तीसरा बच्चा होने पर Maternity leave देने से इन्कार नहीं कर सकते, अवकाश की सीमा घटाकर 12 सप्ताह कर सकते हैं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीसरे बच्चे के जन्म पर Maternity leave देने से इन्कार करने के आदेशों को रद्द कर दिया है और मामले को संबंधित अधिकारी के पास दोबारा विचार के लिए भेज दिया है. याचिकाकर्ता गीता चौधरी ने याचिका दाखिल कर 16 जुलाई 2026 और 25 जुलाई 2026 के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें उनके तीसरे Maternity leave के आवेदन को अस्वीकार कर दिया गया था. यह आदेश हापुड़ के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी और अन्य अधिकारी द्वारा पारित किए गए थे.
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता मिथिलेश कुमार तिवारी ने कोर्ट में दलील दी कि Maternity leave लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 की धारा 3 में हुए संशोधन के अनुसार याचिकाकर्ता तीसरे बच्चे के लिए बारह सप्ताह के Maternity leave की हकदार हैं. उन्होंने अपनी दलीलों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का हवाला दिया स्मृति अनुपम यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2022) और के. उमादेवी बनाम तमिलनाडु सरकार (2025).
अधिवक्ता ने के. उमादेवी मामले की ओर कोर्ट का ध्यान आकृष्ट कराया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि दो या दो से अधिक जीवित बच्चों वाली महिला कर्मचारी को Maternity leave लाभ से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता, बल्कि ऐसी स्थिति में Maternity leave की अवधि 26 सप्ताह से घटाकर 12 सप्ताह कर दी जाती है. बच्चों की संख्या पर कोई सीमा या रोक नहीं है.
दो से अधिक जीवित बच्चों वाली महिला कर्मचारी को Maternity leave लाभ से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता
विपक्षी अधिवक्ता हर्ष वर्धन गुप्ता ने कोर्ट के समक्ष स्वीकार किया कि मामले को वापस भेजा जा सकता है ताकि 2017 के संशोधन और सुप्रीम कोर्ट की उपरोक्त टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए संबंधित प्राधिकारी नए सिरे से आदेश पारित करे. जस्टिस मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने दोनों पक्षों की सहमति से याचिका का निस्तारण करते हुए विवादित आदेशों को रद्द कर दिया.
कोर्ट ने मामले को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, हापुड़ के पास वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत होने की तारीख से दो माह के भीतर, कानून के अनुसार शीघ्रता से Maternity leave पर नया आदेश पारित करें.
आउटसोर्स स्टाफ नर्सों की याचिका पर 12 हफ्ते में प्रत्यावेदन निपटाने का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मिर्जापुर स्थित डिवीजनल डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में आउटसोर्स/संविदा आधार पर कार्यरत स्टाफ नर्सों की एक याचिका का निस्तारण करते हुए राज्य सरकार को उनके लंबित प्रतिवेदन पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है. प्रियंका कुमारी सहित चार याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि नियमित रूप से नियुक्त स्टाफ नर्सों की तुलना में उनके वेतन में भेदभाव न किया जाए.
उन्हें नियमित करने हेतु सृजित पद पर विचार हो और नियमित वेतनमान में वेतन मिले, नियमित स्टाफ नर्सों के बराबर वेतन स्वीकृत व वितरित किया जाए, उनके द्वारा 8 मई 2026 को दाखिल प्रतिवेदन पर निर्णय लिया जाए. याचिका पर अधिवक्ता लवलेश कुमार शुक्ल ने बहस की.
जस्टिस मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का प्रतिवेदन पहले से ही सरकार के समक्ष लंबित है और अभी तक उस पर कोई फैसला नहीं हुआ है. इसलिए कोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से 12 सप्ताह के भीतर सभी पक्षों को नोटिस व सुनवाई का अवसर देकर, कानून के अनुसार प्रतिवेदन पर निर्णय ले. बशर्ते कोई अन्य कानूनी बाधा न हो.