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छापा मारने के 24 घंटे के भीतर Electricity theft की FIR दर्ज न कराए जाने पर आपराधिक केस कार्रवाई इलाहाबाद हाई कोर्ट ने की रद्द

एक्ट में निर्धारित समय सीमा के भीतर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में नाकाम रहने वाले अफसर के खिलाफ उचित कार्रवाई शुरू करने के निर्देश

छापा मारने के 24 घंटे के भीतर Electricity theft की FIR दर्ज न कराए जाने पर आपराधिक केस कार्रवाई इलाहाबाद हाई कोर्ट ने की रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिजली चोरी (Electricity theft) के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सतीश कुमार भारती उर्फ छोटू के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी है. यह मामला चंदौली जिले के एंटी पावर थेफ्ट थाने में दर्ज केस क्राइम नंबर 667/2020 (Electricity theft) से जुड़ा था, जिसमें भारतीय विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 135 के तहत मुकदमा चल रहा था. यह फैसला जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की बेंच ने सुनाया है.

कोर्ट ने तय समय सीमा के भीतर एफआईआर दर्ज न कराने वाले अफसर के खिलाफ उचित कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा कि संबंधित अफसर एक्ट 2003 की धारा 135 (1) (a) के तहत तय समय-सीमा के भीतर Electricity theft की FIR दर्ज करने में नाकाम रहा है.

यह अर्जी सेशन केस नंबर 557/2023 (राज्य बनाम सतीश कुमार भारती उर्फ छोटू) की पूरी कार्यवाही को रद्द करने के लिए दायर की गई थी. यह केस एंटी पावर थेफ्ट पुलिस स्टेशन, चंदौली में दर्ज केस क्राइम नंबर 667/2020 (इंडियन इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 की धारा 135 के तहत) से जुड़ा है और अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, FTC, चंदौली की अदालत में पेंडिंग है. तथ्यों के अनुसार 26.10.2020 को निरीक्षण के दौरान पाया गया कि आवेदक ने बिना किसी वैध कनेक्शन के सीधे बिजली का कनेक्शन ले रखा था.

पूछताछ करने पर वह अपने परिसर में बिजली के इस्तेमाल से संबंधित कोई वैध दस्तावेज पेश नहीं कर सका. अभियान के दौरान बिजली के अवैध इस्तेमाल की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गई. लेकिन Electricity theft की एफआईआर चार दिन बाद यानी की 30.10.2020 को दर्ज की गई. मामले की जांच की गई और इंडियन इलेक्ट्रिसिटी एक्ट की धारा 135 के तहत आवेदक के खिलाफ चार्ज-शीट दाखिल की गई, जिस पर विशेष न्यायाधीश, चंदौली ने 5.7.2023 के आदेश के माध्यम से संज्ञान लिया. अर्जी में Electricity theft आपराधिक मामले की पूरी कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गयी थी.

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आवेदक के वकील ने एक्ट की धारा 135 (1) (a) के दूसरे प्रावधान का हवाला देते हुए कहा कि जिस तारीख को आवेदक के परिसर में बिजली चोरी (Electricity theft) पकड़ी गई थी, उसके 24 घंटे के भीतर FIR दर्ज की जानी चाहिए थी. चूंकि FIR 4 दिन बाद दर्ज की गई थी, इसलिए ट्रायल कोर्ट उस FIR पर संज्ञान नहीं ले सकता.

आवेदक के वकील ने कहा कि धारा 135 (1) में पांच ऐसी स्थितियां बताई गई हैं जो बिजली चोरी (Electricity theft) के 5 अलग-अलग अपराध बनाती हैं. इनका जिक्र न तो FIR में, न ही चार्ज-शीट में और न ही आवेदक के खिलाफ संज्ञान लेने के आदेश में किया गया है. इस स्थिति को देखते हुए संज्ञान लेने का आदेश कानून की नजर में टिकने लायक नहीं है.

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अपनी बात के समर्थन में आवेदक के वकील ने वरुण कुमार यादव बनाम यूपी राज्य और अन्य, 2025(7) ADJ 710 मामले में इस कोर्ट के फैसले और क्रिमिनल मिसलेनियस रिट याचिका संख्या 18729/2023 (असीम उर्फ हासिम बनाम यूपी राज्य और अन्य) में 2.12.2023 को इस कोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा दिए गए फैसले का हवाला दिया.

इसके विपरीत बिजली विभाग की ओर से पेश वकील ने क्रिमिनल मिसलेनियस रिट याचिका संख्या 265/2023 (इंद्रेश पटेल उर्फ इंद्रेश्वर सिंह बनाम यूपी राज्य और 4 अन्य) में 6.2.2013 को दिए गए फैसले का हवाला दिया और कहा कि उक्त फैसले में, इस कोर्ट की डिवीजन बेंच ने माना है कि अधिनियम की धारा 135 (1-A) का  प्रावधान केवल निर्देश देने वाला है और इसकी शर्तों के उल्लंघन पर कोई परिणाम नहीं होता जैसा कि अन्यथा बताया गया है.

