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‘मृत व्यक्ति को Party बनाना सद्भावपूर्ण भूल के कारण हुआ और बाद में इसे सुधार लिया गया हो, तो कार्यवाही स्वतः ही ‘अमान्य’ नहीं हो जाती’

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा न्यायालयों और अधिकरणों को आवेदन के ‘स्वरूप’ के बजाय कार्यवाही के ‘मूल तत्व’ की जाँच अवश्य करनी चाहिए

‘मृत व्यक्ति को Party बनाना सद्भावपूर्ण भूल के कारण हुआ और बाद में इसे सुधार लिया गया हो, तो कार्यवाही स्वतः ही 'अमान्य' नहीं हो जाती’

कार्यवाही की शुरुआत में किसी मृत व्यक्ति को Party बनाना, यदि किसी सद्भावपूर्ण भूल के कारण हुआ हो और बाद में कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर लाकर इसे सुधार लिया गया हो, तो केवल इस आधार पर कार्यवाही स्वतः ही ‘अमान्य’ नहीं हो जाती. विशेष रूप से तब जब अन्य आवश्यक या संयुक्त Party पहले से ही सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उपस्थित हों और किसी भी प्रकार की हानि का कोई प्रमाण न हो.

न्यायालयों और अधिकरणों को आवेदन के ‘स्वरूप’ के बजाय कार्यवाही के ‘मूल तत्व’ की जाँच अवश्य करनी चाहिए. एक ऐसी प्रक्रियात्मक त्रुटि जिसे सुधारा जा सकता हो उसे मामले के गुण-दोष के आधार पर होने वाले निर्णय में बाधक नहीं बनना चाहिए और न ही आवेदन (Party) के नामकरण से संबंधित तकनीकी आपत्तियाँ न्याय के उद्देश्यों पर हावी हो सकती हैं.

इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस डॉ योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने रेंट केस को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि इस न्यायालय को चुनौती दिए गए आदेशों में कोई स्पष्ट अवैधता, क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि या विकृति नहीं दिखाई देती, जिसके आधार पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए हस्तक्षेप किया जाना उचित हो.

वर्तमान याचिका रेंट अथॉरिटी द्वारा रेंट केस संख्या 376/2025 (गौरव शुक्ला और अन्य बनाम दिवेंद्र कुमार सहगल और अन्य) में यूपी अधिनियम संख्या 16/2021 की धारा 4(3) के तहत पारित 10.09.2025 के आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी. याचिका में रेंट ट्रिब्यूनल द्वारा रेंट अपील संख्या 225/2025 में पारित आदेश को भी चुनौती दी गई थी जिसके द्वारा 10.09.2025 के आदेश की पुष्टि की गई है.

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तर्क दिया गया कि 2025 के आदेश के माध्यम से रेंट केस में प्रतिवादी रहे मृतक दिवेंद्र कुमार सहगल के कानूनी वारिसों (Party) को प्रतिस्थापित करने की मांग वाला एक आवेदन स्वीकार कर लिया गया था और कानूनी वारिसों (Party) को प्रतिस्थापित करने का निर्देश जारी किया गया था.

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता का कहना था कि रेंट अथॉरिटी के समक्ष कार्यवाही उक्त प्रतिवादी (Party) को पक्षकार (Party) बनाकर शुरू की गई थी जबकि उस समय वह पहले ही मृत हो चुके थे. मृतक के कानूनी वारिसों (Party) को बाद में केवल ‘पक्षकार बनाने’ के माध्यम से ही रिकॉर्ड पर लाया जा सकता था न कि ‘प्रतिस्थापन’ के माध्यम से.

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यह भी तर्क दिया गया है कि जब प्रतिस्थापन की अनुमति देने वाले आदेश को अपील में चुनौती दी गई तो अपीलीय न्यायालय ने इसे पक्षकारों की सूची में मात्र एक संशोधन मानते हुए रेंट अथॉरिटी द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया.

