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2,161 करोड़  के कथित Excise Liquor scam में छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी आयुक्त की जमानत इलाहाबाद हाई कोर्ट से मंजूर

2,161 करोड़  के कथित Excise Liquor scam में छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी आयुक्त की जमानत इलाहाबाद हाई कोर्ट से मंजूर

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2,161 करोड़ के कथित छत्तीसगढ़ Liquor scam से जुड़ी उत्तर प्रदेश की एफआईआर में छत्तीसगढ़ के पूर्व Excise Commissioner निरंजन दास को जमानत दे दी. जस्टिस विक्रम डी. चौहान ने कहा कि अगर आरोपी जमानत का हकदार है तो उसे सिर्फ आपराधिक इतिहास के आधार पर जमानत देने से मना नहीं किया जा सकता.

आरोपी को जमानत देने से मना करने के लिए आपराधिक इतिहास के आधार पर कोई खास वजह नहीं बताई गई. इसलिए कोर्ट को यह सही नहीं लगता कि सिर्फ इस आधार पर कि उनका आपराधिक इतिहास रहा है, आवेदक को जमानत देने से मना किया जाए. अभियोजन पक्ष के अनुसार, दास छत्तीसगढ़ के Excise Commissioner थे और राज्य की Excise Policy और टेंडर प्रक्रिया तैयार करने में शामिल थे.

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आरोप है कि उन्होंने ऐसी Excise Policy बनाई जिससे नोएडा की होलोग्राम बनाने वाली कंपनी मेसर्स प्रिज्म होलोग्राफी सिक्योरिटी फिल्मस प्राइवेट लिमिटेड को फायदा हुआ. कोर्ट ने गौर किया कि 2,161 करोड़ के कथित Excise Liquor scam के सिलसिले में राज्य की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग/एंटी-करप्शन ब्यूरो, रायपुर (छत्तीसगढ़) ने शुरू में आवेदक समेत 70 से ज्यादा लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 और 120-B के तहत एफआईआर  दर्ज की थी.

Excise Liquor scam में कथित तौर पर शामिल अन्य लोगों को भी जमानत मिल गई

आवेदक ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें मई 2026 में छत्तीसगढ़ मामले में जमानत दी. यह भी बताया गया कि प्रवर्तन निदेशालय ने नोएडा में होलोग्राम बनाने के बारे में उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को जानकारी दी थी, जिसके बाद यूपी में यह एफआईआर दर्ज की गई. यह तर्क दिया गया कि Excise Liquor scam में कथित तौर पर शामिल अन्य लोगों को भी जमानत मिल गई. यह भी बताया गया कि चार्जशीट में 22 गवाहों के नाम शामिल थे, जिससे पता चलता है कि मुकदमा जल्द पूरा नहीं होगा.

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कोर्ट ने पाया कि राज्य ने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया जिससे पता चले कि आवेदक Excise Commissioner ने कभी कानूनी प्रक्रिया से बचने की कोशिश की हो. सिर्फ आपराधिक इतिहास के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता. यह मानते हुए कोर्ट ने कहा कि कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि जमानत का मकसद ट्रायल के दौरान आरोपी की मौजूदगी सुनिश्चित करना है.

राज्य की ओर से पेश सरकारी वकील ने ऐसी कोई ठोस जानकारी या परिस्थितियां नहीं दिखाई हैं, जिनसे यह संकेत मिले कि आवेदक न्याय से भाग सकता है, न्याय की प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है, या अपराध दोहराने, गवाहों को डराने-धमकाने जैसी कोई और परेशानी खड़ी कर सकता है. कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य ने ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं दिखाया, जिससे यह लगे कि आवेदक Excise Commissioner सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है, गवाहों को डरा-धमका सकता है या जमानत की आजादी का गलत इस्तेमाल कर सकता है.

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इस बात को ध्यान में रखते हुए कि मुख्य अपराध छत्तीसगढ़ में हुआ बताया गया, आवेदक को मुख्य मामले में सुप्रीम कोर्ट से पहले ही जमानत मिल चुकी थी, यूपी के मौजूदा मामले में जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट में 22 गवाहों के नाम हैं, हाईकोर्ट ने उसे जमानत दी.

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