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Online Application से अनियमितता की गुंजाइश कम, लेकिन मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 के तहत मैन्युअल आवेदन पर रोक नहीं लगा सकते

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, मैन्युअल आवेदन का मौका न देना अधिनियम 2009 के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देगा

Online Application से अनियमितता की गुंजाइश कम, लेकिन मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 के तहत मैन्युअल आवेदन पर रोक नहीं लगा सकते

Online Application व्यवस्था से पारदर्शिता आ सकती है और मानवीय दखल कम हो सकता है. स्कूलों के आवंटन में अनियमितताओं की गुंजाइश कम हो सकती है. लेकिन, सिर्फ इसी आधार पर किसी भी मैन्युअल आवेदन (Application) पर रोक नहीं लगाई जा सकती. ऐसा इसलिए है क्योंकि ज्यादातर छात्र और उनके परिवार ऐसे वंचित और कमजोर तबके से आते हैं, जो शायद हमेशा ऑनलाइन आवेदन (Application) न कर पाएँ.

यदि आवेदन (Application) केवल ऑनलाइन माध्यम से ही जमा करने पर जोर दिया जाता है तो राज्य सरकार को माता-पिता की सुविधा के लिए एक अहम जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए. उन्हें बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन (Application) जमा करने में मदद करना या और कोई भी अन्य तरीका प्रयोग में लाना चाहिए.

ऐसा न करना बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देगा. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने ख्वाजा अशर नाम के छात्र के ए​डमिशन के लिए बीएसए प्रयागराज को तत्काल कार्रवाई का आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा है कि इस पर आवश्यक कार्रवाई की जाय ताकि छात्र का शैक्षणिक सत्र बर्बाद न हो.

सरकार एसओपी जारी करे जिसमें बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय के माध्यम से ऑनलाइन Application)फॉर्म पर कार्रवाई करने के लिए दिशानिर्देश शामिल हों

कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया है कि इस फैसले को उत्तर प्रदेश राज्य के सभी जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों तक पहुँचाया जाय. सरकार चाहे तो एक एसओपी जारी करे जिसमें उन माता-पिता के लिए बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन (Application) फॉर्म पर कार्रवाई करने के लिए दिशानिर्देश शामिल हों, जो अधिनियम, 2009 की धारा 12(1)(c) के लाभ के लिए ऑनलाइन आवेदन करने में असमर्थ हैं. कोर्ट ने माइनर की तरफ से दाखिल रिट याचिका स्वीकार कर ली है.

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यह रिट पिटीशन बच्चों के मुफ्त और जरूरी शिक्षा के अधिकार एक्ट, 2009 के सेक्शन 12(1)(c) के तहत पिटीशनर ख्वाजा अशर (नाबालिग) को क्लास नर्सरी में एडमिशन देने का आदेश देने के आदेश के आग्रह कि साथ दाखिल की गयी थी. याचिकाकर्ता का मामला यह है कि उसने बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रयागराज के कार्यालय में 05.04.2023 के पत्र के साथ मैन्युअल रूप से आवेदन (Application) किया था. उसने Application ऑनलाइन फिल करने में असमर्थता व्यक्त की थी.

उसने दिनांक 03.03.2016 के शासनादेश पर भरोसा किया था जिसमें यह प्रावधान किया गया है कि प्रवेश के लिए बच्चे के माता-पिता जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में आवेदन कर सकते हैं. अतिरिक्त परियोजना निदेशक द्वारा 06.02.2017 को जारी अधिसूचना पर भरोसा किया था जिसमें भी खंड 2 (डी) के तहत यह प्रावधान किया गया है कि किसी भी कारण से आवेदन ऑनलाइन नहीं किया जा सकता है तो उस परिस्थिति में इसे ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के माध्यम से किया जा सकता है.

कोर्ट के समक्ष प्रतिवादी की तरफ से 03.03.2016 के सरकारी ऑर्डर की एक कॉपी भी फाइल की गई, जिसमें कहा गया है कि अगर माता-पिता मैनुअल Application ऑनलाइन अपलोड नहीं कर पाते हैं तो जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की यह ड्यूटी है कि वह उसे फॉरवर्ड करे. इसमें यह भी लिखा है कि एक्ट 2009 के सेक्शन 12(1)(c) के नियम के मुताबिक किसी भी बच्चे को किसी भी वजह से एडमिशन देने से मना नहीं किया जा सकता. स्टैंडिंग काउंसिल ने स्पेशल सेक्रेटरी स्टेट प्रोजेक्ट डायरेक्टर (एजुकेशन फॉर ऑल) के 2017 के लेटर का हवाला दिया और बताया कि 03 मार्च 2016 के सरकारी ऑर्डर के मुताबिक Application ऑनलाइन कर दिया गया है.

