Appointment सही और नियुक्त व्यक्ति ने सरकारी आदेशों के अनुसार अगले उपलब्ध वर्किंग डे पर जॉइन किया, तो बीच में पड़ने वाली छुट्टी सर्विस की निरंतरता को खत्म नहीं कर सकती, 1058 शिक्षकों की याचिका निस्तारित

जहाँ Appointment सही तरीके से की गई हो, बीच का दिन पब्लिक हॉलिडे रहा हो, और नियुक्त व्यक्ति ने लागू सरकारी आदेशों के अनुसार अगले उपलब्ध वर्किंग डे पर जॉइन किया हो, तो बीच में पड़ने वाली उस छुट्टी की वजह से सर्विस की निरंतरता को खत्म नहीं किया जा सकता और न ही किसी ऐसे सर्विस बेनिफिट को मिलने में देरी की जा सकती है जिसके लिए वे हकदार हैं. यह व्यवस्था देने के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस मंजू रानी चौहाने ने 1058 शिक्षकों की तरफ से दाखिल याचिकाओं का निस्तारण कर दिया है.
अपने फैसले में कोर्ट ने कहा है कि सक्षम अधिकारी याचिकाकर्ताओं द्वारा जमा किए गए व्यक्तिगत आवेदनों पर विचार करें और फैसला लें. इन आवेदनों में खास तौर पर उनकी Appointment की तारीख, जॉइनिंग की तारीख और उन हालात का जिक्र होना चाहिए जिनकी वजह से वे संबंधित महीने के पहले दिन जॉइन नहीं कर पाए थे.
ऐसे आवेदन मिलने पर, सक्षम अधिकारी कानूनी प्रावधानों, लागू सरकारी आदेशों और ऊपर की गई टिप्पणियों के आधार पर हर याचिकाकर्ता के दावे की जाँच करेंगे और आवेदन मिलने की तारीख से छह सप्ताह के अंदर हर याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत दावे पर कारण बताते हुए आदेश जारी करेंगे.
Appointment मैटर सेम होने के चलते कोर्ट ने सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की
सिंगल जज की बेंच एक साथ 15 रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. इसमें कुल 1058 याची थे. Appointment मैटर सेम होने के चलते कोर्ट ने सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की. इन याचिकाओं Appointment में एक दिन डिटे ज्वाइनिंग के चलते इंक्रीमेंट को हुए नुकसान को देखते हुए यह आदेश देने की मांग की गयी थी कि उनकी सैलरी फिर से तय किये जाने का आदेश दिया जाय और पूरे बकाया की गणना करते हुए उसका भुगतान ब्याज के साथ किया जाय.
याचिकाकर्ताओं के वकीलों का कहना था कि याचिकाकर्ताओं को बेसिक शिक्षा अधिकारी, पीलीभीत ने 28.06.2016 को असिस्टेंट टीचर के तौर पर नियुक्त (Appointment) किया था. 01 जुलाई 2016 को रमजान का आखिरी शुक्रवार होने के कारण सार्वजनिक अवकाश था इसलिए याचिकाकर्ता उस तारीख को जॉइन नहीं कर सके और अगले दिन 02 जुलाई 2016 को उनकी ज्वाइनिंग हुई.

Appointment के समय, याचिकाकर्ता छठे वेतन आयोग द्वारा सुझाए गए वेतनमान के दायरे में आते थे, जो 01.01.2006 से लागू हुआ था. राज्य सरकार ने 22.12.2016 को एक सरकारी आदेश जारी किया, जिसके तहत 01.01.2016 से वेतनमानों में संशोधन किया गया. नतीजतन, जुलाई 2016 में काम शुरू करने के तुरंत बाद याचिकाकर्ताओं के वेतन का जो शुरुआती निर्धारण किया गया था, वह छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के तहत लागू वेतनमान पर आधारित था.
याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति (Appointment) और काम शुरू करने के कुछ ही समय बाद, 22.12.2016 का उक्त सरकारी आदेश जारी किया गया, जिसमें 01.01.2016 से वेतनमानों में संशोधन किया गया. संशोधित वेतन ढांचे के पिछली तारीख से लागू होने के कारण, याचिकाकर्ताओं का वेतन भी उस तारीख से संशोधित वेतनमान के अनुसार फिर से तय किया जाना चाहिए था, जिस तारीख से वे इसके हकदार बने थे.
Appointment के बाद वेतन निर्धारण में, उनके वेतनमान में पहली वेतन वृद्धि 1.7.2017 से मंजूर की गई है. याचिकाकर्ता 1.1.2017 को पहली वेतन वृद्धि के निर्धारण के हकदार थे. अधिवक्ता ने तर्क दिया कि वेतन तय करने और 01.07.2017 से पहला इंक्रीमेंट देने के फैसले से नाराज होकर याचिकाकर्ताओं ने संबंधित अधिकारियों के सामने अपनी बात रखी. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. इतना जरूर हुआ कि बेसिक शिक्षा पीलीभीत के वित्त और लेखा अधिकारी ने बेसिक शिक्षा बोर्ड, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज के वित्त नियंत्रक से मार्गदर्शन मांगा.
इसके जवाब में, वित्त नियंत्रक ने 20.11.2025 के पत्र के जरिए साफ तौर पर स्पष्ट किया कि जिन लोगों की नियुक्ति (Appointment), प्रमोशन या जिन्हें वित्तीय अपग्रेडेशन किसी खास साल में 02 जनवरी से 01 जुलाई के बीच मिला है, वे अगले 01 जनवरी को इंक्रीमेंट का लाभ पाने के हकदार होंगे.