प्रतिवादियों की ओर से उपस्थित अधिवक्ता का कहना था कि रेंट अथॉरिटी के समक्ष आवेदन दाखिल करते समय देवेंद्र कुमार सहगल को पक्षकार (Party) बनाना एक गलतफहमी के कारण हुआ था और जब यह पता चला कि वह अब जीवित नहीं हैं तो एक आवेदन प्रतिस्थापन के लिए प्रस्तुत किया गया ताकि मृतक प्रतिवादी (Party) के कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर लाया जा सके. प्रतिवादी मकान मालिकों ने सद्भावनापूर्वक कार्य किया है और रेंट अथॉरिटी ने न्याय के हित में कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर लाने का निर्देश देकर बिल्कुल सही किया है.

हर एक संयुक्त किरायेदार को पक्षकार (Party) बनाना आवश्यक नहीं

कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पाया कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि अन्य संयुक्त किरायेदार पहले से ही कार्यवाही में पक्षकार (Party) थे. ऐसी परिस्थितियों में भले ही सभी कानूनी वारिसों को जो संयुक्त किरायेदार थे शुरू में पक्षकार (Party) न बनाया गया हो तो भी कार्यवाही विफल नहीं होगी क्योंकि बेदखली की कार्यवाही में हर एक संयुक्त किरायेदार को पक्षकार (Party) बनाना आवश्यक नहीं है.

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ज्यादा से ज्यादा ऐसे व्यक्तियों को ‘उचित पक्षकार’ (Party) माना जा सकता है. इसके अलावा, अब जब कानूनी वारिसों को पहले ही रिकॉर्ड पर ले लिया गया है तो केवल इस तथ्य से कि आवेदन बाद में दायर किया गया था, कार्यवाही की स्वीकार्यता या वैधता पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा.

यह बात अच्छी तरह से स्थापित है कि प्रक्रियात्मक नियमों का उद्देश्य न्याय को बढ़ावा देना है न कि उसमें बाधा डालना. प्रक्रिया न्याय की सेविका है और उसे उन मूल अधिकारों को विफल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती जहाँ विरोधी पक्ष को किसी भी प्रकार की हानि पहुँचने का कोई प्रमाण न हो. आवेदन के नामकरण (चाहे उसे ‘प्रतिस्थापन’ कहा जाए या ‘पक्षकार बनाना’) के संबंध में अत्यधिक तकनीकी आपत्तियाँ मामले के मूल तत्व पर तब हावी नहीं हो सकतीं जब आवश्यक पक्षकार पहले से ही सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उपस्थित हों और उन्हें अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया गया हो.
बेंच ने कहा

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कार्यवाही की शुरुआत में किसी मृत व्यक्ति को पक्षकार (Party) बनाना, यदि यह किसी सद्भावपूर्ण भूल के कारण हुआ हो और बाद में कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर लाकर इसे सुधार लिया गया हो, तो केवल इस आधार पर कार्यवाही स्वतः ही ‘अमान्य’ नहीं हो जाती विशेष रूप से तब जब अन्य आवश्यक या संयुक्त पक्षकार (Party) पहले से ही सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उपस्थित हों और किसी भी प्रकार की हानि का कोई प्रमाण न हो.

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न्यायालयों और अधिकरणों को आवेदन के ‘स्वरूप’ के बजाय कार्यवाही के ‘मूल तत्व’ की जाँच करनी चाहिए. एक ऐसी प्रक्रियात्मक त्रुटि, जिसे सुधारा जा सकता हो उसे मामले के गुण-दोष के आधार पर होने वाले निर्णय में बाधक नहीं बनना चाहिए. हस्तक्षेप केवल तभी उचित है जब ऐसी त्रुटि के सुधार से क्षेत्राधिकार संबंधी कोई भूल, स्पष्ट अन्याय या घोर मनमानी की स्थिति उत्पन्न होती हो न कि केवल नामकरण या प्रक्रिया से संबंधित तकनीकी आपत्तियों के आधार पर.

MATTERS UNDER ARTICLE 227 No. – 2014 of 2026 Kush Saigal And 2 Others V/s Gaurav Shukla And Another

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