्य का दिया है. इसके आधार पर बेंच ने 12.09.1999 का परिणामी दंड आदेश और उसके बाद के सभी विवादित आदेशों को रद्द कर दिया है. याचिकाकर्ता कानून के अनुसार सभी परिणामी लाभों का हकदार होगा.
Departmental Disciplinary Proceeding के खिलाफ अपील और रिवीजन दोनों खारिज कर दिया गया
याचिका में ज्योतिबा फूले नगर के पुलिस अधीक्षक द्वारा 12.09.1999 को दिये गये फैसले के द्वारा Departmental Disciplinary Proceeding में याची को तीन वर्षों के लिए न्यूनतम वेतनमान का दण्ड सुनाया गया था. उस पर पहली शादी के रहते दूसरी शादी करने का आरोप लगाया गया था. Departmental Disciplinary Proceeding के खिलाफ अपील और रिवीजन दोनों खारिज कर दिया गया था, जिसे याचिका में चुनौती दी यी थी.
याचिकाकर्ता को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 494 और 109 के तहत अपराधों से बरी कर दिया गया तो उसने डीआईजी को Departmental Disciplinary Proceeding के खिलाफ एक और रीप्रजेंटेशन दिया था, इसे भी खारिज कर दिया गया था. इन सभी फैसलों को याचिका में चुनौती दी गयी थी. याचिकाकर्ता संजय गिरी उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में जिला ज्योतिबा फुले नगर में कांस्टेबल के रूप में कार्यरत था. उसका अपनी पत्नी से विवाद चल रहा था.
उसकी पत्नी पत्नी ने एसपी को एक शिकायत प्रस्तुत की जिसमें उसने पति पर तलाक दिये बिना दूसरी शादी कर लेने का आरोप लगाया. इस शिकायती पत्र की प्रारंभिक जांच सीओ से करायी गयी. प्रारंभिक जांच में क्षेत्राधिकारी ने याचिकाकर्ता को दोषमुक्त कर दिया. इसके बाद प्रकरण की जांच दूसरे सर्किल ऑफिसर को सौंप दी गयी. दूसरे सीओ ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में पाया कि याचिकाकर्ता ने सुरेश गिरी की बेटी कमला से दूसरी शादी कर ली है. सर्किल ऑफिसर ने अपनी रिपोर्ट में याचिकाकर्ता को पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी करने का दोषी ठहराया.
दूसरी प्रारंभिक जांच के आधार पर अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई और याची को आरोप-पत्र जारी किया गया. इसके बाद Departmental Disciplinary Proceeding पूरी की गई. पीठासीन अधिकारी ने याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देने और गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी करने का दोषी है.
जांच अधिकारी ने यह भी सिफारिश की कि याचिकाकर्ता को तीन साल के लिए न्यूनतम वेतनमान पर रखा जाए. उपरोक्त जांच रिपोर्ट के आधार पर अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने याचिकाकर्ता को एक ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी करके जवाब देने के लिए कहा गया. इसका याचिकाकर्ता ने कोई जवाब नहीं दिया. इसके बाद अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने 12.09.1999 के आदेश के माध्यम से, याचिकाकर्ता को पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी करने का दोषी पाते हुए, Departmental Disciplinary Proceeding के तहत उसे तीन साल के लिए न्यूनतम वेतनमान पर रखने की सजा सुनाई.
दूसरी शादी के आरोप के लिए याचिकाकर्ता की पहली पत्नी ने अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, गाजियाबाद की अदालत में शिकायत मामला संख्या 1255/2022 दर्ज कराया था. 10.10.2002 के निर्णय और आदेश के माध्यम से उक्त शिकायत मामले में, वर्तमान याचिकाकर्ता को अन्य सह-आरोपियों के साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 494 और 109 के तहत अपराधों से बरी कर दिया गया था.
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जब एक बार याचिकाकर्ता को उन्हीं आरोपों के लिए आपराधिक मामले में बरी कर दिया गया है तो Departmental Disciplinary Proceeding में याचिकाकर्ता की दूसरी शादी के संपन्न होने के संबंध में दर्ज निष्कर्ष टिकने योग्य नहीं हैं.
