किसी भी फर्म या ठेकेदार को अनिश्चितकाल के लिए नहीं किया जा सकता है Blacklist/Debar : इलाहाबाद हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने भदोही स्थित मिश्रा राइस मिल को अनिश्चितकाल के लिए Blacklist/Debar किये जाने के आदेश को किया रद

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भदोही स्थित मिश्रा राइस मिल को अनिश्चितकालीन अवधि के लिए Blacklist/Debar सूची में डाले जाने के आदेश को रद्द कर दिया है. जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने मिल के प्रोपराइटर अनिल मिश्रा की याचिका पर यह आदेश दिया है. कोर्ट ने खाद्य विभाग को स्वतंत्रता दी है कि वह चाहे तो कानून के अनुरूप नया कारण-बताओ नोटिस जारी कर सकता है और नया आदेश पारित कर सकता है.
यह रिट याचिका, विंध्याचल डिवीजन, मिर्जापुर के रीजनल फूड कंट्रोलर द्वारा 25.08.2023 को पारित उस आदेश के खिलाफ दाखिल की गयी थी जिसमें याचिकाकर्ता-फर्म को राइस-मिलर के तौर पर अनिश्चित काल के लिए Blacklist/Debar कर दिया गया था. अनिल मिश्रा, मिश्रा राइस मिल भदोही के मालिक हैं. उनकी फर्म फूड, सेफ्टी और ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन विभाग में रजिस्टर्ड है.
फर्म के पास सरकार से मिला लाइसेंस है, जिसे समय-समय पर रिन्यू किया जाता रहा है. मिश्रा राइस मिल्स अलग-अलग टैक्स अथॉरिटीज के पास रजिस्टर्ड है. इस फर्म ने कृषि उत्पादन मंडी समिति, गोपीगंज भदोही में लाइसेंस के लिए अप्लाई किया था और 22.06.2015 से 30.06.2034 की अवधि के लिए लाइसेंस हासिल किया था.
अपने बिजनेस के हिस्से के तौर पर फर्म फूड और सिविल सप्लाई डिपार्टमेंट से धान लेती है और उसे चावल में बदलकर डिपार्टमेंट को वापस करती है. फर्म का कहना है कि पहले उनके खिलाफ कोई शिकायत नहीं रही है. जिला फूड मार्केटिंग ऑफिसर, भदोही ने 09.12.2019 को एक FIR दर्ज कराई थी.
IPC की धारा 419 और 420 और इन्फॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी एक्ट की धारा 66-C के तहत केस क्राइम नंबर 240/2022 थाना ज्ञानपुर जनपद भदोही में दर्ज हुआ. इसमें आरोप लगाया गया कि संतोष कुमार शुक्ला ने जिला फूड सप्लाई ऑफिसर भदोही की लॉगिन ID और पासवर्ड का गलत इस्तेमाल किया और डिजिटल सिग्नेचर लगाकर गलत तरीके से तीन तहसीलों के सब-डिविजनल ऑफिसर्स की ID में लॉगिन किया, जिन्हें संतोष कुमार शुक्ला ने रीसेट कर दिया था.
मिर्जापुर के क्षेत्रीय खाद्य नियंत्रक ने याचिकाकर्ता-फर्म को कारण बताओ नोटिस जारी किया. याचिकाकर्ता का कहना है कि यह नोटिस पहले से तय इरादे से जारी किया गया था. इसमें ऊपर बताई गई FIR का जिक्र तो था, लेकिन साथ ही यह टिप्पणी भी थी कि ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’ की धारा 3/7 के तहत अपराध दर्ज होने के कारण, फर्म को Blacklist/Debar करने और उसे धान की कुटाई के काम से दूर रखने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं.
उनसे पांच दिनों के भीतर यह बताने को कहा गया कि उन्होंने डिजिटल हस्ताक्षर का गलत इस्तेमाल कैसे किया और कुछ किसानों की पहचान को गैर-कानूनी तरीके से कैसे सत्यापित किया. साथ ही, यह भी कहा गया कि उनके खिलाफ मामला दर्ज होने के कारण, उन्हें धान की खरीद और उसकी कुटाई के काम से अलग कर दिया जाए.
