Witness बहुत विश्वसनीय न हों और सबूत ठोस, यकीन दिलाने वाले और निर्णायक न हों तो उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रेन में हुई हत्या के चार आरोपितों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया

Witness बहुत विश्वसनीय न हों और उनके सबूत ठोस, यकीन दिलाने वाले और निर्णायक न हों तो उन Witness के बयानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. ट्रायल कोर्ट ने इसे ध्यान में रखते हुए फैसला सुनाया हो तो उस फैसले को मनमाना नहीं कहा जा सकता और दखल नहीं दिया सकता. यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने सुनाया और हत्या के मामले में आरोपियों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया है.
यह सरकारी अपील, उन्नाव में SC/ST एक्ट के तहत स्पेशल जज द्वारा 16.09.2000 को दिए गए फैसले और आदेश के खिलाफ दायर की गई थी. यह फैसला सेशन ट्रायल नंबर 268/1999 (केस क्राइम नंबर 141/1999 से जुड़ा) में आया था, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आरोपियों को बरी कर दिया गया था.
तथ्यों के अनुसार नत्थी लाल (Witness), अपने जीजा राम लाल और राम लाल की पत्नी श्रीमती छेदाना (Witness) के साथ 12 मई 1999 को कुल्हा रेलवे हॉल्ट से उन्नाव जाने वाली ट्रेन में सवार हुए. जब ट्रेन बुंड-हमीरपुर हॉल्ट पर रुकी, तो आरोपी शिव लाल, राजेश, देवी प्रसाद और देश राज उर्फ दीना ट्रेन के डिब्बे में चढ़े.
देसी पिस्तौल से लैस शिव लाल और देवी प्रसाद ने राम लाल को मारने की नीयत से उन पर गोली चलाई, जबकि राजेश और दीना ने दरवाजे पर यात्रियों को धमकाया ताकि वे भाग न सकें. Witness नत्थी लाल और श्रीमती छेदाना डर के मारे सीटों के नीचे छिप गए. डिब्बे में मौजूद अन्य यात्रियों ने भी यह घटना देखी. नत्थी लाल द्वारा जीआरपी को घटना के संबंध में तहरीर दी गयी. इसके आधार पर उन्नाव थाने में आरोपी शिव लाल, राजेश, देवी प्रसाद और देश राज के खिलाफ IPC की धारा 302 के तहत रिपोर्ट दर्ज की गयी.
शुरू में जांच जीआरपी उन्नाव के स्टेशन हाउस ऑफिसर आरके ओझा ने की. उन्होंने शिकायतकर्ता का बयान दर्ज किया, अपराध स्थल का निरीक्षण किया और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा. बाद में जीआरपी उन्नाव बनाम अचलंगंज थाना के अधिकार क्षेत्र से जुड़े मुद्दों के कारण, मामले को ट्रांसफर कर दिया गया और अचलंगंज पुलिस स्टेशन में क्राइम नंबर 141/99 के रूप में दर्ज किया गया.
जांच स्टेशन हाउस ऑफिसर केके यादव को सौंप दी गई. सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद, आरोपी शिव लाल, राजेश, देवी प्रसाद और देश राज उर्फ दीना के खिलाफ IPC की धारा 302 के तहत चार्जशीट कोर्ट में जमा की गई.
सीआरपीसी की धारा 207 के अनिवार्य प्रावधानों का पालन करने के बाद, उक्त मामले को सेशन जज की अदालत में भेजा गया. वहां से इसे ट्रायल के लिए स्पेशल जज (SC/ST एक्ट) उन्नाव के पास भेजा गया. उन्होंने आरोपी शिव लाल और देवी प्रसाद के खिलाफ, और IPC की धारा 34 के साथ धारा 302 के तहत आरोपी राजेश और देश राज उर्फ दीना के खिलाफ आरोप तय किए.
जांच अधिकारियों ने गलत जांच के आधार पर झूठी चार्जशीट दाखिल की और Witness ने दुश्मनी के कारण झूठी गवाही दी
धारा 313 के तहत दर्ज अपने बयानों में, आरोपियों ने अभियोजन पक्ष के आरोपों से इनकार किया और कहा कि यह मामला उनके खिलाफ दुश्मनी और रंजिश की वजह से दर्ज किया गया था. उन्होंने कहा कि जांच अधिकारियों ने गलत जांच के आधार पर झूठी चार्जशीट दाखिल की और गवाहों (Witness) ने दुश्मनी के कारण झूठी गवाही दी. उन्होंने कहा कि गांव की गुटबाजी और दोनों परिवारों के बीच चल रहे कानूनी विवाद के कारण उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया. आरोपियों की ओर से बचाव में कोई सबूत पेश नहीं किया गया.
