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System-generated जीएसटी नोटिस असंवैधानिक, जीएसटी पंजीकरण रद्द करने का आदेश और कारण बताओ नोटिस रद्द

System-generated जीएसटी नोटिस असंवैधानिक, जीएसटी पंजीकरण रद्द करने का आदेश और कारण बताओ नोटिस रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश वस्तु एवं सेवा कर (U.P.G.S.T.) अधिनियम के तहत जारी किए जाने वाले स्वचालित System-generated शो-कॉज नोटिस और पंजीकरण रद्द करने के आदेशों पर कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कानून के तहत अधिकार अधिकारियों के पास निहित हैं, न कि किसी ऑटोमेटेड डिजिटल System के पास.

जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने ‘मेसर्स शिवांश एसोसिएट्स’ द्वारा दायर याचिका (Writ Tax No. 4357 of 2026) का निपटारा करते हुए 7 मई 2024 के जीएसटी पंजीकरण रद्द करने के आदेश और 24 अप्रैल 2024 के कारण बताओ नोटिस को रद्द कर दिया.

याचिकाकर्ता शिवांश एसोसिएट्स के प्रोपराइटर शिवम सिंह ने एडवोकेट अंकुर जायसवाल के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. याचिका में 07.05.2024 को उनका GST पंजीकरण रद्द करने के आदेश को चुनौती दी गई थी. विभाग द्वारा जारी किए गए नोटिस में किसी क्षेत्राधिकारी (Jurisdictional Officer) का नाम या पदनाम अंकित नहीं था, बल्कि उसमें लिखा था:

“Jurisdictional Officer System Generated Notice, Contact Jurisdiction Office for further process.”

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सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अपने ही एक पूर्व निर्णय ‘मेसर्स एमवाई एंट भट्ठा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ (2025:AHC:78209-DB) का उल्लेख किया. राजस्व विभाग ने तर्क दिया था कि GSTN की सलाह के अनुसार अधिकारी डिजिटल हस्ताक्षर के माध्यम से लॉगिन करते हैं, इसलिए हर आदेश पर डिजिटल हस्ताक्षर होना अनिवार्य नहीं है.

कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए टिप्पणी की कि अधिकार अधिकारी के पास है, System के पास नहीं. कानून के तहत किसी व्यवसायी का पंजीकरण रद्द करने या नोटिस जारी करने की शक्ति सक्षम अधिकारी को दी गई है, न कि कंप्यूटर System-generated को. यदि नोटिस या आदेश में अधिकारी का नाम और कार्यालय अंकित न हो और उसे महज “System-generated” करार दिया जाए, तो उसे वैध नहीं ठहराया जा सकता.

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अदालत ने माना कि बिना किसी अधिकारी के नाम और पदनाम के जारी किया गया कारण बताओ नोटिस और उसके आधार पर पारित रद्द करने का आदेश अधिनियम और नियमों के विपरीत है. हाईकोर्ट ने विवादित रद्द करने के आदेश (दिनांक 07.05.2024) और कारण बताओ नोटिस (दिनांक 24.04.2024) को निरस्त कर दिया. हालांकि, कोर्ट ने राजस्व अधिकारियों को कानून के अनुसार उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए नया नोटिस जारी करने की छूट दी है.

कर अधिकारी द्वारा गलत तरीके से ब्लॉक किया गया ₹2.90 करोड़ का आईटीसी होगा बहाल

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कर अधिकारियों को एक बड़ी राहत देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई अधिकारी बिना अधिकार क्षेत्र के टैक्स क्रेडिट से संबंधित कार्रवाई करता है, तो उसे निरस्त किया जाना आवश्यक है. अदालत ने एक अहम मामले में सुनवाई करते हुए मेसर्स डी कंट्रोल एंड इलेक्ट्रिक प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में यह आदेश पारित किया है.

याचिकाकर्ता कंपनी की ओर से दायर रिट याचिका (Writ Tax No. 4351 of 2026) में यह चुनौती दी गई थी कि प्रतिवादी संख्या-1 (डिप्टी कमिश्नर स्टेट टैक्स, सेक्टर-21, लखनपुर, कानपुर नगर) द्वारा 17 सितंबर 2026 को उत्तर प्रदेश वस्तु एवं सेवा कर (UPGST) नियम, 2017 के नियम 86A के तहत कंपनी के इलेक्ट्रॉनिक क्रेडिट लेजर में मौजूद ₹2,90,45,935/- (लगभग 2.90 करोड़ रुपये) के इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) को ब्लॉक कर दिया गया था. कंपनी ने इस कार्रवाई को गैरकानूनी बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की थी.

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मामले की सुनवाई जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूमा चतुर्वेदी की खंडपीठ के समक्ष हुई. सुनवाई के दौरान, राज्य के स्थायी वकील ने टेलीफोनिक निर्देशों का हवाला देते हुए न्यायालय के समक्ष स्वीकार किया कि उक्त आईटीसी (ITC) को ऐसे अधिकारी द्वारा गलती से ब्लॉक कर दिया गया था जिसके पास इसके लिए pecuniary jurisdiction (धन संबंधी अधिकारिता) नहीं था.

इसके साथ ही उन्होंने यह भरोसा दिलाया कि इस आईटीसी को अनब्लॉक (बहाल) करने का आदेश आज ही पारित कर दिया जाएगा. अदालत ने सरकारी वकील द्वारा दिए गए इस आश्वासन को दर्ज करते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया. इस फैसले से कंपनी को बड़ी राहत मिली है और उम्मीद जताई जा रही है कि टैक्स विभाग जल्द ही उनके क्रेडिट लेजर से रोक हटा लेगा.

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