फर्म को Blacklist/Debar किये जाने के आदेश के खिलाफ यह रिट याचिका दायर की गई
याचिकाकर्ता-फर्म ने अपना जवाब सौंपा. फर्म ने पासवर्ड के उल्लंघन के अपराध में अपनी किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया और कहा कि उल्लंघन संभव ही नहीं है क्योंकि लॉगिन आईडी और पासवर्ड संबंधित अधिकारियों के पास ही रहते हैं. इसके बाद फर्म को Blacklist/Debar किये जाने का आदेश पारित किया गया. इसी आदेश के खिलाफ यह रिट याचिका दायर की गई.
याचिकाकर्ता-फर्म के वकील ने तर्क दिया है कि विवादित आदेश गलत है क्योंकि Blacklist/Debar अनिश्चित काल के लिए की गई है जो पूरी तरह से अस्वीकार्य और गैर-कानूनी है. उन्होंने कहा कि उन्हें जारी किया गया ‘कारण बताओ नोटिस’ पहले से तय और बंद सोच के साथ जारी किया गया था. विवादित आदेश में कोई कारण नहीं बताया गया है, जो ऐसे आदेश के लिए बहुत जरूरी है जिसके कारण किसी पक्ष को प्रतिकूल नागरिक परिणाम भुगतने पड़ें.

याचिकाकर्ता-फर्म के खिलाफ निष्कर्ष विवादित आदेश में उल्लिखित या विचार की गई किसी सामग्री के आधार पर नहीं बल्कि केवल आरोप की गंभीरता के आधार पर निकाला गया है. Blacklist/Debar इतनी अनिश्चित है कि इसे आपराधिक अदालत में याचिकाकर्ता-फर्म के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही के नतीजे पर निर्भर कर दिया गया है.
स्टैंडिंग काउंसिल ने तर्क दिया कि विवादित Blacklist/Debar आदेश पर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती क्योंकि याचिकाकर्ता-फर्म के खिलाफ आरोप धान की खरीद और उसकी कुटाई की प्रक्रिया में शामिल चार अधिकारियों की आधिकारिक आईडी का उल्लंघन करने का है; याचिकाकर्ता-फर्म और इसमें शामिल अन्य लोगों ने कई किसानों की पहचान प्रमाणित करने के लिए इस आईडी का गलत इस्तेमाल किया था.
बेंच ने पक्षों के वकीलों को सुनने के बाद कहा कि, जहां तक खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग के लिए धान की खरीद और उसकी कुटाई की प्रक्रिया में भाग लेने से फर्म को अनिश्चित काल के लिए Blacklist/Debar करने का सवाल है, किसी व्यापारी/ठेकेदार को हमेशा के लिए सरकार या सरकारी एजेंसी से अनुबंध प्राप्त करने से Blacklist/Debar करना मनमाना और जरूरत से ज्यादा कठोर दंड माना जाता है. स्थायी रूप से रोकना या Blacklist/Debar करना, हालांकि कुछ बहुत गंभीर कदाचार के मामलों में किया जाता है, लेकिन आम तौर पर ऐसा तब तक नहीं किया जाता जब तक कि बहुत गंभीर कदाचार साबित न हो जाए.
इस संबंध में ‘कुलजा इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम चीफ जनरल मैनेजर, वेस्टर्न टेलीकॉम प्रोजेक्ट भारत संचार निगम लिमिटेड और अन्य, (2014) 14 SCC 731’ का हवाला दिया जा सकता है. जिसमें यह टिप्पणी की गई है:-
“बस इतना कहना काफी है कि ‘डीबारमेंट (Blacklist/Debar)’ को गलत काम करने वाले सप्लायर/ठेकेदारों को अनुशासित करने के एक असरदार तरीके के तौर पर पहचाना और अक्सर इस्तेमाल किया जाता है. इन ठेकेदारों ने शायद कुछ काम न करके या गलत काम करके, या धोखाधड़ी करके (जैसे गलत जानकारी देना, रिकॉर्ड में हेरफेर करना और उन नियमों का उल्लंघन करना जिनके तहत उन्हें कॉन्ट्रैक्ट दिए गए थे) नियम तोड़े हों. ध्यान देने वाली बात यह है कि ‘डीबारमेंट (Blacklist/Debar)’ कभी भी हमेशा के लिए नहीं होता और इसकी अवधि हमेशा गलती करने वाले ठेकेदार द्वारा किए गए अपराध की गंभीरता पर निर्भर करती है.”
