इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: सर्जरी से जेंडर बदलवाकर Female बनने वाला 69 बीएनएस के तहत महिला नहीं माना जाएगा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई Female जो जन्म से पुरुष था और बाद में लिंग परिवर्तन सर्जरी (सेक्स री असाइनमेंट सर्जरी) कराकर महिला बना हो वह भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के दायरे में ‘Female’ की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आएगा. कोर्ट ने यह अहम टिप्पणी एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान की और आरोपी की जमानत मंजूर कर ली है. यह मामला उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के इज्जतनगर पुलिस स्टेशन से जुड़ा है.
इज्जतनगर थाने में दर्ज कराए गए मुकदमे (क्राइम नंबर 0728/2026) के अनुसार, प्रथम सूचना रिपोर्ट जेंडर कराकर पुरुष से महिला बनी Female द्वारा दर्ज कराई गई थी. उसका आरोप था कि वह लगभग डेढ़ साल तक आरोपी मोहम्मद साकिर उर्फ मोहम्मद साकिर के साथ रिश्ते में रही. आरोप लगाया कि आरोपी ने उससे शादी करने का वादा करके उसका भरोसा जीता. इसी भरोसे के चलते उसने आरोपी को पांच लाख रुपये से अधिक की रकम भी दी.
एफआईआर दर्ज करने के लिए दी गयी तहरीर में महिला ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए. बाद में आरोपी तथा उसके परिवार वालों ने शादी से इनकार कर दिया. इस मामले में पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69, 352 और 351(3) के तहत मामला दर्ज किया. मुकदमा दर्ज होने के बाद आरोपी ने ट्रायल कोर्ट में जमानत के लिए आवेदन किया लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली तो उसने हाई कोर्ट का रुख किया और जमानत के लिए आवेदन दाखिल किया.
क्या धारा 69 बीएनएस के उद्देश्य के लिए जेंडर चेंज कराने वाली महिला को ‘Female’ माना जाएगा
प्रकरण की सुनवाई के दौरान जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की सिंगल बेंच के समक्ष एक जटिल और बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सवाल यह तय करना था कि “क्या धारा 69 बीएनएस के उद्देश्य के लिए जेंडर चेंज कराने वाली महिला को ‘Female’ माना जाएगा?”
सुनवाई के दौरान आवेदक के वकील ने दलील दी कि पीड़िता/शिकायतकर्ता मूल रूप से पुरुष के रूप में पैदा हुई थी और उसने बाद में वल्वल रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी कराई और महिला बन गयी थी. मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) की मेडिकल रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई थी कि पीड़िता जैविक रूप से महिला नहीं है, बल्कि लिंग परिवर्तित पुरुष है, जिसके पास गर्भाशय भी नहीं है.
कोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 के विभिन्न प्रावधानों का विश्लेषण किया:
Female की परिभाषा: BNS की धारा 2(35) के तहत ‘महिला’ शब्द को परिभाषित किया गया है, जिसके अनुसार महिला का मतलब केवल और केवल “एक महिला मानव शरीर” (female human being) से है.
जेंडर की परिभाषा: BNS की धारा 2(10) में ‘जेंडर’ (लिंग) को परिभाषित किया गया है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि ‘वह’ (he) सर्वनाम का उपयोग किसी भी व्यक्ति के लिए हो सकता है, चाहे वह पुरुष हो, महिला हो या ट्रांसजेंडर. इसके स्पष्टीकरण में यह भी कहा गया है कि ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द का वही अर्थ होगा जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम, 2019 की धारा 2(k) में दिया गया है.
अलग और स्वतंत्र पहचान: कोर्ट ने रेखांकित किया कि कानून की नजर में ‘Female’ और ‘ट्रांसजेंडर’ को दो अलग-अलग और स्वतंत्र पहचान के रूप में परिभाषित किया गया है. ट्रांसजेंडर अधिनियम की धारा 2(k) के तहत ऐसे व्यक्ति आते हैं जिनका लिंग जन्म के समय तय किए गए लिंग से मेल नहीं खाता है. इसमें सर्जरी या हार्मोन थेरेपी कराने वाले ट्रांस-मैन या ट्रांस-वूमैन भी शामिल हैं, लेकिन वे कानूनी रूप से ‘Male’ या ‘Female’ की श्रेणी में न आकर ‘ट्रांसजेंडर’ की विशेष श्रेणी में ही बने रहते हैं.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि BNS की धारा 69 उन मामलों पर लागू होती है जहां किसी ‘Female’ के साथ धोखे से या शादी के झूठे वादे के तहत शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं. चूंकि इस धारा में विशेष रूप से ‘महिला’ शब्द का प्रयोग किया गया है और वैधानिक रूप से ट्रांसजेंडर एक अलग पहचान है, इसलिए इस धारा को ट्रांसजेंडर महिलाओं पर विस्तारित नहीं किया जा सकता.

फैसले में इस बात का भी उल्लेख किया गया कि गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट संख्या 246 में यह सिफारिश की थी कि BNS के अंतर्गत दुष्कर्म और इस तरह के अपराधों के प्रावधानों में ट्रांसजेंडर महिलाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि मौजूदा कानून केवल Female तक सीमित है. संसद ने इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया और BNS में ‘महिला’ शब्द को उसके मूल रूप में ही रहने दिया, जिसमें ट्रांसजेंडर महिलाओं को शामिल नहीं किया गया.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का शारीरिक या यौन उत्पीड़न किया जाता है, तो उसके लिए ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 18(d) के तहत अलग से सजा का प्रावधान किया गया है. प्रकरण के तथ्यों और कानूनी बिंदुओं पर विचार करने के बाद कोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया इस मामले में धारा 69 बीएनएस का अपराध नहीं बनता है. इसके चलते कोर्ट ने आरोपी मो. साकिर उर्फ मोहम्मद साकिर को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया.
फैसले में कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी और व्याख्या केवल और केवल भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के संदर्भ में ही सीमित है और इसे किसी अन्य अपराध या मामले पर स्वतः लागू नहीं समझा जाना चाहिए.