राज्य सरकार दुष्कर्म के परिणामस्वरूप जन्मे बच्चों के Independent rights की सुरक्षा के लिए अलग कानूनी ढांचा बनाने पर विचार करे

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दुष्कर्म पीड़िता के बच्चे की Independent rights की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है. न्यायालय ने सिफारिश की कि राज्य सरकार दुष्कर्म के परिणामस्वरूप जन्मे बच्चों के Independent rights की सुरक्षा के लिए एक अलग कानूनी ढांचा बनाने पर विचार करे. जस्टिस दिवाकर ने स्पष्ट कहा कि बच्चे को उसके जन्म की परिस्थितियों के लिए दंडित नहीं किया जा सकता.
यह मामला मेरठ की एक 17 वर्षीय मानसिक रूप से अस्वस्थ दुष्कर्म पीड़िता से जुड़ा था जिसे गर्भ समाप्त कराने के लिए अंततः उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा. मेरठ के थाना रोहता क्षेत्र में 11 जून 2023 को पीड़िता के नाना ने एफआईआर दर्ज कराई. पीड़िता नाबालिग थी, मानसिक रूप से अस्वस्थ थी और उसकी मां भी मानसिक रोगी है. पिता लगभग 10 साल पहले परिवार छोड़ चुके हैं.
चिकित्सा जांच में पता चला कि वह 22 सप्ताह 6 दिन की गर्भवती है. पीड़िता ने स्पष्ट कहा कि वह गर्भ नहीं रखना चाहती. इसके बावजूद मुख्य चिकित्सा अधिकारी मेरठ ने गर्भ समाप्ति का अनुरोध नामंजूर कर दिया. बाल कल्याण समिति ने उसे चाचा की देखरेख में सौंपते हुए गर्भपात न कराने का निर्देश दे दिया.
जस्टिस विनोद दिवाकर ने सुनवाई के दौरान निर्देशित किया कि दुष्कर्म पीड़िता के गर्भवती होने की सूचना मिलते ही पुलिस उसी दिन उसे मुख्य चिकित्सा अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करे. हर जिले में कार्यात्मक मेडिकल बोर्ड सुनिश्चित हो और बोर्ड का पुनर्गठन एक साल से अधिक न टले. बाल कल्याण समिति के हर आदेश में स्पष्ट उल्लेख हो कि पीड़िता को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (एमटीपी) अधिनियम के तहत उसके अधिकारों की जानकारी दी गई.
सीएमओ या बाल कल्याण समिति के लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ शिकायत पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण कार्रवाई की सिफारिश करे ताकि उनका वेतन रोका जा सके. मुख्य सचिव तीन महीने में एक विशेषज्ञ समिति गठित करें, जो दुष्कर्म पीड़िताओं की स्थिति का व्यापक अध्ययन करे.
तथ्यों को परखने के बाद हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश में 24 करोड़ की आबादी के बावजूद 11 वर्षों में केवल 106 मामलों में ही मेडिकल बोर्ड के माध्यम से गर्भ समाप्ति हुई यानी 75 जिलों में प्रति वर्ष 10 से भी कम. जौनपुर, गोंडा और प्रयागराज जैसे जिलों ने मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रेगनेंसी एक्ट के 52 साल बाद 2023 में पहली बार मेडिकल बोर्ड गठित किया.
राज्य भर में बाल कल्याण समितियों के सामने 2022-23 में 28,351 मामले आए, लेकिन सहायक व्यक्तियों की संख्या मात्र 538 थी. गोरखपुर में 1,142 मामलों पर केवल दो सहायक व्यक्ति तैनात थे, यानी एक व्यक्ति पर 571 बच्चों की जिम्मेदारी. औरैया जिले में एक भी सहायक व्यक्ति नहीं था. पांच वर्षों में महिला एवं बाल विकास विभाग की प्रमुख सचिव ने राज्य भर के बालिका गृहों का एक भी निरीक्षण नहीं किया.
पढ़ाई करने के अधिकार (Independent rights) के लिए महिला पहुंची हाईकोर्ट, मिली राहत

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के मेजा एरिया की रहने वाली एक विवाहित महिला प्रिया ने अपनी पढ़ाई जारी रखने के अधिकार (Independent rights) और व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. मामले की सुनवाई जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने की. याचिका में कहा गया है कि याची प्रिया के पति रवि पटेल, ससुराल पक्ष और उनके पिता उन्हें आगे पढ़ाई करने से रोक रहे थे. महिला ने अपनी सुरक्षा और पढ़ाई के अधिकार (Independent rights) की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की.
कोर्ट ने प्रथम दृष्टया इसे पारिवारिक विवाद माना और कहा जान को खतरा प्रतीत नहीं होता और मध्यस्थता केंद्र भेज दिया. कोर्ट ने कहा 9 जून 2026 तक याची को इस आदेश की प्रति मध्यस्थता केंद्र में जमा करनी होगी. मध्यस्थता केंद्र 22 जून 2026 के सप्ताह में पति और पिता को नोटिस जारी करेगा. मध्यस्थता जल्द से जल्द पूरी की जाए ताकि महिला पारिवारिक संबंध बनाए रखते हुए पढ़ाई कर सके. कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि महिला के वर्तमान पते और संपर्क विवरण मिलने पर अगली सुनवाई तक उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए. याचिका की अगली सुनवाई 27 जुलाई 2026 को होगी.