” 1 बार जब व्यक्ति की Custody गैरकानूनी घोषित हो जाए, तो बी-वारंट उसे दोबारा हिरासत में रखने का आधार नहीं बन सकता”
कोर्ट ने कहा, अनुच्छेद 226 के तहत जारी रिट सीधे जेल प्रशासन पर बाध्यकारी होती है, इसके लिए मजिस्ट्रेट के अलग आदेश की आवश्यकता नहीं

एक बार जब व्यक्ति की Custody गैरकानूनी घोषित हो जाए, तो बी-वारंट उसे दोबारा Custody में रखने का आधार नहीं बन सकता, क्योंकि बी-वारंट केवल पहले से वैध Custody में रह रहे व्यक्ति की पेशी के लिए होता है, न कि किसी मुक्त व्यक्ति को Custody में लेने का प्राधिकार होता है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अनुच्छेद 226 के तहत जारी रिट सीधे जेल प्रशासन पर बाध्यकारी होती है, इसके लिए मजिस्ट्रेट के अलग आदेश की आवश्यकता नहीं होती.
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना ने अचल कुमार गुप्ता की की बेंच ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर उनकी Custody को पूरी तरह अवैध करार दिया और तत्काल रिहाई का आदेश दिया. कोर्ट ने मेरठ और मुकदमा गाजियाबाद/गौतमबुद्ध नगर में याची की निरंतर Custody को अवैध घोषित करते हुए उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया. साथ ही स्पष्ट किया कि यह आदेश भविष्य में किसी वैध प्रक्रिया के तहत याची की गिरफ्तारी पर रोक नहीं लगाता.
यह ‘हेबियस कॉर्पस’ रिट याचिका इस मांग के साथ दाखिल की गयी थी कि याचिकाकर्ता को अदालत में पेश करने का आदेश जारी किया जाए और पेश किए जाने पर उसे गैर-कानूनी Custody से रिहा करने का निर्देश दिया जाए. याचिकाकर्ता का कहना है कि उसकी Custody गैर-कानूनी है क्योंकि उसे 06.02.2026 के ‘बी-वारंट’ के आधार पर बुलाया गया था जबकि इस अदालत ने पहले ही उसकी रिहाई का आदेश दे दिया था. इसके बाद मजिस्ट्रेट ने 10.02.2026 के आदेश के जरिए उसे रिमांड पर भेज दिया था.
यह मामला केस क्राइम नंबर 4/2026 से जुड़ा है, जो भारतीय दंड संहिता, 1860 की धाराओं 420, 467, 468, 471, 102 के तहत थाना गंगा नगर जिला मेरठ में दर्ज किया गया था. याचिकाकर्ता का तर्क था कि उसके खिलाफ कार्रवाई और आदेश इस अदालत के 10.02.2026 के अंतरिम आदेश का उल्लंघन करते हैं.
वह अंतरिम आदेश क्रिमिनल मिसलेनियस रिट याचिका नंबर 27881/2025 में पारित किया गया था, जिसमें केस क्राइम नंबर 453/2025 (पुलिस स्टेशन बीटा 2, गौतम बुद्ध नगर; भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 318(4), 338 और 336(3) के तहत) में याचिकाकर्ता को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया गया था. केस क्राइम नंबर 453/2025 में रिहाई का आदेश इस आधार पर दिया गया था कि गिरफ्तारी मेमो में गिरफ्तारी के कारण स्पष्ट नहीं थे, जिससे गिरफ्तारी गैर-कानूनी हो गई थी.
मामले का सार यह है कि इस अदालत द्वारा क्रिमिनल मिसलेनियस मामले में 04.02.2026 को पारित आदेश के पालन में उसे Custody से असल में रिहा किए जाने से पहले ही… रिट याचिका संख्या 27881/2025 के मामले में, उन्हें मेरठ की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत (कोर्ट नंबर 7) ने B-वारंट के जरिए तलब किया था. अदालत में पेश किए जाने पर उन्हें Judicial Custody में भेज दिया गया.
