Auction में सबसे ऊंची बोली आने के बाद, केवल इस उम्मीद में नीलामी रद्द करना कि भविष्य में इससे अधिक कीमत मिल सकती है, कानून की नजर में अवैध
हाई कोर्ट ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण की मनमानी कार्रवाई को किया रद, एलॉटमेंट लेटर जारी करने का आदेश

यह पूरा विवाद गाजियाबाद विकास प्राधिकरण द्वारा कौशाम्बी योजना के ब्लॉक-ए स्थित आवासीय भूखंड संख्या A-252 (क्षेत्रफल लगभग 67.60 वर्ग मीटर) की Auction से जुड़ा है. प्राधिकरण ने इस भूखंड के लिए 15 अक्टूबर 2025 को Auction आयोजित की थी, जिसमें आरक्षित मूल्य 93,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर तय किया गया था.
इस नीलामी में याचिकाकर्ता अमित कुमार ने 1,11,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर की सबसे ऊंचे दर से बोली लगाई, जिसे स्वीकार कर लिया गया और याचिकाकर्ता ने बोली पत्र पर हस्ताक्षर भी किए. हालांकि, इसके बाद प्राधिकरण ने बिना किसी ठोस वैधानिक कारण के इस उच्चतम बोली को खारिज कर दिया और ई-मेल के माध्यम से केवल यह सूचना दी कि Auction निरस्त कर दी गई है. इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में रिट याचिका (Writ-C No. 44444 of 2025) दाखिल की.
ई-मेल के माध्यम से केवल यह सूचना दी कि Auction निरस्त कर दी गई है
जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस कुणाल रवि सिंह की बेंच ने मामले के मूल रिकॉर्ड का बारीकी से अध्ययन किया. अदालत ने पाया कि प्राधिकरण ने इस भूखंड के लिए बार-बार Auction रद्द करने का एक सिलसिला बना रखा था.

पहला प्रयास: 30 जुलाई 2025 को हुई पहली Auction में 1,95,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर की उच्चतम बोली आई थी, जिसे प्राधिकरण ने यह कहकर खारिज कर दिया कि चूंकि भूखंड पहली बार Auction हुआ है, इसलिए भविष्य में अधिक कीमत मिल सकती है.
लगातार गिरावट: प्राधिकरण की इस उम्मीद के विपरीत, बाद की नीलामियों में बोलियां कम होती गईं.
चौथा प्रयास: अंततः चौथी Auction में 2,06,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर की बोली स्वीकार की गई.
अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के ‘गोल्डन Food’ मामले के फैसले के अनुसार, यदि Auction पूरी तरह से वैध और पारदर्शी तरीके से हुई है और आरक्षित मूल्य से अधिक की उच्चतम बोली प्राप्त हुई है, तो केवल बेहतर लाभ की उम्मीद में उस बोली को खारिज नहीं किया जा सकता. प्राधिकरण का यह रवैया एक विधिक और पारदर्शी संस्था के रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता है.
सुनवाई के दौरान प्राधिकरण ने तर्क दिया कि याचिका के दौरान इस भूखंड की एक नई Auction हो चुकी है और दूसरे व्यक्ति को आवंटन किया जा चुका है, इसलिए वर्तमान याचिका खारिज होनी चाहिए. इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह आवंटन उच्च न्यायालय में याचिका लंबित रहने के दौरान किया गया था, इसलिए यह संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 52 के तहत ‘लिस पेंडेंस’ के सिद्धांत से प्रभावित होगा.
अदालत ने यह भी माना कि तीसरे पक्ष (बाद के खरीदार) ने सद्भाव (Good Faith) में बोली लगाई थी और उसे प्राधिकरण द्वारा उच्च न्यायालय में लंबित मामले की जानकारी नहीं दी गई थी. इसलिए, उस खरीदार को किसी बड़े नुकसान से बचाने के लिए वित्तीय न्याय और रेस्टीट्यूशन (Restitution) का आदेश देना आवश्यक है.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:
गाजियाबाद विकास प्राधिकरण द्वारा 27 अक्टूबर 2025 को जारी किया गया निरस्तीकरण आदेश और ई-मेल पूरी तरह से अवैध घोषित करते हुए रद्द किए जाते हैं.
15 अक्टूबर 2025 की Auction प्रक्रिया और उसमें याचिकाकर्ता अमित कुमार की सर्वोच्च बोली को बहाल किया जाता है.
प्राधिकरण को निर्देश दिया जाता है कि वह याचिकाकर्ता के पक्ष में नियमानुसार आवंटन पत्र (Allotment Letter) जारी करे.
बाद के आवंटी को जमा की गई पूरी राशि 6% वार्षिक ब्याज के साथ एक महीने के भीतर वापस करने का आदेश दिया गया है.