आनलाइन आवेदन में Gender महिला के बजाय पुरुष भर देना मानवीय भूल, हाईकोर्ट ने याची को दी 16 मई को परीक्षा में बैठने की अनुमति
राजकीय स्कूलों में सहायक अध्यापक पद पर भर्ती के लिए आयोजित की जा रही है लिखित परीक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने वशिष्ठ नारायण कुमार बनाम बिहार राज्य केस में कहा है कि ऑनलाइन एप्लीकेशन फॉर्म में हुई छोटी-मोटी (Gender) और अनजाने में हुई गलतियों (Gender गलत लिखना) को इतना खतरनाक नहीं माना जा सकता कि वे किसी और तरह से योग्य अभ्यर्थी के लिए सही न हों. कोर्ट ने कहा कि मामूली लिपिकीय गलतियों (Gender गलत लिखना) के लिए अभ्यर्थिता निरस्त करना सही नहीं है. कोर्ट ने कहा कि जहाँ किसी अभ्यर्थी की बेसिक अर्हता पर कोई सवाल नहीं है और आनलाइन फार्म भरने में अनजाने में गलती (Gender गलत लिखना) हुई है जिसे ठीक किया जा सकता है, तो अभ्यर्थिता निरस्त नहीं की जा सकती.
इसके हवाले से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि जानबूझकर की गई झूठी घोषणा और लापरवाही, अनदेखी या टेक्निकल रुकावट से हुई मानवीय गलती के बीच काफी अंतर है. इसलिए चयन प्राधिकारियों को दुरुस्त करने के लिए व्यावहारिक और न्यायिक तरीका अपनाना चाहिए. याची एक महिला है.
Gender कालम में उसने महिला के बजाय पुरुष कालम पर टिक कर दिया
उसने राजकीय स्कूलों में सहायक अध्यापक पर नियुक्ति के लिए एलटी ग्रेड भर्ती में आनलाइन आवेदन भरा. Gender कालम में उसने महिला के बजाय पुरुष कालम पर टिक कर दिया. इसके चलते उसका Gender चेंज हो गया जबकि आवेदन के समय उसने अपना फोटोग्राफ भी अपलोड किया था. Gender कालम में गलत सूचना इंट्री कर देने की जानकारी होने पर महिला ने इसे ठीक करने के लिए आवेदन भी किया लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. उसका आवेदन फॉर्म भी निरस्त कर दिया गया.
16 मई को लिखित परीक्षा कराने की डेट तय हो जाने के बाद और कोई रास्ता न सूझने पर महिला ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की और परीक्षा में बैठने की अनुमति देने का आदेश परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था को देने की मांग की.
शिवांगी उपाध्याय की याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस मंजू रानी चौहान ने याची को 16 मई 2026 को होने वाली परीक्षा में बैठने देने का निर्देश दिया है और कहा कि यदि मानवीय भूल (Gender गलत लिखना) जिसका उसे अनुचित लाभ नहीं मिलने वाला के आधार पर परीक्षा में बैठने नहीं दिया गया तो अपूरणीय क्षति होगी.
सरकारी वकील का कहना था कि आनलाइन आवेदन करने वालों को अपने आवेदन में करेक्शन करने का मौका दिया गया था. इसके लिए बकायदा तिथि भी तय कर दी गयी थी, इसका सूचना भी अभ्यर्थियों को पहले ही दे दी गयी थी. याची ने समय रहते कोई प्रयास नहीं किया इसलिए अब उसे राहत पाने का कोई अधिकार नहीं है. बेंच ने इस तर्क को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि Gender गलत लिखना मानवीय भूल है, इसके जरिए उसे कोई फायदा नहीं होने वाला है. ऐसे में गलती को सुधारने का मौका दिया जाना चाहिए.