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37 साल पुराने Criminal Case में ‘कुंभकरण’ को आजीवन कारावास की सजा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रखी बरकरार

37 साल पुराने Criminal Case में ‘कुंभकरण’ को आजीवन कारावास की सजा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रखी बरकरार

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक Criminal Case पर अपना फैसला सुनाते हुए लगभग 37 साल पुराने मामले में निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह से बरकरार रखा है. जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की बेंच ने Criminal अपील संख्या 1697/1989 में फैसला देते हुए अपीलकर्ता कृष्ण कुमार उर्फ कुंभकरण की अपील को खारिज कर दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा और जुर्माने का आदेश पूरी तरह से वैध और साक्ष्यों पर आधारित है.

यह पूरा Criminal Case 24 फरवरी 1987 का है. उस समय उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के नैकपुर, मदीनाथ क्षेत्र में भीम सिंह नामक व्यक्ति का जमीन को लेकर कुछ लोगों से पुराना विवाद चल रहा था. अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना की रात लगभग 11:15 बजे जब भीम सिंह चीनी मिल से अपने घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में अभियुक्तों, भगवान दास, राम सहाय, छोटे और कुंभकरण ने उन्हें घेर लिया.

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आरोप था कि राम सहाय, छोटे और भगवान दास ने भीम सिंह को मजबूती से दबोच लिया और कुंभकरण को ललकारते हुए कहा, “किसका इंतजार कर रहे हो? इस कमीने को जान से मार दो!” इसके बाद अपीलकर्ता-अभ्युक्त कुंभकरण ने जान से मारने की नीयत से एक धारदार हथियार से भीम सिंह के पेट में गंभीर वार कर दिया. भीम सिंह की चीख-पुकार सुनकर चश्मदीद गवाह सोहन लाल और बुद्धपाल मौके पर पहुंचे और पूरी घटना को इलेक्ट्रिक पोल की रोशनी में अपनी आंखों से देखा.

गंभीर रूप से घायल भीम सिंह एक रिक्शे पर बैठकर थाने पहुंचे और Criminal Case में प्राथमिक रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज कराई. इसके बाद उन्हें तुरंत जिला अस्पताल, बरेली में भर्ती कराया गया. अस्पताल में उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए, कार्यपालक मजिस्ट्रेट लीलाधर नैनवाल ने डॉक्टर की फिटनेस का प्रमाण पत्र प्राप्त करने के बाद उनका मृत्युकालीन घोषणा-पत्र (Dying Declaration) दर्ज किया.

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इलाज के दौरान 25 फरवरी 1987 की सुबह लगभग 7:45 बजे भीम सिंह की मौत हो गई. इसके पश्चात Criminal Case को सत्र न्यायालय में भेजा गया, जहां अपर सत्र न्यायाधीश-9वें, बरेली ने 31 जुलाई 1989 को फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी कृष्ण कुमार उर्फ कुंभकरण को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 के तहत दोषी करार दिया और आजीवन कारावास के साथ 100 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई. इसी फैसले को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में यह अपील दाखिल की गई थी.

उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की ओर से न्यायमित्र (Amicus Curiae) के रूप में सिकंदर बी कोचर ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से विद्वान अपर महाधिवक्ता उपस्थित रहे. बचाव पक्ष की ओर से Criminal Case में मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया कि अभियोजन पक्ष के बयानों में अंतविरोध है.

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एफआईआर में जहां यह कहा गया कि घायल रिक्शे से अस्पताल पहुंचा था, वहीं मृत्युकालीन घोषणा-पत्र में कहा गया कि उसे एक ट्रैफिक कांस्टेबल द्वारा लाया गया था. इसके अलावा, बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि घटना अचानक हुई हाथापाई का परिणाम थी, जहां अभियुक्त ने अपने विकलांग पिता की रक्षा के लिए आत्मरक्षा के अधिकार का प्रयोग किया था.

राज्य सरकार के वकील ने इन तर्कों का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि मृत्युकालीन घोषणा-पत्र और चश्मदीद गवाहों के बयान पूरी तरह से सुसंगत हैं. मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज कराए गए मृत्युकालीन घोषणा-पत्र में मुख्य हमलावर के रूप में केवल कृष्ण कुमार का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है, जो कानूनी रूप से बेहद मजबूत साक्ष्य माना जाता है. खंडपीठ ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का बारीकी से विश्लेषण किया.

कोर्ट ने ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न पुराने फैसलों और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (वर्तमान में भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 26) के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि मृत्युकालीन घोषणा-पत्र (Dying Declaration) का कानूनी महत्व बहुत अधिक होता है, क्योंकि यह माना जाता है कि मृत्यु की दहलीज पर खड़ा व्यक्ति झूठ नहीं बोलता.

Criminal Case में अभियुक्त की तरफ से कोई भी चिकित्सीय साक्ष्य या चोट के निशान पेश नहीं किए गए

न्यायालय ने यह भी पाया कि मृतक के शरीर पर मिले अन्य घाव (बचाव के दौरान हाथ पर लगे घाव) इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमला घातक और सुनियोजित था. बचाव पक्ष द्वारा आत्मरक्षा का जो दावा प्रस्तुत किया गया था, वह पूरी तरह से निराधार और मनगढ़ंत पाया गया, क्योंकि Criminal Case में अभियुक्त की तरफ से कोई भी चिकित्सीय साक्ष्य या चोट के निशान पेश नहीं किए गए.

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सभी पक्षों को सुनने और पत्रावलियों का अध्ययन करने के बाद, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने Criminal Case में निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह से न्यायसंगत ठहराया. उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता कृष्ण कुमार उर्फ कुंभकरण की Criminal अपील को खारिज कर दिया और उसे निचली अदालत के आदेश के तहत अपनी शेष सजा काटने के लिए तुरंत संबंधित अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है.

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