Trial Court की जिम्मेदारी है कि वह अभियोजन पक्ष के सबूतों का कानूनी और सही तरीके से मूल्यांकन करे, 45 साल पुराने हत्याकांड के जिंदा बचे तीन आरोपी बरी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, Trial Court ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के उन सबूतों पर भरोसा किया, जिन्हें हम कानूनी सिद्धांतों और मामले के तथ्यों के अनुसार पूरी तरह से अविश्वसनीय पाते हैं

Trial Court की जिम्मेदारी है कि वह अभियोजन पक्ष के सबूतों का कानूनी और सही तरीके से मूल्यांकन करे. दुश्मनी और प्रतिद्वन्दिता के मामले के साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर परखे. इन तथ्यों को नजरअंदाज करके कथित अपराध में किसी को दोषी ठहराना ठीक नहीं है. Trial Court को अभियोजन पक्ष के गवाहों के सबूतों का गहराई से और सही तरीके से मूल्यांकन करना चाहिए.
इन तथ्यों की गैरमौजूदगी के चलते इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने फतेहपुर जनपद के खाखरेरू थाना क्षेत्र में हुए हत्याकांड के आरोपितों को बरी कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि Trial Court ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के उन सबूतों पर भरोसा किया, जिन्हें हम कानूनी सिद्धांतों और मामले के तथ्यों के अनुसार पूरी तरह से अविश्वसनीय पाते हैं. दो जजों की बेंच ने कहा कि Trial Court का दोषसिद्धि और सजा का फैसला और आदेश गलत है, ठोस सबूतों के बिना है और कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है, इसलिए कानून की नजर में यह टिकने लायक नहीं है.
इसके साथ ही कोर्ट ने जीवित अपीलकर्ताओं गुलाम, हिदायतुल्लाह और अजीज़ुल्ला की आपराधिक अपील मंजूर कर ली है और Trial Court द्वारा सेशंस ट्रायल नंबर 619/1981 (स्टेट बनाम कम्मू और अन्य) – जो सेशंस ट्रायल नंबर 284/1982 (स्टेट बनाम कम्मू और अन्य), सेशंस ट्रायल नंबर 284/1983 (स्टेट बनाम बाबू उर्फ मुन्ना) और सेशंस ट्रायल (Trial Court) नंबर 341/1982 (स्टेट बनाम अतीकुल्लाह) से जुड़े थे और केस क्राइम नंबर 143/1981 (पुलिस स्टेशन खाखरेरू, जिला फतेहपुर) से निकले थे में आरोपी गुलाम, हिदायतुल्लाह और अजीज़ुल्ला के खिलाफ दोषी ठहराने और सजा सुनाने वाले 31.08.1984 के Trial Court के फैसले और आदेश को रद्द कर दिया है.
कोर्ट में यह फैसला जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी ने सुनाया और कहा कि बदम सिंह मामले में दिए गए फैसले और अभियोजन पक्ष के गवाहों के सबूतों के मूल्यांकन और परख के बारे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताए गए कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, हम पाते हैं कि अभियोजन पक्ष के तथाकथित चश्मदीद गवाहों, मोइद अहमद और शब्बीर ने जिस तरह से अभियोजन पक्ष की कहानी बताई है, वह बहुत ही असंभव, अविश्वसनीय और यकीन करने लायक नहीं है. उनकी जिरह से पता चलता है कि इन अभियोजन पक्ष के गवाहों ने बड़े और अहम विरोधाभासी बयान दिए हैं, जिससे अभियोजन पक्ष की कहानी पूरी तरह से अविश्वसनीय हो जाती है.
Trial Court में दिये गये अभियोजन पक्ष के गवाहों मोइद अहमद और शब्बीर के सबूत पूरी तरह से अविश्वसनीय और यकीन करने लायक नहीं
अभियोजन पक्ष के गवाहों के सभी सबूतों को पढ़ने पर, हम पाते हैं कि मोइद अहमद और शब्बीर ऐसे गवाह हैं जिन्हें अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन करने और इस तरह आरोपियों को दोषी ठहराने के मकसद से Trial Court में पेश किया गया था. इसलिए Trial Court में दिये गये अभियोजन पक्ष के गवाहों मोइद अहमद और शब्बीर के सबूत पूरी तरह से अविश्वसनीय और यकीन करने लायक नहीं हैं.