याचिकाकर्ता का कहना है कि चूंकि इस अदालत के आदेश के कारण वह कानूनी Custody में नहीं थे इसलिए उन्हें B-वारंट के तहत तलब नहीं किया जा सकता था. B-वारंट Custody में मौजूद व्यक्ति के खिलाफ जारी किया जाता है, जिसका मतलब कानूनी Custody होता है. उक्त B-वारंट के जरिए उनकी पेशी और उसके बाद की रिमांड, दोनों ही गैर-कानूनी हैं; इस वजह से अपराध संख्या 4/2026 में उनकी Custody शुरू से ही गैर-कानूनी हो जाती है.
याची को Custody में रखना, न्यायिक आदेश का सीधा उल्लंघन
कोर्ट ने कहा कि याची को Custody में रखना, न्यायिक आदेश का सीधा उल्लंघन है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत जारी रिट सीधे जेल प्रशासन पर बाध्यकारी होती है, इसके लिए मजिस्ट्रेट के अलग आदेश की आवश्यकता नहीं होती. एक बार जब व्यक्ति की Custody गैरकानूनी घोषित हो जाए, तो बी-वारंट उसे दोबारा Custody में रखने का आधार नहीं बन सकता, क्योंकि बी-वारंट केवल पहले से वैध Custody में रह रहे व्यक्ति की पेशी के लिए होता है, न कि किसी मुक्त व्यक्ति को हिरासत में लेने का प्राधिकार होता है.
कोर्ट ने यह भी पाया कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में याची को नहीं दिए गए, जो अनुच्छेद 22(1) और धारा 47 का उल्लंघन है. इस आधार पर भी गिरफ्तारी अवैध है. पुलिस इंस्पेक्टर द्वारा याची की पुत्री को कथित रूप से परेशान किए जाने और धमकाए जाने की बात भी रिकॉर्ड पर आई, जिस पर कोर्ट ने संबंधित इंस्पेक्टर को तलब भी किया था.
मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने से इन्कार करने का आदेश रद्द, पुनः आदेश पारित करने का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना ने कन्नौज की तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्रद्धा भारती के 20 सितंबर 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें उन्होंने नवाब सिंह यादव व अन्य के खिलाफ पुलिस द्वारा दाखिल आरोप-पत्र पर संज्ञान लेने से इन्कार कर दिया था. यह मामला कन्नौज कोतवाली थाने में दर्ज केस से जुड़ा है, जिसमें भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था.
दरअसल यह घटना एक पॉक्सो मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई थी, जब गवाह डॉ. स्वास्तिका शालिनी को सत्र न्यायालय में गवाही देने के दौरान धमकाया गया और आरोपी के पक्ष में बयान देने के लिए दबाव बनाया गया. अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट ने 31 पन्नों का आदेश लिखते हुए सबूतों की विस्तृत समीक्षा की, मानो कोई “मिनी ट्रायल” चल रहा हो, जबकि संज्ञान लेने के चरण में मजिस्ट्रेट को केवल प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, यह देखना होता है, सबूतों की गुणवत्ता परखना नहीं.
हाईकोर्ट ने कमल शिवाजी पोकरनेकर बनाम महाराष्ट्र राज्य, रश्मि कुमार बनाम महेश कुमार भाड़ा और भगवंत सिंह बनाम पुलिस आयुक्त जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट को संज्ञान के चरण पर साक्ष्यों की सत्यता परखने का अधिकार नहीं है. कोर्ट ने यह भी माना कि मजिस्ट्रेट ने आरोपियों को सुना, लेकिन पीड़िता को नोटिस दिए बिना ही संज्ञान से इन्कार कर दिया, जो कि विधिक रूप से अनिवार्य है.
हाईकोर्ट ने 20 सितंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए मामला पुनः मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कन्नौज की अदालत को भेज दिया है, ताकि पुलिस रिपोर्ट पर नए सिरे से, इस फैसले में दी गई टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए, आदेश पारित किया जा सके.