Administrative Machinery में सुपीरियर रिस्पॉन्सिबिलिटी का सिद्धांत प्रभावी रूप से लागू किया जाना चाहिए: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस जांच में बरती गई कथित लापरवाही और Administrative उदासीनता पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए निष्पक्ष, वैज्ञानिक और जवाबदेह जांच व्यवस्था आवश्यक है. जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की. मामला एक 15 वर्षीय नाबालिग लड़की की गुमशुदगी और बाद में उसकी बरामदगी से संबंधित था. सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि मामले की जांच अपेक्षित मानकों के अनुरूप नहीं की गई.
अदालत ने जांच अधिकारी की कार्यप्रणाली और दाखिल चार्जशीट पर सवाल उठाते हुए कहा कि जांच में निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता का अभाव दिखाई देता है. न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णय सुभाष चंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का उल्लेख करते हुए याद दिलाया कि चार्जशीट दाखिल करने से पहले अभियोजन अधिकारी द्वारा उसकी समीक्षा किए जाने के निर्देश पहले ही दिए जा चुके हैं. अदालत ने यह भी पाया कि राज्य के विभिन्न जिलों में उक्त निर्णय के निर्देशों का समान रूप से पालन नहीं किया जा रहा है.
इस संबंध में अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) से स्पष्टीकरण मांगे जाने पर राज्य सरकार ने बताया कि निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की प्रक्रिया चल रही है. हालांकि, न्यायालय ने इस तर्क को संतोषजनक नहीं माना और टिप्पणी की कि आदेश के बाद लंबे समय तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया.
कानून के शासन को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि Administrative शक्तियों का उपयोग पारदर्शी और जिम्मेदार तरीके से हो
जस्टिस दिवाकर ने Administrative जवाबदेही के प्रश्न को भी प्रमुखता से उठाया. उन्होंने कहा कि Administrative Machinery में “सुपीरियर रिस्पॉन्सिबिलिटी” अर्थात वरिष्ठ Administrative अधिकारियों की जिम्मेदारी का सिद्धांत प्रभावी रूप से लागू किया जाना चाहिए, ताकि अधीनस्थ अधिकारियों की चूक, लापरवाही अथवा कदाचार के लिए वरिष्ठ स्तर पर भी जवाबदेही तय की जा सके. अदालत ने कहा कि कानून के शासन को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि Administrative शक्तियों का उपयोग पारदर्शी और जिम्मेदार तरीके से हो.
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हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रमाणित प्रति भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि संबंधित अधिकारी के भविष्य के दायित्वों और नियुक्तियों के मूल्यांकन में इस प्रकरण को ध्यान में रखा जा सके. हालांकि, चूंकि नाबालिग लड़की बरामद होकर सुरक्षित रूप से अपने परिजनों को सौंप दी गई है, इसलिए याचिका का मूल उद्देश्य पूरा होने पर उसका निस्तारण कर दिया गया. अदालत ने झांसी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और उनकी टीम द्वारा लड़की की सफल बरामदगी के लिए उनकी सराहना भी की.
हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म आरोपी को दी सशर्त अग्रिम जमानत
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महराजगंज जिले के नाबालिग से दुष्कर्म के आरोपी जवाहिर को अग्रिम जमानत प्रदान कर दी है. जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकलपीठ ने यह आदेश पारित किया. थाना नौतनवा, जिला महराजगंज में आरोपी जवाहिर के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई. आरोपी ने पीड़िता को शादी का झांसा देकर बहला-फुसलाया. पीड़िता सोलापुर पुलिस स्टेशन से बरामद हुई थी.
आरोपी के अधिवक्ता अतुल कुमार पांडेय ने कोर्ट को बताया कि यौन उत्पीड़न का कोई आरोप नहीं है. दर्ज पीड़िता के बयानों में भी परस्पर विरोधाभास है. पीड़िता ने स्वयं स्वीकार किया कि वह पिछले तीन वर्षों से आरोपी के साथ सहमति से संबंध में थी और एफआईआर दर्ज होने की तिथि को वह वयस्क थी. आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं है. कोर्ट ने सिद्धाराम सतलिंगप्पा म्हेत्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2011) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए मामले के समस्त तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद अग्रिम जमानत मंजूर की.