वाराणसी के बहुचर्चित 4 की हत्या में शामिल तीन आरोपियों को Sentence to death इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उम्र कैद में तब्दील की
कोर्ट ने कहा, रेयर आफ द रेयरेस्ट केस की श्रेणी में नहीं आती है यह घटना, महिला आरोपी की उम्र कैद की सजा बरकरार

पीठ ने चौथे आरोपी की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है. यह फैसला जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ द्वारा ‘अमजद एवं 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ (कैपिटल क्रिमिनल अपील संख्या 20/2022) तथा सम्बद्ध याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया गया.
घटना 16 जून 2012 की रात लगभग 8:30 बजे वाराणसी के चेतगंज/चौक थाना क्षेत्र स्थित बेनियाबाग में स्थित बाबा रहीम शाह मजार व कब्रिस्तान परिसर की है. लिखित रिपोर्ट के अनुसार, वादी मोहम्मद सईद उर्फ काजू अपने भाई मोहम्मद शफीक उर्फ राजू (मजार के गद्दी-नशीन), मोहम्मद शकील उर्फ जाऊ तथा भतीजों के साथ मजार की तरफ जा रहे थे.
इसी दौरान कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जे व आपसी विवाद को लेकर आरोपी अमजद, उसके बेटे रमजान, अरशद, पत्नी शकीला और अन्य ने बांस की लाठियों व डंडों से उन पर जानलेवा हमला कर दिया. बीच-बचाव करने आए मजार के सेवादार कामिल पर भी आरोपियों ने क्रूरता से हमला किया.
सिर पर गंभीर चोटें आने के कारण शफीक उर्फ राजू और कामिल की मौके पर ही या अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई. शकील और भतीजे चांद ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. घटना में एक अन्य व्यक्ति (मोहम्मद सैफ उर्फ शालू) गंभीर रूप से घायल हुआ. इस भयावह हमले में कुल 4 लोगों की जान चली गई थी.
वाराणसी के सत्र न्यायाधीश ने 14 अक्टूबर 2022 को मामले की सुनवाई पूरी करते हुए मुख्य आरोपी अमजद, रमजान और अरशद को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) के तहत दोषी ठहराते हुए Sentence to death (फांसी) की सजा सुनाई थी. इसी के साथ अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 366 के तहत Sentence to death (मृत्युदंड) की पुष्टि के लिए मामला उच्च न्यायालय को भेजा था (कैपिटल रेफरेंस सं. 15/2022).
अमजद की पत्नी श्रीमती शकीला को धारा 302 के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, जिसके खिलाफ उन्होंने आपराधिक अपील संख्या 8766/2022 दाखिल की थी. वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने आरोपियों का पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि यह घटना बिना किसी पूर्व नियोजित साजिश के अचानक हुए विवाद और आवेश के क्षणों में हुई थी.
उन्होंने कहा कि हमले में किसी भी धारदार या घातक हथियार (जैसे तलवार या बंदूक) का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि मौके पर पड़ी कच्ची बांस की बल्लियों का इस्तेमाल हुआ. इसके अलावा, अभियुक्तों का कोई पिछला आपराधिक इतिहास नहीं रहा है और वे पेशेवर अपराधी या समाज के लिए खतरा नहीं हैं.
अपर शासकीय अधिवक्ता ने Sentence to death (मृत्युदंड) की पुष्टि की मांग करते हुए कहा कि आरोपियों ने निहत्थे और असहाय लोगों पर लगातार सिर जैसे संवेदनशील हिस्से पर वार किया. 4 निर्दोष लोगों की निर्मम हत्या करना और एक को गंभीर रूप से अपाहिज बना देना एक जघन्य अपराध है, इसलिए निचली अदालत द्वारा दिया गया Sentence to death (मृत्युदंड) बिल्कुल उचित है.
हाई कोर्ट ने Sentence to death पर 46 पृष्ठों के विस्तृत निर्णय में साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का गहन विश्लेषण किया:
चश्मदीद गवाहों की विश्वसनीयता: अदालत ने माना कि वादी मोहम्मद सईद और घायल गवाह मोहम्मद सैफ उर्फ शालू की गवाही पूरी तरह से विश्वसनीय और मेडिकल साक्ष्यों से संपुष्ट है.

IPC की धारा 300 (अपवाद 4) की अमान्यता: अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि यह मामला केवल गैर-इरादतन हत्या का है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि लाठियों का प्रयोग हुआ, लेकिन जिस तरह से सभी 4 मृतकों और घायल के सिर की हड्डियों को चकनाचूर किया गया, वह यह साबित करता है कि आरोपियों का इरादा हत्या करने का ही था और उन्होंने अत्यधिक क्रूरता से काम लिया.
Sentence to death उम्रकैद में क्यों बदली? उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों, बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य, मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य और हालिया मिसालों का हवाला देते हुए कहा कि:
Sentence to death (मृत्युदंड) केवल “दुर्लभ से दुर्लभतम” मामलों में ही दिया जाना चाहिए, जहां सुधार की कोई गुंजाइश न बचे. आपराधिक न्यायशास्त्र में आजीवन कारावास एक सामान्य नियम है और Sentence to death (मृत्युदंड) एक अपवाद. सत्र न्यायालय ने सजा सुनाते समय “आक्रामक और शामक परिस्थितियों” का सही संतुलन चार्ट तैयार नहीं किया था.
घटना में इस्तेमाल किया गया हथियार पूर्व-नियोजित घातक हथियार नहीं था, बल्कि मौके पर पड़ा कच्चा बांस था. साथ ही, अभियुक्तों का कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं है और न ही वे भाड़े के हत्यारे हैं.
हाई कोर्ट ने वाराणसी सत्र न्यायालय के Sentence to death (मृत्युदंड) के संदर्भ को अस्वीकार कर दिया. अदालत ने अमजद, अरशद और रमजान की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया. इसके अलावा, निचली अदालत द्वारा अन्य धाराओं में दी गई सजाएं और जुर्माना यथावत रहेगा. आरोपी श्रीमती शकीला की अपील को खारिज करते हुए उनकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया है. कोर्ट ने इस फैसले की प्रति तुरंत संबंधित विचारण अदालत को आवश्यक अनुपालन और आदेश लागू करने के लिए भेजने का निर्देश दिया है.