यह आपराधिक अपील आरोपी कम्मू, बड्डू, मो. अली उर्फ मो. ढोल, शफीउल्लाह, जफर, गुलाम, हिदायतुल्लाह, असलम, अजीज़ुल्ला, मंजर अली, अतीकुल्लाह और बाबू उर्फ मुन्ना द्वारा Trial Court के फैसले के खिलाफ दाखिल की गयी थी. तथ्यों के अनुसार शिकायतकर्ता रियाज अहमद ने हामिद अली खान से लिखवायी गयी तहरीर थाने में दी, जिसके आधार पर 19.09.1981 को रात 09:30 बजे कम्मू, बड्डू, मो. अली उर्फ मो. के खिलाफ FIR दर्ज कराई. ढोल, शफीउल्लाह, जफर, हिदायतुल्लाह, गुलाम, सैफ उल्लाह, असलम, अजीज़ुल्ला, मंजर अली, अतीकुल्लाह और बाबू उर्फ मुन्ना के खिलाफ हत्या समेत अन्य धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की गयी.
तहरीर के अनुसार सुबह सरफराज अपने रिश्तेदार शौकत अली का खेत जोतने के लिए अपना ट्रैक्टर, अपनी लाइसेंसी बंदूक और कारतूस की बेल्ट लेकर घर से निकला था. शौकत अली का खेत कोट गाँव के पास सिंगवहार में है. ट्रैक्टर पर शाहनगर गाँव का रहने वाला मोइद अहमद भी था. शौकत अली ट्रैक्टर से अपना खेत जुतवा रहा था, तभी शाहनगर गाँव का रहने वाला शब्बीर जो अपनी लाइसेंसी डबल-बैरल बंदूक और कारतूस की बेल्ट लेकर शिकार करने निकला था वहाँ पहुंचा और खेत की दक्षिणी सीमा (मेढ़) पर मोइद अहमद और शौकत के साथ बैठ गया.
शाम करीब 05:00 बजे आरोपी कोट गाँव का रहने वाला कम्मू अपनी लाइसेंसी डबल-बैरल बंदूक के साथ पहुंचा. उसके साथ बड्डू, मो. अली उर्फ मो. ढोल, शफीउल्लाह, जफर, गुलाम, हिदायतुल्लाह उर्फ हिड्डू, सैफुल्ला, असलम, अजीज़ुल्ला, मंजर अली, अतीदुल्लाह और बाबू उर्फ मुन्ना वहां पहुंचे. सभी के हाथों में असलहे थे. आरोपी बाबू उर्फ मुन्ना ने चुपके से शब्बीर की डबल-बैरल बंदूक और कारतूस की बेल्ट अपने कब्जे में ले ली. इसी बीच, आरोपी कम्मू ने बाकी आरोपियों से कहा, सरफराज को आज ही मार डालना है और उसे जिंदा नहीं भागने देना है. इस रुकावट को भी खत्म करना होगा.
तहरीर के अनुसार कम्मू के ऐसा कहते ही, मृतक ट्रैक्टर से उतरा और अपनी बंदूक और कारतूस की बेल्ट लेकर भागने लगा. तभी कम्मू समेत सभी आरोपियों ने उस पर जान से मारने की नीयत से फायरिंग की. गोली खाकर वह खेत की मेड़ पर गिर पड़ा और उसकी मौत हो गई.
उसके साथ मौजूद लोगों ने शोर मचाया और चिल्लाये तो खेतों में काम कर रहे लोग बचाव के लिए दौड़ पड़े. यह देखकर आरोपिता ने मृतक के पास मौजूद बंदूक और कारतूस को अपने कब्जे में ले लिया और भाग निकले. कहा गया कि आरोपी रहमतपुर गाँव के निसार अहमद के बेटे अतहर अहमद के गिरोह के साथी और सदस्य हैं. अतहर अहमद की सलाह पर ही हत्या की गई.
मृतक के पिता का कहना था कि वह आरोपियों के अत्याचारों, गुंडागर्दी और गैर-कानूनी कामों के खिलाफ शिकायतें करता रहा था, जिसकी वजह से वे उससे और मेरे बेटे से रंजिश रखते थे. इसी दुश्मनी के कारण उसके बेटे की हत्या कर दी गयी. तहरीर के आधार पर रिपोर्ट दर्ज करके पुलिस ने मामले की विवेचना की और चार्जशीट Trial Court में दाखिल की. चूंकि यह मामला विशेष रूप से सेशन कोर्ट द्वारा सुने जाने योग्य था, इसलिए मजिस्ट्रेट ने मामले को सेशन कोर्ट (Trial Court) को सौंप दिया.

Trial Court ने 30.08.1983 को आरोपी-अपीलकर्ताओं के खिलाफ IPC की धाराओं 148, 302, 379 और 404 के तहत आरोप तय किए. अभियोजन पक्ष के सभी गवाहों ने दुश्मनी के कारण ही उनके खिलाफ गवाही दी. आरोपी हिदायतुल्लाह ने यह भी कहा कि मैंने खाखरेरू पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर और सूचना देने वाले रियाज अहमद आदि के खिलाफ आवेदन दिए थे. इसी आधार पर इंस्पेक्टर के खिलाफ धारा 7 के तहत मामला दर्ज किया गया था. आरोपी अजीज़ुल्ला ने अपने बयान में कहा कि वह MLA इंद्रजीत के पास गया था. इस मामले के सभी गवाह MLA इंद्रजीत के इशारे पर काम कर रहे हैं. उन्होंने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों से भी इनकार किया.
