Caste Certificate रद्द किए बिना कर्मचारी को सेवा से हटाना अवैध, 14 साल बाद कैट ने डाक कर्मी की बहाली का दिया आदेश
केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण प्रयागराज पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि जब तक किसी कर्मचारी का Caste Certificate सक्षम प्राधिकारी द्वारा रद्द नहीं किया जाता तब तक जाति (Caste) आधारित उसकी नियुक्ति को केवल संदेह के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता. यह आदेश जस्टिस ओम प्रकाश सप्तम एवं मोहन प्यारे की खंडपीठ ने डाक विभाग के कर्मचारी संदीप कुमार गोंड की याचिका पर उसके अधिवक्ता मयंक कृष्ण सिंह चंदेल व वीके चंदेल को सुनकर दिया है.
डाक चपरासी के पद पर अनुसूचित जाति (Caste) कोटे के तहत नियुक्त किया गया

कैट ने डाक विभाग में कार्यरत संदीप कुमार गोंड की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उसे सभी सेवा लाभ के साथ बहाल करने का निर्देश दिया है. संदीप कुमार गोंड को वर्ष 1999 में आजमगढ़ जिले के पटखौली में अतिरिक्त विभागीय डाक चपरासी के पद पर अनुसूचित जाति (Caste) कोटे के तहत नियुक्त किया गया था.
उनकी नियुक्ति को गणेश राम ने चुनौती दी थी. उसका आरोप लगाया था कि संदीप वास्तव में गोंड जाति (Caste) के नहीं बल्कि कहार जाति (Caste) का है जो अन्य पिछड़ा वर्ग में आती है. इसी शिकायत व तहसील की एक जांच रिपोर्ट के आधार पर विभाग ने वर्ष 2012 में दिलीप की सेवा समाप्त कर दी थी.
कैट ने स्पष्ट किया कि जब तक 1996 में जारी मूल Caste Certificate को फर्जी साबित कर रद्द नहीं किया जाता तब तक सेवा समाप्त करना पूरी तरह अवैध और अधिकार क्षेत्र से बाहर है. कैट ने कहा कि नियुक्ति के समय जो अधिसूचनाएं प्रभावी थीं उनके आधार पर हुए चयन को बाद के किसी नियम या स्थिति परिवर्तन से नहीं बदला जा सकता. विभाग ने बिना ठोस सबूत और बिना उचित प्रक्रिया का पालन किए नई जांच के आधार पर संदीप को हटाने का निर्णय लिया जो कानूनन गलत है.
न्यायाधिकरण ने याची की बर्खास्तगी के आदेशों खारिज करते हुए उसे तीन महीने के भीतर सेवा में वापस लेने और सभी पिछला बकाया देने का निर्देश दिया. यह भी कहा कि तीन महीने में भुगतान नहीं होता है तो बकाया राशि पर छह प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज देना होगा. कैट ने कहा कि विभाग चाहे तो जिला प्रशासन के माध्यम से Caste Certificate की नए सिरे से विधिवत जांच करा सकता है जिसमें दोनों पक्षों को सुनवाई का मौका दिया जाए.
आपराध में बरी रिटायर पुलिस कर्मी को पूरी पेंशन व परिलाभ भुगतान पर एसपी गाजीपुर को निर्णय लेने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एस पी गाजीपुर को याची को पूरी पेंशन व सेवा जनित समस्त परिलाभो के भुगतान की मांग में दाखिल प्रत्यावेदन पर चार हफ्ते में नियमानुसार आदेश पारित करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने याची को दो हफ्ते में सभी दस्तावेजों व अदालत से आपराधिक मामले में बरी होने के आदेश को एस पी के समक्ष पेश करने का आदेश दिया है.
यह आदेश जस्टिस प्रकाश पाडिया ने प्रयागराज के कृष्ण मोहन मिश्र की याचिका को निस्तारित करते हुए दिया है. याचिका पर अधिवक्ता एम ए सिद्दीकी ने बहस की. इनका कहना था कि याची के खिलाफ वाराणसी जीआरपी कैंट में एफआईआर दर्ज की गई थी. इस आपराधिक केस के कारण एसपी गाजीपुर ने 8 अक्टूबर 22 को मूल पेंशन व डीए का भुगतान करने का आदेश देते हुए शेष पर रोक लगा दी.
याची का कहना था कि वह आपराधिक केस में अदालत से बरी कर दिया गया. नियमानुसार उसे पूरी पेंशन व सेवा जनित अन्य लाभ मिलने चाहिए थे. किंतु नहीं दिया गया. सरकारी वकील ने कहा याची सभी दस्तावेज एस पी को दे तो वह शीघ्र निर्णय लेंगे.जिसपर कोर्ट ने यह आदेश दिया है.