आपराधिक मामले में याचिकाकर्ता के बरी होने के बाद दंडादेश प्रभावी नहीं रह सकता क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने संपूर्ण साक्ष्यों की गहन जांच की है और यह आपराधिक विचारण में याचिकाकर्ता की एक ‘स्वच्छ और सम्मानजनक मुक्ति’ है. इसलिए अनुशासनात्मक कार्यवाही में दर्ज निष्कर्ष प्रभावी नहीं रह जाते हैं और उन्हें रद्द किया जाना चाहिए.

अपनी दलील के समर्थन में याचिकाकर्ता के वकील ने इस न्यायालय की समन्वय पीठ के 15.05.2023 के निर्णय पर भरोसा किया, जो रिट C संख्या 57858/2016 (बसिष्ठ मुनि मिश्रा बनाम भारत संघ और 5 अन्य) में दिया गया था.
इसके अलावा, कैप्टन एम. पॉलएंथनी बनाम भारत गोल्ड माइंस लिमिटेड, (1999) 3 SCC 679 के निर्णय पर भरोसा करते हुए, याचिकाकर्ता के वकील यह दलील दी कि जब एक बार न्यायिक निर्णय द्वारा याचिकाकर्ता को इस निष्कर्ष के साथ बरी कर दिया गया है कि याचिकाकर्ता द्वारा दूसरा विवाह कभी संपन्न ही नहीं किया गया था तो ऐसी स्थिति में Departmental Disciplinary Proceeding में दर्ज निष्कर्षों को कायम रहने देना अन्यायपूर्ण, अनुचित और बल्कि दमनकारी होगा.
इसके विपरीत राज्य की ओर से मुख्य स्थायी वकील ने दलील दी कि एक ही आरोपों के लिए Departmental Disciplinary Proceeding और आपराधिक कार्यवाही, दोनों साथ-साथ चल सकती हैं और कानून में इस पर कोई रोक नहीं है. केवल इस आधार पर कि किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे में बरी कर दिया गया है, अनुशासनात्मक कार्यवाही में दर्ज निष्कर्षों को अपने-आप रद्द नहीं किया जा सकता. यह न्यायालय का कर्तव्य है कि वह इस बात की जाँच करे कि क्या वह बरी होना ‘सम्मानजनक बरी होना था या फिर आपराधिक मुकदमे में याचिकाकर्ता को ‘संदेह का लाभ’ दिया गया था. Departmental Disciplinary Proceeding में सबूत का स्तर ‘संभावनाओं की प्रबलता’ पर आधारित होता है.
दलील दी कि याचिकाकर्ता को मामूली सजा दी थी और यह अवधि बहुत पहले समाप्त हो चुकी है इसलिए इस तरह के विलंबित चरण पर किसी भी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है. इन परिस्थितियों को देखते हुए राज्य की ओर से विद्वान अतिरिक्त मुख्य स्थायी वकील इस याचिका को खारिज करने की मांग की.
दोनों पक्षों के वकीलों के तर्कों को सुनने और रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों को परखने के बाद कोर्ट ने पाया कि एक ही आरोप के लिए याचिकाकर्ता को Departmental Disciplinary Proceeding के साथ आपराधिक मुकदमे का भी सामना करना पड़ा है. Departmental Disciplinary Proceeding में उसे तीन साल के लिए न्यूनतम वेतनमान पर फटकार लगाकर दंडित किया गया था.
आपराधिक मुकदमे में उसे निर्विवाद रूप से बरी कर दिया गया. ट्रायल कोर्ट के निर्णय से स्पष्ट है कि गवाहों के बयानों की विस्तार से जाँच की गई है. साक्ष्यों की जाँच करने के बाद ट्रायल कोर्ट ने यह निष्कर्ष दर्ज किया है कि शिकायतकर्ता यह साबित करने में विफल रहा है कि याचिकाकर्ता ने दूसरी शादी की है.
