Murder case की विवेचना में लापरवाही पर कोर्ट सख्त, कमिश्नर की निगरानी में विवेचना कराने और रिपोर्ट पेश करने का आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक Murder case मामले में पुलिस विवेचना के तरीके पर गंभीर सवाल उठाते हुए कमिश्नर प्रयागराज को निगरानी करने का आदेश दिया है. यह आदेश जस्टिस अवनीश सक्सेना ने हरिलाल की अर्जी पर दिया है. कोर्ट ने 10 सितंबर 2026 के अपने आदेश में यह टिप्पणी की थी कि घायल की मृत्यु हो जाने के बावजूद आरोपियों के खिलाफ बीएनएस की धारा 109(1) (जो गैर-घातक अपराध से जुड़ी है) के तहत चार्जशीट दाखिल की गई. Murder case के बजाय हल्की धारा में आरोप तय किए गए.
इसी क्रम में विवेचना अधिकारी को स्पष्टीकरण देने के लिए हाजिर होने का निर्देश दिया था. उप-निरीक्षक विशाल कुमार गुप्ता कोर्ट में पेश हुए. अनुपालन हलफनामे के अनुसार, घायल रजनाथ को 7 मार्च 2026 को कथित हमले में लगी चोटों के इलाज के लिए एसआरएन अस्पताल में भर्ती कराया गया था. 17 मार्च 2026 को सेप्टीसीमिया के कारण मल्टी-ऑर्गन फेलियर से उनकी मृत्यु हो गई .बताया गया कि मृतक को पहले से ही गंभीर संक्रमण था, जिसके चलते मल्टी-ऑर्गन फेलियर हुआ.
जब कोर्ट ने मृतक राजनाथ के इलाज से जुड़े दस्तावेजों के बारे में पूछा, तो विवेचना अधिकारी उप-निरीक्षक कोई जवाब नहीं दे सके, क्योंकि एसआरएन अस्पताल में हुए इलाज के दस्तावेज उनके पास मौजूद नहीं थे जिनसे यह साबित हो सके कि मृतक को पहले से कोई संक्रमण था या नहीं. शिकायतकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि मृतक को 7 मार्च 2026 को प्रयागराज के एसआरएन अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है जो यह दिखाए कि भर्ती के समय मृतक की ब्लड रिपोर्ट में कोई पूर्व-विद्यमान गंभीर संक्रमण पाया गया हो.
Murder case की जानकारी कमिश्नर, प्रयागराज को दी जाए ताकि वे जांच अधिकारी द्वारा की जा रही विवेचना और दाखिल चार्जशीट की समीक्षा कर कार्रवाई करें
इन विसंगतियों को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि Murder case की जानकारी कमिश्नर, प्रयागराज को दी जाए ताकि वे जांच अधिकारी द्वारा की जा रही विवेचना और दाखिल चार्जशीट की समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई करें. रजिस्ट्रार अनुपालन आदेश की प्रति के साथ कमिश्नर प्रयागराज को पत्र भेजें और 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट मांगें. मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर 2026 को नियत की गई है.
निवेशकों का धन हड़पने वाले सोसाइटी के खिलाफ दर्ज हुए सभी case एक साथ सुनने का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लोनी अर्बन मल्टी-स्टेट क्रेडिट एंड थ्रिफ्ट को-ऑपरेटिव सोसाइटी में निवेशकों की मैच्योरिटी राशि न लौटाए जाने से जुड़े case में इससे जुड़ी सभी एफआईआर को ललितपुर के कोतवाली थाने में दर्ज पहली एफआईआर के साथ कनेक्ट कर देने का आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया है. जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने भरत वर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है.
शिकायतकर्ता यशवंत सिंह ने 18 जुलाई 2024 को जगत सिंह उर्फ तानसू, मुकेश कुमार जैन और नीरज जैन उर्फ बंटी जैन के खिलाफ एफआईआर (case) दर्ज कराई थी. आरोप था कि इन लोगों ने खुद को एलयूसीसी कंपनी का एजेंट बताकर लोगों को यह भरोसा दिलाया कि पांच साल में जमा राशि दोगुनी हो जाएगी. मैच्योरिटी अवधि 26 मार्च 2024 को पूरी होने के बाद भी जब पैसा नहीं लौटाया गया और मांगने पर धमकाया गया तो case दर्ज हुआ. इसके बाद ललितपुर जिले के अलग-अलग थानों में इसी तरह के आरोपों वाली कम से कम 14 और एफआईआर (case) दर्ज हो गईं.
याचिकाकर्ता के वकील अनुराग त्रिपाठी ने कोर्ट में दलील दी कि सभी एफआईआर (case) में आरोप एक जैसे हैं, बस शिकायतकर्ता अलग-अलग हैं. उनका कहना था कि एक ही मामले में बार-बार एफआईआर (case) दर्ज कराना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और याचिकाकर्ता को परेशान करने के लिए जानबूझकर किया जा रहा है. उन्होंने टीटी एंटोनी बनाम केरल राज्य सहित कई सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि एक ही घटना पर दूसरी एफआईआर (case) दर्ज नहीं की जा सकती.

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि सभी शिकायतकर्ता अलग-अलग जगहों के हैं और हर मामले के तथ्य अलग हैं, इसलिए सभी एफआईआर (case) को एक साथ जोड़ना उचित नहीं होगा. यह भी कहा गया कि ऐसा करने से शिकायतकर्ताओं को पहली एफआईआर (case) वाले स्थान तक जाकर मुकदमे में हिस्सा लेना पड़ेगा. कोर्ट ने समानता की कसौटी सिद्धांत लागू करते हुए पाया कि सभी एफआईआर में आरोप एक जैसे हैं, आरोपी एक ही कंपनी से जुड़े हैं, और यह एक निरंतर लेन-देन का हिस्सा है.
कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग थानों में घटना होने या अलग समय पर case दर्ज होने भर से मामले की प्रकृति नहीं बदल जाती. कोर्ट ने निर्देश दिया कि पहली एफआईआर (case) केस क्राइम नंबर 612/2024 को “प्रधान एफआईआर” माना जाएगा. बाकी सभी एफआईआर को धारा 161 सी आर पी सी (180 बी एन एस एस ) के तहत बयान माना जाएगा.
जिन मामलों में चार्जशीट अभी दाखिल नहीं हुई है, उन्हें कोतवाली ललितपुर थाने भेजा जाएगा अगर किसी अदालत ने पहले ही संज्ञान ले लिया है, तो वह केस भी प्रधान एफआईआर के साथ जोड़कर उसी अदालत में चलेगा.इस तरह कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए मामले का निस्तारण कर दिया.