कहा कि वरुण कुमार यादव (सुप्रा) के मामले में फैसले के खिलाफ, विशेष अनुमति याचिका (सीआरएल) डायरी नंबर 74474 ऑफ 2025 (पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड बनाम वरुण कुमार यादव और अन्य) पहले ही शीर्ष अदालत के समक्ष दायर की जा चुकी है और आदेश दिनांक 23.1.2026 के तहत उक्त विशेष अनुमति याचिका में उत्तरदाताओं को नोटिस जारी किए गए थे.

हालांकि अधिनियम, 2003 की धारा 135 (1) के तहत अपराधों की विशिष्ट श्रेणी का उल्लेख एफआईआर में नहीं किया गया है, हालांकि, एफआईआर के वर्णन से यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता धारा 135 (1) (ए) के तहत Electricity theft अपराध के लिए उत्तरदायी है और केवल इसलिए कि धारा 135 के तहत अपराध के सामान्य प्रावधानों का उल्लेख किया गया है, जो अपराध को विभिन्न श्रेणियों में परिभाषित करते हैं, कथन के बाद आवेदक को कोई लाभ नहीं दिया जा सकता है.

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कोर्ट की राय में, FIR में बताए गए अपराध (Electricity theft) से साफ पता चलता है कि यह धारा 135 (1) के तहत अपराध है क्योंकि आवेदक के परिसर में कोई अधिकृत बिजली कनेक्शन नहीं था. हालाँकि, वह अवैध रूप से केबल डालकर बिजली का इस्तेमाल (Electricity theft) करते हुए पाया गया था. इसकी वीडियोग्राफी भी की गई थी. वह बिजली के ऐसे इस्तेमाल के लिए कोई दस्तावेज नहीं दिखा सका और न ही उसने इस कोर्ट के सामने कोई ऐसा दस्तावेज पेश किया जिससे उसे बिजली इस्तेमाल करने की इजाजत मिली हो.

धारा 135 के सब-सेक्शन (1) में दी गई अलग-अलग कैटेगरी को बिजली की चोरी (Electricity theft) की परिभाषा के तौर पर देखा जा सकता है

धारा 135 के सब-सेक्शन (1) में दी गई अलग-अलग कैटेगरी को बिजली की चोरी (Electricity theft) की परिभाषा के तौर पर देखा जा सकता है. इसलिए, यह कोर्ट FIR या चार्जशीट और संज्ञान लेने वाले आदेश में धारा 135 के सब-सेक्शन (1) में बताई गई खास कैटेगरी का जिक्र न होने में कोई गैर-कानूनी बात नहीं पाता है, क्योंकि अपराध का जिक्र धारा 135 के तहत किया गया है, भले ही उसमें अलग-अलग कैटेगरी हों, जो असल में सिर्फ परिभाषा हैं, जिसमें बिजली की चोरी (Electricity theft) का अपराध शामिल है.

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आवेदक के वकील ने ‘असीम उर्फ हासिम’ मामले के फैसले का जो हवाला दिया है, उसे इस मामले में लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह ‘गैंगस्टर एक्ट’ से संबंधित है और ‘गैंगस्टर एक्ट’ के तहत अलग-अलग अपराधों के लिए बिल्कुल अलग मतलब बताए गए हैं. ‘इंद्रेश पटेल’ मामले में, इस कोर्ट की डिवीजन बेंच ने यह राय दी है कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट की धारा 135 (1-A) के दूसरे प्रोविजो में बताई गई 24 घंटे की अवधि केवल निर्देश के तौर पर है और इसकी शर्तों के उल्लंघन के लिए कोई और नतीजा नहीं बताया गया है.

हालाँकि, ‘वरुण कुमार यादव’ मामले में कोऑर्डिनेट बेंच ने… एक अलग नजरिया अपनाया गया है और यह सिद्धांत लागू किया गया है कि जब किसी खास काम को एक खास तरीके से करने का निर्देश दिया जाता है, तो किसी भी अन्य तरीके से किया गया काम अमान्य और गैर-कानूनी होगा, जैसा कि डॉ. अरुण कुमार बनाम नगर निगम, बरेली 2017 (2) ADJ 638 मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना है. वरुण कुमार यादव के फैसले के खिलाफ SLP दायर की गई है और यह अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

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जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता ने कहा कि विद्युत आपूर्ति संहिता 2005 के खंड 8.2 और अधिनियम की धारा 57 के मद्देनजर, 24 घंटे की समय-सीमा का पालन न करने के स्पष्ट परिणाम कानून में मौजूद हैं. कोर्ट ने पूर्व के इंद्रेश पटेल मामले के फैसले को “पर इनक्यूरियम” (बिना उचित विचार के दिया गया) करार देते हुए वरुण कुमार यादव मामले के फैसले पर भरोसा जताया. इसके साथ ही कोर्ट ने बिजली विभाग को निर्देश दिया कि जिस अधिकारी (प्रतिवादी संख्या 3) ने समय पर एफआईआर दर्ज नहीं कराई, उसके खिलाफ भी उचित कार्रवाई शुरू की जाए.

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