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काम पूरा होने की Time Frame निश्चित करने वाला निर्देश सामान्यत: अनिवार्य प्रकृति का हो जाता है: हाई कोर्ट

सिंगल बेंच ने बीएसए बिजनौर के आदेश को निरस्त करने की मांग में दाखिल याचिका की खारिज

काम पूरा होने की Time Frame निश्चित करने वाला निर्देश सामान्यत: अनिवार्य प्रकृति का हो जाता है: हाई कोर्ट

जहाँ कोई कानून या कार्यकारी निर्देश यह निर्धारित करता है कि कोई विशेष कार्य एक निश्चित Time Frame के भीतर किया जाना है और ऐसे निर्धारण का उद्देश्य किसी सार्वजनिक हित को प्राप्त करना है तो वह Time Frame निर्देश सामान्यतः अनिवार्य प्रकृति का हो जाता है. विशेष रूप से तब जब Time Frame का पालन न करने से वह मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता हो. इस कमेंट के साथ ​इलाहाबाद हाई कोर्ट की ​जस्टिस मंजू रानी चौहान की बेंच ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी बिजनौर के आदेश को रद करने से इंकार करते हुए याचिका खारिज कर दी है.

यह रिट याचिका भूपाल सिंह की ओर से दाखिल की गयी थी. इसमें महत्वपूर्ण कानूनी बारीकियों से जुड़े प्रश्न उठाए गए थे जो चयन प्रक्रिया में अर्जित अधिकारों बाद के वैधानिक और कार्यकारी हस्तक्षेपों तथा भर्ती मानदंडों की Time Frame संबंधी प्रयोज्यता के बीच के आपसी संबंधों को स्पर्श करते हैं. याचिकाकर्ता भूपाल सिंह ने बेसिक शिक्षा अधिकारी बिजनौर द्वारा 28.10.2024 को पारित उस आदेश को रद्द करने की मांग की गयी थी जिसके द्वारा प्रधानाध्यापक के पद पर उसके चयन को Time Frame के भीतर न होने पर अनुमोदन देने से इनकार कर दिया गया था.

विचाराधीन संस्था नेहरू किसान विद्यालय जूनियर हाई स्कूल एक मान्यता प्राप्त और सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूल है जो यू.पी. बेसिक शिक्षा अधिनियम, 1972 और 1978 के नियमों के वैधानिक ढांचे द्वारा शासित होती है. प्रधानाध्यापक के पद पर एक रिक्ति उत्पन्न होने पर 2016 में विज्ञापन जारी किया गया था. याचिकाकर्ता ने चयन प्रक्रिया में भाग लिया.

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चयन समिति द्वारा 29.07.2016 को उसके नाम की संस्तुति की गई. इसके पहले ही अनुमोदन हेतु संबंधित कागजात 30.07.2016 को बेसिक शिक्षा अधिकारी को अग्रसारित कर दिए गए थे. 17.08.2016 को अनुमोदन देने से इस आधार पर इनकार कर दिया गया कि चयन प्रक्रिया 03.06.2016 के सरकारी आदेश में निर्धारित Time Frame के भीतर पूरी नहीं की गई थी, जो भर्ती प्रक्रिया की अनिवार्य शर्त थी.

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याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन निष्फल रहे और मुकदमेबाजी के कई दौर चले. इनका समापन ‘डिवीजन बेंच’ द्वारा मामले को वापस भेजने और पुनर्विचार का निर्देश देने के साथ हुआ. पुनर्विचार के उपरांत 28.10.2024 (Time Frame ) के आक्षेपित आदेश द्वारा याचिकाकर्ता के दावे को पुनः अस्वीकृत कर दिया गया.

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने आक्षेपित आदेश (Time Frame) को निम्नलिखित आधारों पर चुनौती दी थी:-

  • i. चयन प्रक्रिया किसी भी बाद के संशोधन या सरकारी आदेश से पहले शुरू हुई थी और इसलिए इसे विज्ञापन की तारीख को लागू नियमों द्वारा ही नियंत्रित किया जाना चाहिए.
  • ii. 03.06.2016 का सरकारी आदेश जो Time Frame तय करता है निर्देशात्मक प्रकृति का है अनिवार्य नहीं.
  • iii. बाद के संशोधन जिनमें सातवां संशोधन नियम, 2019 और बाद के सरकारी आदेश शामिल हैं, पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं हो सकते.
  • iv. चयनित होने पर याचिकाकर्ता ने एक निहित या कम से कम एक सुदृढ़ अधिकार प्राप्त कर लिया था.
  • v. आधिकारिक दृष्टांतों पर भरोसा किया गया है, जिनमें पी. महेंद्रन बनाम कर्नाटक राज्य, संतोष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य, रतन पाल यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य शामिल हैं और हाल के वे निर्णय भी शामिल हैं जो इस बात को दोहराते हैं कि “खेल के नियम” बीच में नहीं बदले जा सकते.

