Departmental Proceeding शुरू करने का मतलब यह नहीं है कि अनुशासनात्मक अधिकारी केवल बड़ी सजा देने को बाध्य होगा
हाई कोर्ट ने कहा, तथ्यों व परिस्थितियों पर विचार के बाद अफसर तय करेगा कि कर्मचारी को छोटी सजा दी जाएगी या बड़ी

अनुशासनात्मक अधिकारी को सजा की मात्रा के बारे में निर्णय केवल मामले के सबूतों और परिस्थितियों के आधार पर लेना होता है, न कि इस आधार पर कि जांच यू.पी. पुलिस ऑफिसर्स ऑफ सब-ऑर्डिनेट रैंक (पनिशमेंट एंड अपील) रूल्स 1991′ के नियम 14(1) के तहत की गई थी या 14(2) के तहत. इस व्यवस्था पर भरोसा करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मनीष कुमार निगम की बेंच ने Departmental Proceeding के तहत दी गयी चार्जशीट को चैलेंज करते हुए इसे रद्द करने की मांग में दाखिल याचिका खारिज कर दी है.
कोर्ट ने कहा कि यदि 1991 के नियमों के नियम 14(2) के तहत जांच की जाती है और अनुशासनात्मक अधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में बड़ी सजा दी जानी चाहिए, तो अधिकारी 1991 के नियमों के नियम 14(1) के तहत कार्यवाही करने के लिए बाध्य है, जो बड़ी सजा देने की प्रक्रिया का प्रावधान करता है. लेकिन इसका उल्टा करना सही नहीं है.
Departmental Proceeding के समय तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर दोषी कर्मचारी को छोटी सजा देने में अनुशासनात्मक अधिकारी के लिए कोई बाधा नहीं
1991 के नियमों के नियम 14(1) के तहत Departmental Proceeding करते समय, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर दोषी कर्मचारी को छोटी सजा देने में अनुशासनात्मक अधिकारी के लिए कोई बाधा नहीं है. तथ्यों के अनुसार याचिकाकर्ता विनीता कुमारी यू.पी. पुलिस में कांस्टेबल है. उस पर ‘यू.पी. पुलिस ऑफिसर्स ऑफ सब-ऑर्डिनेट रैंक (पनिशमेंट एंड अपील) रूल्स 1991’ लागू होते हैं. 22.03.2025 को, ‘रूल्स 1991’ के नियम 14(1) के तहत Departmental Proceeding में याचिकाकर्ता को एक चार्जशीट जारी की गई थी.
Departmental Proceeding के तहत चार्जशीट में आरोप लगाया गया था कि पुलिस सेवा में शामिल होने के बाद, याचिकाकर्ता ने अपने पहले पति को तलाक दिए बिना दुर्गेश कुमार गौतम से शादी कर ली और इसलिए, याचिकाकर्ता ने नियम 29 का उल्लंघन किया है. याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि 1991 के नियमों के नियम 14(1) के तहत शुरू की गई Departmental Proceeding बड़ी सजा देने के लिए होती है. 1956 के नियमों के नियम 29 का उल्लंघन करने पर केवल छोटी सजा दी जा सकती है, इसलिए अगर कोई कार्यवाही शुरू की जानी थी, तो वह 1991 के नियमों के नियम 14(2) के तहत ही की जानी चाहिए थी.
अधिवक्ता ने तर्क दिया कि 1956 के नियमों के नियम 29 के उप-नियम (3) के अनुसार, उप-नियम (1) और (2) का उल्लंघन करने पर कम-से-कम सजा तीन साल तक इंक्रीमेंट रोकना है. चूंकि 1956 के नियमों के नियम 29 के उप-नियम (1) और (2) के उल्लंघन के लिए केवल मामूली सजा का प्रावधान है, इसलिए 1991 के नियमों की धारा 14(1) के तहत कार्यवाही शुरू करना गलत है, क्योंकि यह धारा बड़ी सजा देने की प्रक्रिया से संबंधित है.