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कोर्ट ने माना कि 2017 के पत्र के पैराग्राफ संख्या 3 को ध्यान से पढ़ने पर यह साफ पता चलता है कि सरकारी आदेश के अनुसार ऑनलाइन Application प्रक्रिया को “भी” लागू किया जा रहा है. स्टैंडिंग काउंसिल ने 30.01.2023 के पत्र का हवाला देते हुए यह तर्क दिया कि शैक्षणिक सत्र 2023-24 में दाखिले के लिए जो प्रक्रिया सोची गई है वह केवल ऑनलाइन Application के माध्यम से ही है.

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पत्र सिर्फ पढ़ने से ही यह साफ हो जाता है कि 03.03.2016 के सरकारी आदेश के संबंध में एक नोट बनाया गया था, जिसमें केवल यह बताया गया था कि एक ऑनलाइन Application और लॉटरी प्रणाली शुरू की गई है. इसमें किसी भी तरह से यह संकेत नहीं दिया गया है कि 2016 के सरकारी आदेश में कोई संशोधन किया गया है या बेसिक शिक्षा अधिकारी के माध्यम से मैन्युअल रूप से आवेदन करने पर कोई रोक लगाई गई है.

अदालत उद्देश्यों और कारणों के विवरण तथा 86वें संशोधन अधिनियम, 2002 पर भी ध्यान देती है, जिसके द्वारा, भारत के संविधान में अनुच्छेद 21-A जोड़ा गया है ताकि बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का प्रावधान किया जा सके. यह संबंधित सरकार पर यह दायित्व डालता है कि वह प्राथमिक शिक्षा में दाखिला, उपस्थिति और उसकी पूर्णता सुनिश्चित करे और उसका प्रावधान करे. यह प्रावधान करता है कि हर बच्चे को एक ऐसे औपचारिक स्कूल में संतोषजनक और समान गुणवत्ता वाली पूर्णकालिक प्राथमिक शिक्षा पाने का अधिकार है जो कुछ जरूरी मानदंडों और मानकों को पूरा करता हो.
आदेश में कोर्ट ने मेंशन कराया

यदि राज्य के तर्क Online Application को स्वीकार कर लिया जाता है और मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम, 2009 की धारा 12(1)(c) के तहत किए जाने वाले आवेदन (Application) को केवल ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से जमा करना अनिवार्य कर दिया जाता है तो इस न्यायालय को आशंका है कि संवैधानिक संशोधन और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों का मूल उद्देश्य पूरी तरह से विफल हो जाएगा.
बेंच ने किया कमेंट

सुनवाई के दौरान बेंच की तरफ से किये गये एक सवाल के जवाब में यह तथ्य भी सामने आया कि शैक्षणिक सत्र 2024-25 के लिए कुल 3760 बच्चों में से केवल 2412 बच्चों ने ही दाखिला लिया. शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए कुल 3862 बच्चों में से, केवल 2527 बच्चों ने ही दाखिला लिया. यानी दो शैक्षणिक सत्रों में 1300 से अधिक बच्चों ने दाखिला नहीं लिया.

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बेंच ने माना कि यह तथ्य 2009 के अधिनियम के लाभों को लागू करने में एक अंतर्निहित दोष का संकेत है. बच्चे लाभ को प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं लेकिन स्कूलों के आवंटन में दोष के कारण हजारों बच्चे लाभ नहीं उठा पा रहे हैं. सरकार को भी इसके कारणों की जांच करनी चाहिए और कुछ सुधारात्मक उपाय प्रदान करने चाहिए.

मैं हलफनामे के जरिए इकट्ठा किए गए और रिकॉर्ड पर लाए गए डेटा का भी जिक्र कर सकता हूँ. यह डेटा दिखाता है कि प्रयागराज में 2025-26 के एकेडमिक सेशन के लिए कुछ स्कूलों ने बहुत ही कम संख्या में छात्रों को एडमिशन दिया है. यह 25% एडमिशन के तय मापदंड को पूरा नहीं करता है.
जस्टिस सिद्धार्थ नंदन

Neutral Citation No. – 2026:AHC:92781; WRIT – C No. – 34106 of 2023 Khwaja Asher (Minor)  V/s State Of U.P. And 4 Others

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