Eidgah Committee के संशोधन आवेदन को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वीकार किया, 13 अक्टूबर को होगी सुनवाई

कोर्ट में सुनवाई के दौरान Eidgah Committee की ओर से वरिष्ठ वकीलों और कानूनी टीम ने कहा कि उनके पूर्व में दाखिल लिखित कथन में कुछ तकनीकी खामियां और टाइपिंग त्रुटियां रह गई थीं. Eidgah Committee के अधिवक्ताओं ने इलाहाबाद हाईकोर्ट, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न नजीरों और कानूनी फैसलों का हवाला देते हुए पीठ को आश्वस्त किया कि यह केवल एक तकनीकी सुधार है जिसे कानून के दायरे में रहते हुए संशोधित करने की अनुमति दी जानी चाहिए.
पुरानी अर्जियों को लेकर भी Eidgah Committee के वकीलों ने आपत्ति जताई
अदालत ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए संशोधन अर्जी को मंजूरी प्रदान की और नया एवं संशोधित लिखित कथन दाखिल करने के लिए 30 दिनों का समय दिया है. इसी सुनवाई के दौरान वादी पक्ष महेंद्र प्रताप सिंह द्वारा सिविल वाद नंबर 13 में दाखिल की गई फोटोकॉपी और पुरानी अर्जियों को लेकर भी Eidgah Committee के वकीलों ने आपत्ति जताई कि इस चरण में महज फोटोकॉपी के आधार पर दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर नहीं लिया जा सकता क्योंकि उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है. अदालत द्वारा इस तर्क को न्यायसंगत माने जाने के बाद वादी पक्ष के इन्हें वापस लेने के आधार पर खारिज कर दी.
अस्पताल के प्रबंधक की गिरफ्तारी पर रोक, शिकायतकर्ता व राज्य सरकार से कोर्ट ने मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कौशांबी जिले के एक अस्पताल के मैनेजर संकल्प की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है. इनके खिलाफ मरीज के इलाज में घोर लापरवाही बरतने का आरोप में एफआईआर दर्ज कराई गई है. यह आदेश जस्टिस अजय भनोट और जस्टिस दिवेश चंद्र समंत की खंडपीठ ने पारित किया. याचिका पर अधिवक्ता विवेक कुमार पाल ने बहस की.
कहा याची संकल्प अस्पताल के मैनेजर हैं, जहां मृतक का विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में इलाज हो रहा था. कौशांबी के थाने में 23 जुलाई 2026 को एससीएसटी एक्ट सहित अन्य अपराधों के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई गई है. कहा कि सहायक मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा कराई गई जांच में यह पाया गया कि किसी भी प्रकार की मेडिकल लापरवाही नहीं हुई थी.
जांच में न तो डॉक्टरों और न ही अस्पताल स्टाफ को दोषी पाया गया. वकील का कहना था कि यह एफआईआर दुर्भावनापूर्ण तरीके से केवल पैसे ऐंठने के इरादे से दर्ज कराई गई है, और एससी/एसटी एक्ट के तहत कोई प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनता. पीठ ने मामले को विचारणीय मानते हुए शिकायतकर्ता को नोटिस जारी की है .राज्य सरकार को चार सप्ताह में जवाबी हलफनामा दाखिल करने का समय दिया गया है.के भीतर काउंटर एफिडेविट दाखिल करने को कहा गया है.