यूपीटीईटी-2026: Multiple-choice में यदि कोई प्रश्न ऐसा है जिसके 1 से अधिक विकल्प सही हैं, तो वह प्रश्न अपनी प्रासंगिकता खो देता है
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया मास्टर पेपर के दो विवादित प्रश्नों को मूल्यांकन से बाहर करने का निर्देश, अभ्यर्थियों को मिलेगी राहत

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि Multiple-choice परीक्षा में यदि कोई प्रश्न ऐसा है जिसके एक से अधिक विकल्प सही हैं, तो Multiple-choice वाला वह प्रश्न अपनी प्रासंगिकता खो देता है. ऐसा प्रश्न जिसके दो उत्तर सही हों, वह मेधा की पहचान के लिए नहीं हो सकता है. यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (UPTET-2026) के मूल्यांकन विवाद पर सुनाया है.
जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच WRIT-A No. 16959 of 2026 (विजय सोनकर व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य) में सुनवाई कर रही थी. अपने फाइनल डिसीजन में कोर्ट ने कहा कि यदि Multiple-choice परीक्षा में कोई प्रश्न त्रुटिपूर्ण पाया जाता है और उसके दो विकल्प सही माने जाते हैं, तो उसे मूल्यांकन प्रक्रिया से बाहर (डिलीट) कर दिया जाना चाहिए. अदालत के इस निर्णय से उन हजारों अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है जो मामूली अंकों से पात्रता परीक्षा पास करने से चूक गए थे.
पूरा विवाद उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (UPTET-2026) के Multiple-choice के मास्टर सेट के प्रश्न संख्या 36 और 37 से जुड़ा
यह पूरा विवाद उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (UPTET-2026) के Multiple-choice के मास्टर सेट के प्रश्न संख्या 36 और 37 से जुड़ा हुआ है. परीक्षा नियामक प्राधिकारी द्वारा घोषित अंतिम उत्तर कुंजी (Final Answer Key) में इन दोनों प्रश्नों के संबंध में दो-दो विकल्पों को सही मान लिया गया था.

याचिकाकर्ताओं विजय सोनकर, तानिया पांडेय और अन्य की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि आयोग ने पहले Multiple-choice प्रश्न के लिए एक ही सही उत्तर की उम्मीद की थी, लेकिन बाद में गलती स्वीकार करते हुए दो विकल्पों को सही माना. इसके बाद आयोग ने केवल उन्हीं अभ्यर्थियों को अंक दिए जिन्होंने उन दो विकल्पों में से किसी एक को चुना था.
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि चूंकि UPTET कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं बल्कि केवल एक अर्हक परीक्षा है, इसलिए इस प्रकार की विसंगति से उन छात्रों के साथ अन्याय होता है जिन्होंने Multiple-choice के अन्य विकल्पों का चयन किया था. याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि इन त्रुटिपूर्ण प्रश्नों को या तो विलोपित माना जाए या इसके अंक सभी अभ्यर्थियों को समान रूप से प्रदान किए जाएं.
फैसला सुनाते हुए जस्टिस विनोद दिवाकर ने सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण फैसलों विशेषकर रण विजय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और ऋशाल बनाम राजस्थान लोक सेवा आयोग का हवाला दिया. अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि Multiple-choice परीक्षा में यदि कोई प्रश्न ऐसा है जिसके एक से अधिक विकल्प सही हैं, तो वह प्रश्न अपनी प्रासंगिकता खो देता है क्योंकि वह मेधावी और साधारण छात्र के बीच अंतर करने में असमर्थ हो जाता है.
अदालत ने अपने आदेश में मुख्य रूप से निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:
प्रश्नों का विलोपन: मास्टर सेट के Multiple-choice प्रश्न संख्या 36 और 37 को मूल्यांकन प्रक्रिया से बाहर (Excluded) किया जाए.
समानता का सिद्धांत: इन प्रश्नों के हटने के बाद परीक्षा प्रश्नपत्र कुल 148 अंकों का माना जाएगा और इसी आधार पर सभी अभ्यर्थियों के अंकों का पुनर्गठन किया जाए. इसका लाभ केवल उन्हीं छात्रों को नहीं मिलेगा जिन्होंने विशेष विकल्प चुने थे, बल्कि यह सभी पर समान रूप से लागू होगा.
परिणामों का संशोधन: उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग (UPESSC) को निर्देश दिया गया है कि वह याचियों और अन्य समान परिस्थिति वाले अभ्यर्थियों के अंकों की नए सिरे से गणना कर संशोधित स्कोरकार्ड जारी करे.
सुनवाई के दौरान चयन आयोग के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि जिन अभ्यर्थियों ने सही माने गए दोनों विकल्पों में से कोई विकल्प नहीं चुना था, वे बोनस अंक के हकदार नहीं हैं. आयोग ने यह भी हवाला दिया कि याचिकाकर्ताओं ने Multiple-choice की अनंतिम उत्तर कुंजी के समय अपनी आपत्तियां दर्ज नहीं कराई थीं.
हालांकि, अदालत ने आयोग की इन दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जब परीक्षा संस्था खुद अपनी अंतिम उत्तर कुंजी में गलती स्वीकार करती है और उत्तर बदलती है, तो इसका असर पूरी परीक्षा प्रणाली पर पड़ता है. अदालत ने कहा कि त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन प्रक्रिया का खामियाजा छात्रों को नहीं भुगतना चाहिए. न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि इसी परीक्षा में आयोग ने एक अन्य प्रश्न संख्या 38 को पहले ही हटा दिया था, इसलिए प्रश्न 36 और 37 के साथ अलग व्यवहार करने का कोई तार्किक आधार नहीं बनता है.
इस फैसले के बाद, उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (UPTET-2026) में शामिल होने वाले और कट-ऑफ अंक से बेहद कम अंतर (जैसे 1 या 2 अंक) से असफल रहने वाले अभ्यर्थियों के लिए पात्रता की उम्मीद फिर से जाग गई है. हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस फैसले से केवल परीक्षा का परिणाम और अर्हता संशोधित होगी और इसे स्वतः किसी भी प्रकार की सरकारी नौकरी या चयन प्रक्रिया में नियुक्ति का अधिकार नहीं माना जाएगा.