ट्रायल कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों की बात सुनी और मौखिक व दस्तावेजी सभी सबूतों पर विचार करने के बाद, आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया. बरी करने के फैसले और आदेश से असंतुष्ट और व्यथित होकर, राज्य ने इस कोर्ट में अपील दायर की. राज्य की ओर से पेश एजीए का कहना था कि ट्रायल कोर्ट ने तथ्यों, सबूतों और परिस्थितियों पर सही नजरिए से विचार नहीं किया और बरी करने का फैसला जल्दबाजी और मनमाने ढंग से सुनाया, जो कानून के मुताबिक नहीं है.

उनका यह भी कहना है कि अभियोजन पक्ष के मामले को साबित करने के लिए ट्रायल कोर्ट के सामने पर्याप्त सबूत पेश किए गए थे और सभी गवाह (Witness) अपनी बात पर कायम रहे और उन्होंने अपने पहले के बयान से पलटी नहीं खाई; इसके बावजूद, ट्रायल कोर्ट ने Witness के बयानों को गलत समझा और उन पर भरोसा न करके गलती की.
A.G.A. ने अपनी दलील को मजबूत करने के लिए शिवाजी सहबराव बोबडे और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य (1973) 2 SCC 793, में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया जिसने कहा था कि अपराध साबित करने के लिए सबूत पक्का होना चाहिए, न कि “शायद” वाला. अदालतों को ग्रामीण गवाहों के सबूतों को शहरी गवाहों के सबूतों की तरह सटीकता और एकरूपता के उसी पैमाने से नहीं आंकना चाहिए. गवाहों को पेश करना अभियोजन पक्ष की मर्जी पर निर्भर करता है और केवल चश्मदीद गवाहों (Witness) को पेश न करने के आधार पर कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.
बबन शंकर दफल और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य AIR 2025 SC 599, जिसमें यह कहा गया है कि आपराधिक मामलों में, गवाहों (Witness) की विश्वसनीयता, खासकर पीड़ित के करीबी रिश्तेदारों की, अक्सर जांच-परख की जाती है. हालांकि, रिश्तेदार होने से कोई गवाह अपने-आप “इंटरेस्टेड” या पक्षपाती नहीं हो जाता. “इंटरेस्टेड” शब्द उन गवाहों के लिए इस्तेमाल होता है जिनका मामले के नतीजे में कोई निजी हित हो, जैसे बदला लेने की इच्छा या दुश्मनी या निजी फायदे के कारण आरोपी को झूठा फंसाना.
दूसरी ओर, “रिलेटेड” (संबंधित) गवाह वह होता है जो स्वाभाविक रूप से अपराध स्थल पर मौजूद हो सकता है, और उनकी गवाही को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए कि वे पीड़ित के रिश्तेदार हैं. अदालतों को उनके बयानों की विश्वसनीयता, निरंतरता और तालमेल का आकलन करना चाहिए, न कि उन्हें अविश्वसनीय मान लेना चाहिए.
आरोपियों के वकील का कहना था कि ट्रायल कोर्ट ने सभी तथ्यों, सबूतों और परिस्थितियों पर पूरी तरह विचार करने के बाद विवादित फैसला सुनाया, जो कानून के अनुसार है. उनका यह भी कहना था कि अभियोजन पक्ष ने घटना से जुड़े केवल दो Witness पेश किए जो मृतक के रिश्तेदार थे. उनकी गवाही ठोस और विश्वसनीय नहीं है और वे भरोसेमंद गवाह नहीं हैं. Witness के बयानों में उनका व्यवहार स्वाभाविक नहीं लगता, क्योंकि न तो उन्होंने किसी यात्री का ध्यान खींचने के लिए शोर मचाया और न ही उसी ट्रेन में ड्यूटी पर मौजूद रेलवे अधिकारियों को सूचित किया.
उनका आगे कहना था कि Witness के बयानों में बड़ी विसंगतियां हैं और उनके बयान एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं. उनका यह भी कहना है कि दोनों Witness ने कहा है कि वे ट्रेन में यात्रा कर रहे थे, लेकिन उनके पास से कोई टिकट बरामद नहीं हुआ और इस संबंध में झूठी सफाई दी गई है.
उनका आगे कहना था कि कथित घटना भीड़भाड़ वाले डिब्बे में हुई बताई जाती है, लेकिन मृतक के अलावा किसी अन्य यात्री को किसी भी प्रकार की चोट नहीं आई जबकि हमला असलहे से किया गया था. तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों और निष्कर्षों में कोई गैर-कानूनी बात या गलतफहमी नहीं है और यह अपील बिना किसी ठोस आधार के है, इसलिए इसे खारिज किया जाना चाहिए.
प्रतिवादियों के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के ‘तुलसारेड्डी बनाम कर्नाटक राज्य’ (2026 SCC OnLine SC 89) मामले के फैसले का हवाला दिया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बरी करने के फैसले में अपीलीय अदालत का दखल ठोस कारणों पर आधारित होना चाहिए, जैसे कि स्पष्ट गलती या सबूतों की गलत व्याख्या, न कि सिर्फ इसलिए कि कोई दूसरा नजरिया भी संभव है.
GOVERNMENT APPEAL No. – 5 of 2001; State of U.P. V/s Shiv Lal and 3 Ors.