अभियोजन और बचाव पक्ष के सबूत दर्ज करने के बाद, Trial Court ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं. Trial Court ने 31.08.1984 के विवादित फैसले और आदेश के माध्यम से आरोपियों को दोषी ठहराने और सजा देने के बारे में अपना निष्कर्ष और कारण बताए. दोषी ठहराने और सज़ा सुनाने वाले फैसले और आदेश से नाराज होकर आरोपितों ने यह आपराधिक अपील दायर की.
आपराधिक अपील के लंबित रहने के दौरान अपीलकर्ता कम्मू, बड्डू, मो. अली उर्फ मो. ढोल, शफीउल्लाह, जफर, असलम, मंजर अली, अतीकउल्लाह और बाबू उर्फ मुन्ना की मौत हो गई. कोर्ट ने केवल गुलाम, हिदायतउल्लाह और अजीजउल्लाह के मामले में सुनवाई की. अपीलकर्ताओं के वकील ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि घटना के समय रिपोर्ट दर्ज कराने वाला रियाज अहमद अपने घर पर था.
वह घटना का चश्मदीद गवाह नहीं है. उन्हें मोईद अहमद से घटना की जानकारी मिली. मोईद अहमद से घटना घटित होने की सूचना मिलने पर रियाज अहमद ने हामिद अली खान से तहरीर लिखवाकर दी. रियाज अहमद के साक्ष्य में दुश्मनी का वर्णन किया गया है, इसलिए, रियाज अहमद का साक्ष्य अभियोजन की कहानी के समर्थन में विश्वसनीय और विश्वसनीय नहीं है.
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यह भी प्रस्तुत किया गया है कि अभियोजन पक्ष के अनुसार, मोइद अहमद और शब्बीर अभियोजन पक्ष के प्रमुख चश्मदीद गवाह हैं, जिनके बारे में कहा गया था कि वे घटना के समय और स्थान पर मौजूद थे. सबूतों के अवलोकन से, रिकॉर्ड पर यह स्पष्ट है कि न तो मोइद अहमद और न ही शब्बीर घटना स्थल पर मौजूद था. इन गवाहों के साक्ष्य से यह तथ्य स्पष्ट है कि बड़े और भौतिक विरोधाभास, अतिशयोक्ति और मनगढ़ंत बातें हैं जो इस तथ्य को साबित करती हैं कि मोईद अहमद और शब्बीर घटना के समय और स्थान पर मौजूद नहीं थे.
रहमतुल्लाह के बयान को पढ़ने से यह स्पष्ट है कि अभियोजन पक्ष ने पुलिस की मदद से इस मामले में कथित अपराध के लिए आरोपी व्यक्तियों को गलत तरीके से फंसाया. अभियोजन पक्ष के मामले से यह स्पष्ट है कि कुछ अन्य व्यक्तियों ने मृतक सरफराज पर गोलीबारी करके उसकी हत्या कर दी है, जिसमें वह बंदूक की गोली से घायल हो गया था. सरफराज की हत्या की सूचना मिलने पर रियाज अहमद ने मोईद अहमद और शब्बीर के साथ मिलकर पुलिस की मिलीभगत से इस मामले में कथित अपराध के लिए आरोपी-अपीलकर्ताओं को झूठा नाम दिया और फंसाया.
यह भी कहा गया कि Trial Court ने इस मामले में रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों पर ठीक से विचार नहीं किया और सिर्फ इस आधार पर कि दुश्मनी का पहलू अभियोजन पक्ष के पक्ष में जा रहा है, आरोपी-अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराया. राज्य की ओर से पेश एजीए ने जीवित आरोपी-अपीलकर्ताओं के वकील की दलीलों का विरोध किया और कहा कि भले ही रियाज अहमद घटना का चश्मदीद गवाह नहीं है, फिर भी सबूतों से पक्षों के बीच दुश्मनी और रंजिश की बात साबित और स्थापित होती है.
मोइद अहमद और शब्बीर इस मामले में चश्मदीद गवाह हैं, जिन्होंने घटना को अपनी आँखों से देखा है. मोइद अहमद और शब्बीर के बयानों में बड़ा और अहम विरोधाभास नहीं है. हर मामले में अभियोजन पक्ष के सबूतों में छोटी-मोटी विसंगतियाँ और चूक हो सकती हैं. सिर्फ इस आधार पर अभियोजन पक्ष की कहानी को संदिग्ध या शक के दायरे में नहीं रखा जा सकता और Trial Court के फैसले को गलत नहीं ठहराया जा सकता.