इसके विपरीत स्टेट के अधिवक्ता की ओर से निम्न तर्क प्रस्तुत किये गये:-

  • i. दिनांक 03.06.2016 के सरकारी आदेश ने चयन प्रक्रिया को पूरा करने के लिए एक अनिवार्य बाहरी समय सीमा (Time Frame) निर्धारित की थी.
  • ii. स्वयं सिफारिश कट-ऑफ तारीख (Time Frame) के बाद भेजी गई थी.
  • iii. बाद के वैधानिक संशोधनों और नीतिगत निर्णयों ने भर्ती व्यवस्था को मौलिक रूप से बदल दिया.
  • iv. केवल भागीदारी या यहां तक कि सिफारिश के आधार पर कोई भी अविच्छेद्य अधिकार प्राप्त नहीं होता है.

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कोर्ट ने माना कि इस मामले में विचार के लिए जो विवाद सामने आया है वह सेवा न्यायशास्त्र के एक संकीर्ण फिर भी जटिल दायरे में आता है और इसे निम्नलिखित मुख्य मुद्दों में बांटा जा सकता है:-

  • i. क्या 03.06.2016 का सरकारी आदेश, जिसमें चयन प्रक्रिया पूरी करने के लिए एक समय-सीमा (Time Frame ) तय की गई है, कानूनी रूप से बाध्यकारी है और कानून की नजर में मान्य है;
  • ii. क्या चयन समिति द्वारा सिफारिश किए जाने पर याचिकाकर्ता को नियुक्ति का कोई लागू करने योग्य या निहित अधिकार प्राप्त हुआ;
  • iii. क्या चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद लागू किए गए बाद के वैधानिक संशोधन और कार्यकारी निर्देश याचिकाकर्ता के मामले पर लागू होते हैं; और क्या विवादित आदेश मनमानी, अतार्किकता या किसी अन्य कानूनी कमी से ग्रस्त है जिसके कारण भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए इसमें हस्तक्षेप करना उचित हो.

याचिकाकर्ता का यह तर्क कि चयन समिति द्वारा सिफारिश किए जाने पर उसे एक निहित या लागू करने योग्य अधिकार प्राप्त हो गया था स्वीकार्य नहीं है. इस संबंध में कानून अब कोई अनसुलझा मुद्दा नहीं रह गया है. यह एक स्थापित सिद्धांत है कि किसी चुनिंदा सूची में केवल शामिल होने या यहाँ तक कि चयन समिति द्वारा सिफारिश किए जाने मात्र से ही, नियुक्ति का कोई अकाट्य अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता. केवल एक अपेक्षा और कानूनी रूप से लागू किए जा सकने वाले अधिकार के बीच के अंतर को सेवा न्यायशास्त्र में लगातार रेखांकित किया गया है.

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कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के शंकरसन दास बनाम भारत संघ मामले में आधिकारिक रूप से दिये गये निर्णय पर भरोसा किया गया जिसमें कहा गया था कि किसी उम्मीदवार को केवल चयनित होने के आधार पर नियुक्ति का कोई निहित अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता. अधिक से अधिक, यह कहा जा सकता है कि याचिकाकर्ता को एक ‘वैध अपेक्षा’ थी तथापि ऐसी अपेक्षा वैधानिक प्रावधानों, कार्यकारी नीतियों और व्यापक जनहित संबंधी विचारों के अधीन ही रहती है.

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का उस सिद्धांत पर भरोसा करना भी तर्कसंगत नहीं है कि “खेल के नियम” प्रक्रिया के बीच में नहीं बदले जा सकते. यद्यपि इस सिद्धांत को मनमानी के विरुद्ध एक हितकारी सुरक्षा कवच के रूप में मान्यता प्राप्त है, तथापि यह किसी भी अर्थ में पूर्ण नहीं है और इसमें स्पष्ट रूप से परिभाषित अपवादों की गुंजाइश है.  

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