घटना स्थल पर किसी Eyewitness गवाह की मौजूदगी संदिग्ध है, तो अभियोजन की कहानी की प्रमाणिकता अविश्वसनीय, हत्या का आरोपित 40 साल बाद बरी

इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा पाने वाल एटा के मनी राम को दोषमुक्त कर दिया है. यह आपराधिक अपील मणि राम और हेमराज उर्फ हप्पू द्वारा दायर की गई थी. उन्होंने एटा के तृतीय अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा 25 मई 1987 को दिए गए फैसले और आदेश को याचिका में चुनौती दी थी.
Eyewitness ने थाना सोरों में मौखिक सूचना दर्ज कराई
यह फैसला सत्र वाद संख्या 475/1986 (राज्य बनाम मणि राम व अन्य) में सुनाया गया था, जो थाना सोरों, जिला एटा के केस क्राइम नंबर 182/1986 (302 आईपीसी) से संबंधित था. अपीलकर्ताओं को ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. तथ्यों के अनुसार शिकायतकर्ता छोब सिंह (Eyewitness) जो मोती राम के बेटे हैं, ने 20.09.1986 को थाना सोरों में मौखिक सूचना दर्ज कराई कि रात में वह अपने पिता मोती राम के साथ अपने ट्यूबवेल पर लेटे हुए थे.
रात करीब 9:30 बजे, टाकुआपार के रहने वाले उदल के बेटे मणि राम और श्री राम के बेटे हेमराज उर्फ हप्पू असलहा लेकर पहुंचे और कहा कि अपना ट्यूबवेल यहाँ से उखाड़ो और ले जाओ. इसका विरोध करने पर वह मोती राम को खेत में खींच ले गये और गोली मारकर हत्या कर दी. गोली की आवाज सुनकर बेटे (Eyewitness) और खेत में काम कर रहे लोगों ने ललकारा तो आरोपित भाग खड़े हुए. सूचना के आधार पर पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की और कार्रवाई में जुट गयी.
विवेचना के बाद पुलिस ने घटना के संबंध में चार्जशीट दाखिल की. मामले को मजिस्ट्रेट ने सुनवाई के लिए सेशन कोर्ट भेज दिया. ट्रायल कोर्ट ने 15.01.1987 को आरोपियों मणि राम और हेमराज उर्फ हप्पू के खिलाफ IPC की धारा 302 के तहत आरोप साबित पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनायी थी. इसी फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी थी. हाई कोर्ट में अपील पेंडिंग रहने के दौरान ही हेमराज उर्फ हप्पू की मौत हो गयी तो कोर्ट ने सिर्फ मनी राम के मामले में सुनवाई की और फैसला सुनाया.

जीवित अपीलकर्ता मनी राम के वकील ने तर्क दिया कि घटना सितंबर के महीने में हुई थी, जो बारिश का मौसम होता है. बारिश के मौसम में रात में दूर की चीजों को देखना मुश्किल होता है. मृतक मोती राम का शव बाजरे के खेत में मिला जो मृतक के ट्यूब-वेल से करीब 60 से 70 कदम की दूरी पर था. इस स्थिति में मृतक के बेटे (Eyewitness) का आरोपियों को पहचानना सवाल खड़े करता है. वह भी तब जबकि आसपास के अन्य खेतों में भी बाजरे की फसल लगी हुई थी.
उन्होंने Eyewitness गवाहों के बयानों में विसंगतियों की तरफ कोर्ट का ध्यान आकृष्ट कराया और कहा कि हर चश्मदीद गवाह का बयान दूसरे गवाहों के बयानों से मेल नहीं खाता. शिकायतकर्ता की मौके पर मौजूदगी भी सवालों के घेरे में है. तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट अभियोजन पक्ष के सबूतों को सही नजरिए से और कानून के अनुसार समझने में विफल रहा. ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि और सजा का फैसला और आदेश किसी ठोस सबूत के बिना है और कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है.
स्टेट की तरफ से एजीए ने तर्क दिया कि आरोपी तीन Eyewitness गवाहों की मौजूदगी में ट्यूबवेल पर पहुंचे थे. शिकायतकर्ता खुद पिता के साथ मौजूद था. अगर Eyewitness के बयानों में कोई विरोधाभास या कमी है, तो वे बहुत मामूली और छोटी-मोटी हैं, जिनका अभियोजन पक्ष के इन चश्मदीद गवाहों की गवाही और सबूतों की सच्चाई पर कोई असर नहीं पड़ता. दोनों पक्षों के तर्कों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों को परखने के बाद कोर्ट ने बेटे की गवाही को संदिग्ध माना.
फैसला सुनाते हुए बेंच ने कहा कि कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि यदि घटना स्थल पर किसी चश्मदीद गवाह (Eyewitness) की मौजूदगी संदिग्ध है, तो अभियोजन पक्ष की कहानी की सच्चाई और प्रमाणिकता के बारे में ऐसे Eyewitness गवाह की गवाही बहुत संदिग्ध और अविश्वसनीय हो जाती है. ऐसी स्थिति में, ऐसे संदिग्ध और अविश्वसनीय सबूतों के आधार पर हत्या जैसे गंभीर अपराध के लिए किसी आरोपी को दोषी ठहराना पूरी तरह से असुरक्षित है.
कोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एटा द्वारा पारित निर्णय और दोषसिद्धि एवं सजा के आदेश के अध्ययन से पता चलता है कि ट्रायल कोर्ट ने अपने निष्कर्षों के समर्थन में जो तर्क दिये हैं, वह किसी भी ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य द्वारा समर्थित नहीं हैं. क्या अभियोजन पक्ष के Eyewitness गवाह वास्तव में घटना स्थल पर मौजूद थे और क्या उन्होंने अपराध को अपनी आँखों से देखा था. ट्रायल कोर्ट ने, उपरोक्त अभियोजन पक्ष के गवाहों के साक्ष्यों की आलोचनात्मक जांच किए बिना, उनकी गवाही पर गलत भरोसा किया, जो सजा के लिए अत्यधिक संदिग्ध और अविश्वसनीय प्रतीत होता है.
ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ताओं के खिलाफ आरोप तय करते समय आईपीसी की धारा 34 की सहायता लागू नहीं करने के बावजूद, संबंधित अपीलकर्ताओं को कोई विशिष्ट भूमिका बताए बिना जीवित अपीलकर्ता को धारा 302 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया. ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्ष और तर्क किसी भी ठोस सबूत से रहित हैं और कानून की नजर में पूरी तरह से अस्थिर हैं. ऐसे में ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित निर्णय और दोषसिद्धि का आदेश और सजा कानून की नजर में टिकाऊ नहीं है और रद्द किए जाने योग्य है.