जबकि जिन लोगों की नियुक्ति (Appointment), प्रमोशन या जिन्हें वित्तीय अपग्रेडेशन 02 जुलाई से अगले साल की 01 जनवरी के बीच मिला है, वे अगले 01 जुलाई को इंक्रीमेंट का लाभ पाने के हकदार होंगे. याचिकाकर्ताओं के वकील का कहना है कि वित्त नियंत्रक द्वारा जारी किए गए उक्त स्पष्टीकरण के बावजूद, प्रतिवादियों द्वारा कोई जरूरी कार्रवाई नहीं की गई है.
याचिकाकर्ताओं के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का हवाला दिया है जो M/s ग्रासिम इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम कलेक्टर ऑफ कस्टम्स, बॉम्बे मामले में 04.04.2002 को सुनाया गया था और (2002) 4 SCC 297 : AIR 2002 SC 1706 में रिपोर्ट किया गया था. उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कानून की व्याख्या के सिद्धांतों पर विचार करते हुए कहा कि कानून में इस्तेमाल किए गए किसी भी शब्द या अभिव्यक्ति को बेकार या फालतू नहीं माना जा सकता.
कोर्ट ने कहा कि किसी एक शब्द पर बहुत ज्यादा ध्यान देते हुए दूसरे शब्दों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कानून के किसी प्रावधान और किसी सेक्शन के किसी शब्द की व्याख्या अलग-थलग करके नहीं की जा सकती और हर प्रावधान और हर शब्द पर उसी संदर्भ में विचार किया जाना चाहिए जिसमें उसका इस्तेमाल किया गया है.
सरकारी वकील का कहना था कि याचिकाकर्ताओं ने 02.07.2016 को अपनी सेवाएँ शुरू कीं. इसलिए सेवा से जुड़े लाभों की गणना के लिए उनकी वास्तविक नियुक्ति उस तारीख से मानी जाएगी जब उन्होंने Appointment के बाद कार्यभार संभाला. अपने-अपने संस्थानों में शामिल होने वाले शिक्षकों को वेतन वृद्धि देने के मामले में, शिक्षा निदेशक (बेसिक), उत्तर प्रदेश, लखनऊ ने 13.11.2025 के पत्र के माध्यम से वित्त नियंत्रक, बेसिक शिक्षा बोर्ड, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज से इस मामले में रिपोर्ट देने का अनुरोध किया था.
चूंकि याचिकाकर्ताओं ने 02.07.2016 को पद संभाला था, इसलिए वे उन कर्मचारियों की श्रेणी में आते हैं जिनकी नियुक्ति (Appointment) 02 जुलाई और 01 जनवरी के बीच हुई थी. नतीजतन, 22.12.2016 के सरकारी आदेश के पैराग्राफ 8(2) के अनुसार, याचिकाकर्ता 01.01.2017 से वार्षिक वेतन वृद्धि के हकदार नहीं हैं.
दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लाभ का अधिकार संबंधित कर्मचारियों पर लागू वैधानिक नियमों और सरकारी आदेशों से मिलना चाहिए, न कि केवल नियुक्ति या जॉइनिंग आदेशों में इस्तेमाल किए गए शब्दों या नामकरण से. जहाँ कोई वैधानिक प्रावधान लागू होता है, वहाँ कार्यकारी निर्देशों को अनिवार्य रूप से कानून के अधीन होना चाहिए. इसके विपरीत, जहाँ कानून मामले को कार्यकारी निर्देशों द्वारा विनियमित करने के लिए छोड़ देता है, वहाँ सरकारी आदेश, यदि वे वैध हैं और वैधानिक ढांचे के अनुरूप हैं, तो कर्मचारियों के अधिकार का निर्धारण करेंगे.
असली कसौटी किसी विशेष लाभ के उद्देश्य से सेवा की कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त शुरुआत है, न कि Appointment Letter और जॉइनिंग रिपोर्ट पर दिखाई देने वाली तारीखों की यांत्रिक तुलना. असिस्टेंट टीचर्स के दावे पर विचार करते समय, प्रतिवादियों को उनकी नियुक्ति को नियंत्रित करने वाले पूरे वैधानिक और कार्यकारी ढांचे, 1 जुलाई 2016 को सार्वजनिक अवकाश के प्रभाव, ऐसे मामलों पर लागू सरकारी आदेशों और सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी बाद के स्पष्टीकरणों की जाँच करनी चाहिए.
लाभ को ऐसी व्याख्या अपनाकर नहीं रोका जा सकता जो नियुक्त व्यक्तियों को ऐसी परिस्थिति के लिए दंडित करे जो न तो उनके कारण हुई थी और न ही जिसे वे टाल सकते थे.
इस कोर्ट की यह राय है कि इस मामले के तथ्यों को देखते हुए, जिन असिस्टेंट टीचर्स ने 2 जुलाई 2016 को जॉइन किया वे इस बात के हकदार हैं कि उनकी Appointment के बाद जॉइनिंग को पहले से की गई नियुक्ति का ही नतीजा माना जाए और उनके सर्विस बेनिफिट्स पर उसी आधार पर विचार किया जाए. साथ ही, पहले इंक्रीमेंट और उससे जुड़े फाइनेंशियल बेनिफिट्स के लिए उनके दावे का फैसला भी इसी आधार पर किया जाना चाहिए.
रेस्पॉन्डेंट्स को ऊपर बताए गए कानूनी प्रावधानों और सरकारी आदेशों को ध्यान में रखते हुए यह प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए और केवल इस आधार पर दावा खारिज नहीं करना चाहिए कि असल जॉइनिंग रिपोर्ट 2 जुलाई 2016 को जमा की गई थी.
बेंच ने कमेंट कोट कराया