Contract शब्द की आड़ लेकर शिक्षकों को बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाई कोर्ट

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना की शुरुआत भारत सरकार द्वारा ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में सामाजिक, शैक्षणिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की बालिकाओं को आवासीय और गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी. इन विद्यालयों में शुरुआत में नियमानुसार चयन प्रक्रिया के तहत शिक्षकों की नियुक्तियां की गईं, जो धीरे-धीरे वर्ष-दर-वर्ष Contract के नवीनीकरण और अल्प मानदेय के चक्रव्यूह में उलझ कर रह गईं.
जब इन शिक्षकों ने अपनी अनिश्चित सेवा शर्तों और आर्थिक शोषण के खिलाफ आवाज उठाई, तो मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय की शरण में पहुंचा. याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने न्यायालय के समक्ष यह प्रभावी तर्क रखा कि जो व्यवस्था पिछले 15 से 20 वर्षों से निर्बाध रूप से चल रही है और जहां शिक्षक नियमित शिक्षकों के समान या उससे भी अधिक कार्यभार संभाल रहे हैं, वहां उन्हें केवल कागजी Contract के नाम पर अनिश्चितता के गर्त में नहीं धकेला जा सकता.
Contract शिक्षक नियमित शिक्षकों के समकक्ष योग्यता रखते हैं और उतनी ही निष्ठा के साथ आवासीय तथा शैक्षणिक दायित्व निभाते हैं
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21-ए (शिक्षा का अधिकार) और विशेष रूप से अनुच्छेद 23 (बेगार व शोषण पर प्रतिबंध) का अत्यंत संवेदनशील और व्यापक विश्लेषण किया. अदालत के मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित रहे:
समान कार्य और समान मूल्य: न्यायालय ने माना कि केजीबीवी Contract शिक्षक नियमित शिक्षकों के समकक्ष योग्यता रखते हैं और उतनी ही निष्ठा के साथ आवासीय तथा शैक्षणिक दायित्व निभाते हैं, इसलिए उन्हें कम मानदेय देना न्यायसंगत नहीं है.
आर्थिक मजबूरी और ‘बेगार’: अदालत ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि शिक्षकों को Contract पर अत्यंत अल्प मानदेय पर रखकर और उनके अन्यत्र रोजगार पर प्रतिबंध लगाकर उन्हें आर्थिक रूप से विवश किया जाता है, जो संविधान के तहत ‘बेगार’ के समान है.
स्वतः सृजित पद: अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कोई योजना और उसके तहत संचालित कार्य दो दशकों से अधिक समय से अनवरत चल रहे हैं, तो वहां कार्यरत कर्मियों के पद स्वतः सृजित मान लिए जाने चाहिए.
न्यायालय ने अपने फैसले में इस अकाट्य सत्य को रेखांकित किया कि राष्ट्र निर्माण की धुरी शिक्षक ही होते हैं. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि जब तक शिक्षकों को मानसिक और आर्थिक चिंताओं से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक बालिकाओं को उच्च स्तर की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना संभव नहीं है.
राज्य और उसके उपक्रमों को एक “मॉडल नियोक्ता” की भूमिका निभानी चाहिए. राज्य अपनी कल्याणकारी भूमिका से यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि नियुक्तियां केवल एक अस्थायी योजना के अंतर्गत थीं. संविधान यह अपेक्षा करता है कि राज्य अपने कर्मचारियों के श्रम का सम्मान करे और उनकी गरिमा की रक्षा करे.
सरकार की ओर से अक्सर यह दलील दी जाती रही है कि इस प्रकार की योजनाओं में केंद्रीय वित्त पोषण और राज्य के बजट के बीच तालमेल की सीमाएं होती हैं तथा इसके लिए कोई अलग से पद स्वीकृत नहीं हैं. इस पर अदालत ने बहुत स्पष्ट रुख अपनाते हुए ‘पे एंड रिकवर’के सिद्धांत को लागू किया.
न्यायालय ने कहा कि यदि केंद्र सरकार से समय पर बजट मिलने में विलंब होता है, तो भी राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती. राज्य का यह प्राथमिक दायित्व है कि वह Contract शिक्षकों को समय पर समुचित भुगतान करे और बाद में केंद्र सरकार से उसकी देय राशि की रिकवरी करे. वित्तीय अभाव या बजट की कमी को बच्चों को अच्छी शिक्षा और शिक्षकों को उचित पारिश्रमिक न देने का बहाना नहीं बनाया जा सकता.