जानबूझकर ड्यूटी से अनुपस्थित रहने वाले Advocate के कारण अदालती कार्यवाही ठप नहीं हो सकती, कोर्ट ने शासकीय अधिवक्ता से 4 सप्ताह में मांगी रिपोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुधवार को Advocate द्वारा कोर्ट रूम के दरवाजे रोकने और कामकाज ठप करने की कोशिश पर कड़ी नाराजगी जताई. हालांकि सहमति से बने संबंध को बाद में अपराध बनाने के आरोप वाली एक एफआईआर में याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी. कोर्ट नंबर 10 में जस्टिस अजय भनोट और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की बेंच ने सलमान अख्तर व 2 अन्य की सुनवाई की. याचिकाकर्ताओं की ओर से कोई पैरवी के लिए कोई Advocate नहीं आया. जबकि कॉज लिस्ट में Advocate के नाम दर्ज थे. सरकारी Advocate भी अदालत में उपस्थित नहीं थे.
कोर्ट ने दर्ज किया कि बड़ी संख्या में Advocate ने बाहर खड़े होकर कोर्ट के प्रवेश द्वार बंद कर दिए और शोर मचाया, जिससे कार्यवाही बाधित हुई. मुख्य गेट से कोर्ट स्टाफ को भीतर नहीं आने दिया गया, तो पीठ ने स्टाफ को न्यायाधीशों के लिए बने दरवाजे से प्रवेश करने को कहा. पीठ ने स्पष्ट कहा कि जानबूझकर ड्यूटी से अनुपस्थित रहने वाले Advocate के कारण अदालती कार्यवाही ठप नहीं हो सकती और शासकीय अधिवक्ता को अपर शासकीय अधिवक्ता की अनुपस्थिति के कारणों पर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया.
Advocate ने बाहर खड़े होकर कोर्ट के प्रवेश द्वार बंद कर दिए और शोर मचाया, जिससे कार्यवाही बाधित हुई
कोर्ट ने कहा कि एफआईआर में ही याचिकाकर्ता संख्या 1 और प्रथम सूचनाकर्ता के बीच सहमति से संबंध और शारीरिक संबंध होने का उल्लेख है. याचिका से यह भी सामने आया कि दोनों पक्षों के बीच संपत्ति विवाद है. पीठ ने प्रथम दृष्टया माना कि एफआईआर के जरिए सहमति वाले संबंध को पूर्वव्यापी रूप से अपराध बनाने और दीवानी विवाद में आपराधिक कार्यवाही को दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश दिखती है.
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सलीब उर्फ शालू उर्फ सलीम केस के फैसले का हवाला दिया. उसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि बदले की भावना से दर्ज झूठे मामलों में एफआईआर रद्द करने की मांग पर अदालत को केवल आरोपों तक सीमित न रहकर आसपास की परिस्थितियों और जांच में जुटाई सामग्री को भी देखना चाहिए और पंक्तियों के बीच पढ़ने का प्रयास करना चाहिए.
कोर्ट ने प्रथम सूचनाकर्ता को नोटिस जारी की. राज्य सरकार को चार सप्ताह में जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया और अगली सुनवाई तक, या पुलिस रिपोर्ट दाखिल होने तक (जो पहले हो), याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी. मामला थाना जहांगंज जिला फर्रुखाबाद में दर्ज केस से जुड़ा है.
पुलिस पर लगे झूठे फँसाने के आरोप को “नकारा नहीं जा सकता”
याची की तरफ से Advocate ने कहा कि कृष्णा यादव को परिवार के अन्य सदस्यों के साथ झूठा फँसाया गया है. दोनों पक्षों में दीवानी विवाद है और पुलिस विपक्षी पक्ष का साथ दे रही थी. उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत 20 मई 2025 को आराजी संख्या 134 से विपक्षी पक्ष के बेदखली का आदेश हुआ था, जिसे पुलिस लागू नहीं कर रही थी.
आरोप है कि इसकी शिकायत चौकी प्रभारी (चौकी इब्राहिमपट्टी) के खिलाफ की गई थी, इसी कारण हेड कांस्टेबल ने एफआईआर में चौकी प्रभारी को प्रमुख गवाह बनाकर मुकदमा दर्ज कराया. यह भी कहा गया कि घायल की किसी भी चोट को गंभीर या जानलेवा नहीं बताया गया है और आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है.
कोर्ट ने कहा कि अराजी संख्या 134 से अतिक्रमण हटाने का आदेश पहले ही हो चुका था, ऐसे में प्रथम दृष्टया दोनों पक्षों को थाने बुलाना उचित नहीं था. कोर्ट ने यह भी कहा कि चौकी प्रभारी के खिलाफ शिकायत के कारण पुलिस कार्रवाई में आवेदक को झूठा फँसाए जाने के आरोप को खारिज नहीं किया जा सकता. घायल हेड कांस्टेबल की चोटें गंभीर या जानलेवा नहीं पाई गईं.