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Vakalatnamas पर फंसा पेंच, हाई कोर्ट ने तीन वकालतनामे हस्तलेख विशेषज्ञ को भेजे, 2 सप्ताह में मांगी रिपोर्ट

नेहरू विद्यापीठ इंटर कॉलेज, रेवतीपुर, गाजीपुर की प्रबंध समिति को लेकर चल रहे विवाद में दाखिल किये गये हैं हलफनामे

Vakalatnamas पर फंसा पेंच, हाई कोर्ट ने तीन वकालतनामे हस्तलेख विशेषज्ञ को भेजे, 2 सप्ताह में मांगी रिपोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट में नेहरू विद्यापीठ इंटर कॉलेज, रेवतीपुर, गाजीपुर की प्रबंध समिति को लेकर चल रहे विवाद में Vakalatnamas पर नया और गंभीर मोड़ ले लिया है. जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच के सामने शिव शंकर सिंह बनाम प्रबंध समिति नेहरू विद्यापीठ इंटर कॉलेज व अन्य में दाखिल पुनर्विलोकन अर्जी की सुनवाई के दौरान एक Vakalatnamas की प्रामाणिकता को लेकर विवाद खुलकर सामने आया. याचिकाकर्ता शिव शंकर सिंह (यादव) की ओर से दाखिल पुनर्विलोकन अर्जी में एक वकालतनामा (Vakalatnamas) प्रस्तुत किया गया था, जिसे अधिवक्ता आरसी द्विवेदी द्वारा सत्यापित बताया गया.

हालांकि, पिछली सुनवाई में द्विवेदी ने खुद कोर्ट को बताया था कि हस्ताक्षर (Vakalatnamas) का सत्यापन उनके क्लर्क राजेश यादव ने किया था न कि उन्होंने खुद. कोर्ट के आदेश पर भोला सिंह यादव और शिव शंकर सिंह (यादव) दोनों व्यक्तिगत रूप से पेश हुए. शिव शंकर सिंह ने कोर्ट में साफ कहा कि उन्होंने वर्तमान मामले में कभी अधिवक्ता आरस द्विवेदी की सेवाएं नहीं लीं और आखिरी बार वे 21 जनवरी 2026 को उनके चैंबर गए थे. याचिका संख्या 312/2026 में काउंटर एफिडेविट दाखिल करने के सिलसिले में.

अपने Vakalatnamas में शिव शंकर सिंह ने यह भी स्वीकार किया कि भोला सिंह यादव उनके रिश्तेदार हैं, जो संस्थान के क्लर्क पद से 31 दिसंबर 2020 को सेवानिवृत्त हुए थे. लेकिन 2024 में जब भोला सिंह यादव ने खुद अलग याचिका (12365/2024) दाखिल की और अवधेश कुमार राय के पक्ष में एक अन्य मामले में पक्षकार बनाने की अर्जी दी, तो शिव शंकर सिंह को शक हुआ कि भोला सिंह, अवधेश राय के साथ मिलीभगत कर संस्थान पर कब्जा करने की साजिश रच रहे हैं . जिसके बाद उनके रिश्ते पूरी तरह टूट गए.

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कोर्ट ने इस बिंदु पर गंभीर आपत्ति जताई कि जिस अधिवक्ता आरसी द्विवेदी ने भोला सिंह यादव की ओर से याचिकाएं दाखिल कीं, उन्हीं द्विवेदी के पास शिव शंकर सिंह  जो भोला सिंह से रिश्ता तोड़ चुके थे कैसे जुलाई 2026 में जवाबी हलफनामा दाखिल कराने पहुंच गए, जबकि यह स्पष्ट रूप से हितों के टकराव  का मामला था. कोर्ट ने कहा कि प्रथमदृष्टया शिव शंकर सिंह की सफाई स्वीकार करने योग्य नहीं है.

वहीं भोला सिंह यादव ने अपने हलफनामे में बिल्कुल अलग कहानी बताई. उनके अनुसार अप्रैल 2026 के दूसरे सप्ताह में वे और शिव शंकर सिंह दोनों साथ में अधिवक्ता आरसी द्विवेदी के आवास पर गए थे, जहां उन्होंने कैविएट एप्लीकेशन के लिए 2,500 रुपये द्विवेदी के क्लर्क को जमा कराए थे.

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कोई भी यह स्वीकार नहीं करता कि Vakalatnamas वास्तव में आरसी द्विवेदी को सौंपा गया था

कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों के बयानों में स्पष्ट विरोधाभास है, लेकिन दोनों में से कोई भी यह स्वीकार नहीं करता कि Vakalatnamas वास्तव में आरसी द्विवेदी को सौंपा गया था. कोर्ट ने कहा कि वह यह मानने को तैयार नहीं कि द्विवेदी खुद Vakalatnamas गढ़ेंगे, हालांकि उन्होंने स्वीकार किया है कि Vakalatnamas पर हस्ताक्षर का सत्यापन उनके क्लर्क ने किया.

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आदेश में कोर्ट ने 2016 के पुराने विवाद का भी उल्लेख किया, जिसमें संयुक्त शिक्षा निदेशक ने पाया था कि 2009 में हुए कथित चुनाव संदिग्ध थे और कोई वैध निर्वाचित प्रबंध समिति कार्यरत नहीं थी. संबंधित  याचिका (19276/2016) बाद में 2023 में दोनों पक्षों की सहमति से निष्फल घोषित कर दी गई थी, जिससे संयुक्त शिक्षा निदेशक का आदेश अंतिम रूप ले चुका माना जाएगा.

मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने  निर्देश दिए कि कैविएट एप्लीकेशन पर अधिवक्ता आरसी द्विवेदी के सत्यापन हस्ताक्षर की तुलना जांची जाएगी. शिव शंकर सिंह के Vakalatnamas के हस्ताक्षर की तुलना रिट-सी 312/2026 में दाखिल उनके स्वीकृत हस्ताक्षर से की जाएगी. कैविएट एप्लीकेशन और  याचिका 13896/2019 के हस्ताक्षरों की भी तुलना होगी.

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तीनों Vakalatnamas सीलबंद लिफाफे में रजिस्ट्रार (न्यायिक) के माध्यम से एक हस्तलेख विशेषज्ञ को सौंपे जाएंगे, जिन्हें दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंपनी होगी. मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई 2026 को होगी. जिसमें हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में पेश की जाएगी. कोर्ट ने भोला सिंह यादव और शिव शंकर सिंह (यादव) दोनों को अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का आदेश दिया है.

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