याचिकाकर्ता के वकील ने कमलुद्दीन खान बनाम यू.पी. राज्य और अन्य (रिट ए नंबर 15046/2025, फैसला 28.10.2025), प्रभात भटनागर बनाम यू.पी. राज्य और अन्य (2023 (9) ADJ 615), अनीता यादव बनाम यू.पी. राज्य और अन्य (2017 (6) ADJ 273), कुबेर सिंह बनाम यू.पी. राज्य और अन्य (रिट ए नंबर 21010/2011, फैसला 14.02.2020) और कई अन्य फैसलों का हवाला दिया.
कहा कि इस कोर्ट का लगातार यह मानना रहा है कि 1956 के नियमों के नियम 29 के उप-नियम (1) और (2) के उल्लंघन के लिए केवल मामूली सजा ही दी जा सकती है, और इसलिए, 1991 के नियमों की धारा 14(1) के तहत याचिकाकर्ता के खिलाफ शुरू की गई Departmental Proceeding गलत है और इसे रद्द किया जाना चाहिए.
सरकारी वकील ने तर्क दिया कि 1956 के नियमों के नियम 29 के उप-नियम (3) को यूपी के नियम (2) द्वारा हटा दिया गया है. इसलिए, सरकारी कर्मचारी आचरण (चौथा संशोधन) नियम, 1976 के मामले में याचिकाकर्ता द्वारा जिन फैसलों का हवाला दिया गया है, वे लागू नहीं होते. ऐसा इसलिए है क्योंकि वे फैसले इस तथ्य पर विचार किए बिना दिए गए थे कि 1956 के नियमों के नियम 29 के उप-नियम (3) को 1976 में हटा दिया गया था. स्टैंडिंग काउंसिल ने खुर्शीद आलम खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में 09.02.2015 को तय की गई सिविल अपील संख्या 1662/2015 के फैसले का हवाला दिया.
तर्क दिया कि 1956 के नियमों के नियम 29 के सब-रूल (3) का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि नियम 29 के सब-रूल (1) और (2) के उल्लंघन के मामले में केवल मामूली सजा ही दी जा सकती है. कहा कि 1976 तक मौजूद सब-रूल (3) में यह प्रावधान था कि सब-रूल (1) और (2) के उल्लंघन के लिए कम से कम सजा तीन साल के लिए इंक्रीमेंट रोकना होगी. इसलिए, तीन साल के लिए इंक्रीमेंट रोकना वह न्यूनतम सजा है जो 1956 के नियमों के नियम 29 के सब-रूल (1) और (2) के उल्लंघन के मामले में दी जा सकती थी.
इसका यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि नियम 29 के सब-रूल (1) और (2) के उल्लंघन के लिए केवल मामूली सजा ही दी जा सकती है. यह न्यूनतम सजा है और ऐसी कोई रोक नहीं है कि नियम 29 के सब-रूल (1) और (2) के उल्लंघन के लिए कोई अन्य सजा नहीं दी जा सकती. स्टैंडिंग काउंसिल ने मोहम्मद हाशिम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2017 (2) SCC 198), मध्य प्रदेश राज्य बनाम विक्रम दास (2019 4 SCC 125) और दशरथ बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025 SCC OnLine SC 1054) के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया.
कोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कहा चूँकि 1956 के नियमों के नियम 29 का उप-नियम (3) 1976 में ही हटा दिया गया था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि 1956 के नियमों के नियम 29 के उप-नियम (1) और (2) के उल्लंघन के मामले में केवल मामूली सजा, यानी तीन इंक्रीमेंट रोकना ही दिया जा सकता है. 1956 के नियमों के नियम 29 के उप-नियम (1) और (2) के उल्लंघन के लिए सजा देना नियुक्ति करने वाले अधिकारी के विवेक पर निर्भर करता है, जो मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए तय किया जाता है.
WRIT – A No. – 12376 of 2026; Vinita Kumari V/s The State of U.P. and 4 others