वकीलों के खिलाफ Professional Duties का पालन करने पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने को अनुमति दी गयी तो खत्म हो जाएगा पेशा

कोर्ट ने पाया कि अपने Professional Duties के दौरान लिए गए निर्णयों के लिए अधिवक्ताओं पर मुकदमा चलाना कानूनी प्रणाली और कानूनी प्रतिनिधित्व के अधिकार की जड़ पर प्रहार करता है. यह आदेश हाईकोर्ट ने समर्पण जैन की याचिका पर पारित किया. कोर्ट ने पेशेवर कानूनी सलाह (Professional Duties) को आपराधिक षड्यंत्र के बराबर मानने के खिलाफ चेतावनी दी. इसने इस बात पर जोर दिया कि मुवक्किलों की ओर से की गई कार्रवाइयों के लिए वकीलों को उत्तरदायी ठहराना बार की स्वतंत्रता और नागरिकों के न्याय तक पहुंच दोनों को कमजोर करेगा.
“यदि अपील दायर करने जैसे Professional Duties के लिए किसी वकील को उसके मुवक्किल के साथ साजिश रचने का दोषी ठहराया जाता है, तो इससे बार एसोसिएशन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा और अधिवक्ता अधिनियम के तहत वकालत करने का वकील का अधिकार भी समाप्त हो जाएगा. इससे अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों को कानूनी सहायता के बहुमूल्य अधिकार से भी वंचित किया जाएगा, क्योंकि जो व्यक्ति अपने मुवक्किल का बचाव करने से पहले वकालत करता है, वह अपने बचाव के बारे में सोच रहा होता है और वह वकालतनामा (Professional Duties) दाखिल करने और अपने मुवक्किल की ओर से कोई कदम उठाने से पहले इसी बारे में सोच रहा होता है”
न्यायालय ने टिप्पणी की
Professional Duties को करने के लिए अपने मुवक्किल के साथ साजिश रचने का दोषी ठहराया जाता है तो यह बार एसोसिएशन के अस्तित्व का ही अंत होगा
यदि किसी वकील को अपील दायर करने जैसे Professional Duties को करने के लिए अपने मुवक्किल के साथ साजिश रचने का दोषी ठहराया जाता है तो यह बार एसोसिएशन के अस्तित्व का ही अंत होगा. यह मामला वकील द्वारा अपने मुवक्किल की ओर से कुछ जीएसटी मूल्यांकन आदेशों के खिलाफ कुछ अपीलें दायर करने में निभाई गई भूमिका से उत्पन्न हुआ. अपील दाखिल करते समय, मुवक्किल के इलेक्ट्रॉनिक क्रेडिट लेजर में उपलब्ध इनपुट टैक्स क्रेडिट का उपयोग करके विवादित कर का 10 प्रतिशत अनिवार्य रूप से अग्रिम जमा किया गया था. वकील का मानना था कि यह तरीका कानूनी रूप से मान्य था.
जीएसटी अधिकारियों ने इस दृष्टिकोण से असहमति जताई. अपीलें सुनवाई योग्य न होने के आधार पर खारिज होने के बाद, उपायुक्त ने कर चोरी और साजिश का आरोप लगाते हुए प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज कराई. एफआईआर में न केवल करदाता बल्कि उसके वकील का भी नाम पूर्व-जमा की उपरोक्त विधि अपनाने के लिए शामिल किया गया था. वकील ने इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी.
न्यायालय ने अपने आदेश में फैसला सुनाया कि वकील के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण थी और आपराधिक दायित्व के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत थी. इसमें पाया गया कि वकील ने अपील दायर करते समय और कानून की एक विशेष व्याख्या अपनाते समय पूरी तरह से अपनी पेशेवर क्षमता (Professional Duties) के दायरे में काम किया था. इसमें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह संकेत मिले कि वकील की मुवक्किल के व्यवसाय में कोई भूमिका थी या उसने किसी आपराधिक साजिश में भाग लिया था.
इस मामले में वकील के आचरण (Professional Duties) की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने कहा, “यह पूरी तरह से एक पेशेवर कृत्य है और इसका उनके मुवक्किल के व्यवसाय से कोई लेना-देना नहीं है. यह अपील दायर करने की प्रक्रिया के दौरान किया गया था, इससे अधिक कुछ नहीं. यह कानून के एक विशेष दृष्टिकोण पर आधारित था, चाहे वह सही हो, गलत हो या पूरी तरह से गलत हो.”
न्यायालय ने मामले में अभियोजन पक्ष द्वारा अपनाई गई जल्दबाजी की भी आलोचना की.यह मानते हुए कि इस मामले ने आपराधिक दायित्व के स्थापित सिद्धांतों का उल्लंघन किया है, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि एफआईआर और उसके बाद की कार्यवाही वकील से संबंधित होने के कारण मान्य नहीं हो सकती. न्यायालय ने 4 अक्टूबर, 2025 की एफआईआर, आरोपपत्र और निचली अदालत के संज्ञान आदेश को अधिवक्ता से संबंधित मामलों में रद्द कर दिया. न्यायालय ने निर्देश दिया कि पुलिस अभिलेखों में इस संबंध में उचित प्रविष्टियाँ की जाएँ.