“इस मामले में, रेस्पोंडेंट BSNL के अनुसार, अपीलकर्ता ने रेस्पोंडेंट कॉर्पोरेशन के अधिकारियों के साथ मिलीभगत और साजिश करके धोखाधड़ी से बड़ी रकम निकाली थी, जिसकी वह हकदार नहीं थी. फिर भी, भविष्य के सभी कॉन्ट्रैक्ट से हमेशा के लिए रोक देना (Blacklist/Debar) बहुत कठोर और भारी सजा लग सकती है, खासकर तब जब (a) अपीलकर्ता अपने बनाए गए ज्यादातर प्रोडक्ट रेस्पोंडेंट BSNL को सप्लाई कर रही हो, और (b) उसे मिली अतिरिक्त रकम पहले ही वापस कर दी गई हो.”
अगला सवाल यह है कि क्या इस कोर्ट को खुद उस समय-सीमा को तय करना चाहिए जिसके लिए अपीलकर्ता को Blacklist/Debar किया जाए या मामले से जुड़े तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस काम के लिए मामले को संबंधित अथॉरिटी के पास वापस भेजना चाहिए.
हमें सक्षम अथॉरिटी के पास मामला वापस भेजना, खुद वह अवधि तय करने के आदेश से ज्यादा सही विकल्प लगा जिसके लिए अपीलकर्ता Blacklist/Debar रहेगी. हम ऐसा दो खास वजहों से कह रहे हैं:
पहली वजह, क्योंकि Blacklist/Debar एक तरह की सजा है और इसकी मात्रा तय करना मुख्य रूप से उस अथॉरिटी का काम है जो इसे लागू करने के लिए सक्षम है. सर्विस कानून के दायरे में, इस कोर्ट ने बेशक खास हालात में देरी और आगे की कानूनी लड़ाई से बचने के लिए दोषी कर्मचारी की सजा की मात्रा में बदलाव करके उसकी परेशानी कम की है, लेकिन ऐसी बातें BSNL को ऑप्टिकल फाइबर/HDPE पाइप सप्लाई करने जैसे फायदेमंद कारोबार में लगी कंपनी पर लागू नहीं होतीं.
दूसरी वजह, क्योंकि Blacklist/Debar की अवधि तय करते समय, रेस्पोंडेंट कॉर्पोरेशन निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिए ऐसे मामलों में पालन किए जाने वाले व्यापक दिशा-निर्देश बना सकती है. इन दिशा-निर्देशों में अपराधों, उल्लंघनों और नियमों को तोड़ने की गंभीरता के आधार पर डीबारमेंट की अलग-अलग अवधि तय की जा सकती है.
कोर्ट ने कांति एसोसिएट्स बनाम मसूद अहमद खान मामले का हवाला देते हुए यह भी दोहराया कि किसी भी अर्द्ध-न्यायिक या प्रशासनिक आदेश में ठोस कारण देना अनिवार्य है, विशेषकर जब वह आदेश किसी पक्ष के लिए प्रतिकूल परिणाम वाला हो.
कोर्ट ने पाया कि आदेश में केवल यह कहा गया था कि “आरोप की गंभीरता” को देखते हुए याचिकाकर्ता का जवाब अस्वीकार्य है, जिसे कोर्ट ने आदेश जारी करने के लिए पर्याप्त कारण मानने से इन्कार कर दिया. परिणामस्वरूप 25 अगस्त 2023 का आदेश रद्द कर दिया गया.