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा कैप्टन एम. पॉल एंथनी बनाम भारत गोल्ड माइंस लिमिटेड और अन्य: (1999) 3 SCC 679 के मामले में सुनाये गये पैरा 22 के निष्कर्ष को कोट कराया. इसके मुताबिक :-
- “22. इस कोर्ट के ऊपर बताए गए विभिन्न फैसलों से जो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं, वे ये हैं:
- (i) Departmental Disciplinary Proceeding और किसी आपराधिक मामले की कार्यवाही एक साथ चल सकती हैं, क्योंकि उन्हें एक साथ (हालांकि अलग-अलग) चलाने पर कोई रोक नहीं है.
- (ii) यदि Departmental Disciplinary Proceeding और आपराधिक मामला एक ही तरह के तथ्यों पर आधारित हैं और दोषी कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक मामले में आरोप गंभीर प्रकृति का है जिसमें कानून और तथ्यों से जुड़े पेचीदा सवाल शामिल हैं, तो यह उचित होगा कि आपराधिक मामला खत्म होने तक विभागीय कार्यवाही को रोक दिया जाए.
- (iii) किसी आपराधिक मामले में आरोप की प्रकृति गंभीर है या नहीं और क्या उस मामले में तथ्यों और कानून से जुड़े पेचीदा सवाल शामिल हैं यह अपराध की प्रकृति पर और जांच के दौरान कर्मचारी के खिलाफ जमा किए गए सबूतों और सामग्री के आधार पर या चार्जशीट में बताए गए मामले की प्रकृति पर निर्भर करेगा.
- (iv) Departmental Disciplinary Proceeding को रोकने के लिए अकेले विचार नहीं किया जा सकता, बल्कि इस बात का भी पूरा ध्यान रखना होगा कि विभागीय कार्यवाही में बेवजह देरी न हो.
- (v) यदि आपराधिक मामला आगे नहीं बढ़ता है या उसके निपटारे में अनावश्यक देरी हो रही है तो विभागीय कार्यवाही को फिर से शुरू किया जा सकता है. ऐसा इसलिए, ताकि यदि कर्मचारी निर्दोष पाया जाता है तो उसके सम्मान की रक्षा हो सके और यदि वह दोषी पाया जाता है तो प्रशासन जल्द से जल्द उससे छुटकारा पा सके.
हाल के फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि आपराधिक मुकदमे में बरी होने का तथ्य अपने-आप में पिछली कार्यवाहियों में पाए गए दुराचार के निष्कर्षों को पलटने के बराबर नहीं होगा.
सुप्रीम कोर्ट के ऊपर बताए गए फैसलों से यह सुरक्षित रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जहाँ भी आरोप और शिकायतें एक जैसी थीं और आपराधिक अदालत ने बरी कर दिया है तो अदालत का यह फर्ज है कि वह जाँच करे कि क्या यह सम्मानजनक बरी होना था या उस कर्मचारी को संदेह का लाभ दिया गया था. भले ही सम्मानजनक बरी होना हो, अदालत को यह जाँच करनी होगी कि क्या अनुशासनात्मक प्राधिकारी और आपराधिक मुक़दमे के सामने पेश किए गए गवाह एक ही थे.
यदि गवाहों का समूह एक ही था और आपराधिक अदालत में पेश किए गए सबूतों के आधार पर अदालत ने बरी कर दिया है तो ऐसे मामलों में अदालत द्वारा नौकरी पर वापसी की अनुमति दी जा सकती है.
यदि अदालत जाँच करने पर पाती है कि Departmental Disciplinary Proceeding के दौरान जाँच किए गए गवाहों ने आरोपों का समर्थन किया है, लेकिन गवाहों के उसी समूह ने आपराधिक मुकदमे में समर्थन नहीं किया या कुछ अतिरिक्त तथ्य हैं जो अनुशासनात्मक कार्यवाही में साबित हुए हैं और जो मुकदमे का विषय नहीं थे, तो अदालत को ऐसी पूरी हो चुकी Departmental Disciplinary Proceeding में दखल नहीं देना चाहिए.
WRIT – A No. – 11947 of 2004 ; Sanjai Giri Versus State of U.P. and Others