Indian Society कोई भी Minor Lady सामान्यतः अपनी मान-मर्यादा को दांव पर लगाकर झूठे आरोप (376 IPC) नहीं लगाती
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपहरण और दुष्कर्म मामले में दोषी की सजा रखी बरकरार, आपराधिक अपील खारिज

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि कोई भी Minor Lady सामान्यतः अपनी मान-मर्यादा को दांव पर लगाकर झूठे आरोप नहीं लगाती. इस कमेंट के साथ कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखते हुए अभियुक्त की आपराधिक अपील को खारिज कर दिया है. यह मामला एक नाबालिग (Minor Lady) के अपहरण, बहला-फुसलाकर ले जाने और दुष्कर्म से जुड़ा हुआ था. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता (Lady) का बयान विश्वसनीय और सुसंगत है, तो उसकी गवाही के आधार पर बिना किसी अन्य अतिरिक्त पुष्टि के भी सजा सुनाई जा सकती है.
जस्टिस अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने क्रिमिनल अपील संख्या 4246/2017 (पदम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) पर यह फैसला सुनाया. उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा अभियुक्त को विभिन्न धाराओं के तहत दी गई सजा पूरी तरह से कानूनी साक्ष्यों और तथ्यों पर आधारित है, जिसमें किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है.
अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 30 और 31 मार्च 2014 की दरमियानी रात की है. गाजियाबाद जिले के मुरादनगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले एक गांव में, वादी की लगभग 16 वर्षीय भतीजी (Minor Lady जो उसके साथ रहकर पढ़ाई करती थी) घर से रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो गई थी. परिवार के लोग जब रात को एक स्थानीय धार्मिक कार्यक्रम (जागरण) से लौटे, तो उन्होंने पीड़िता (Minor Lady) को घर से नदारद पाया.

खोजबीन करने पर पता चला कि पदम सिंह उर्फ पदमी नामक व्यक्ति ने Minor Lady को शादी का झांसा देकर और झूठे प्रलोभन में फंसाकर अपने साथ अपहरण कर लिया था. इसके बाद, अभियुक्त Minor Lady को फरीदाबाद ले गया, जहां उसने एक किराए के कमरे में उसे लगभग 12 से 13 दिनों तक Lady को बंधक बनाकर रखा और लगातार दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया.
पुलिस ने 13 अप्रैल 2014 को दुहाई बस स्टैंड के पास से अभियुक्त और पीड़िता (Minor Lady) को बरामद किया. इसके बाद पीड़िता (Minor Lady) को का मेडिकल परीक्षण कराया गया और धारा 164 के तहत उसका बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज किया गया. पुलिस ने जांच पूरी करने के बाद अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी.
गाजियाबाद की फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-2 / अपर सत्र न्यायाधीश ने इस मामले में सुनवाई करते हुए 20 फरवरी 2016 को अभियुक्त पदम सिंह उर्फ पदमी को दोषी करार दिया था. निचली अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363 के तहत 5 वर्ष का कठोर कारावास और 5,000 रुपये का जुर्माना, धारा 366 के तहत 7 वर्ष का कठोर कारावास और 10,000 रुपये का जुर्माना, तथा धारा 376 के तहत 10 वर्ष का कठोर कारावास और 20,000 रुपये का जुर्माना सुनाया था.
अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी. इस फैसले के खिलाफ अभियुक्त ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी. उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुना. अपीलार्थी के वकीलों ने तर्क दिया था कि इस मामले में कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था और मेडिकल रिपोर्ट में Minor Lady से जबरन दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई थी.
अदालत ने उच्च विद्यालय (हाईस्कूल) के प्रमाणपत्र के आधार पर यह पुख्ता पाया कि घटना के वक्त पीड़िता की उम्र करीब 16 वर्ष थी और वह नाबालिग थी. कानून के अनुसार, नाबालिग (Minor Lady) की सहमति का कोई वैधानिक आधार नहीं होता है.
यौन उत्पीड़न या दुष्कर्म की शिकार महिला या बच्ची (Minor Lady) कोई सह-अपराधी नहीं होती
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न ऐतिहासिक फैसलों (स्टेट ऑफ पंजाब बनाम गुरमीत सिंह और मोहम्मद इमरान खान बनाम राज्य) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यौन उत्पीड़न या दुष्कर्म की शिकार महिला या बच्ची (Minor Lady) कोई सह-अपराधी नहीं होती, बल्कि वह भावनात्मक आघात झेलने वाली पीड़िता होती है. भारतीय Society की सामाजिक वास्तविकताओं को देखते हुए कोई भी महिला (Minor Lady) सामान्यतः अपनी मान-मर्यादा को दांव पर लगाकर झूठे आरोप नहीं लगाती.
अदालत ने स्पष्ट किया कि बाहरी चोटों का न होना या पैथोलॉजी रिपोर्ट में शुक्राणुओं (Spermatozoa) का न पाया जाना मात्र से पीड़िता (Minor Lady) के उस भरोसेमंद और स्पष्ट बयान को नकारा नहीं जा सकता, जिसमें उसने अपने साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए जाने की बात कही है. कोर्ट ने अपने 26 अक्टूबर 2026 के फैसले में यह रेखांकित किया कि निचली अदालत ने उपलब्ध मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया है. अपील में कोई दम न पाते हुए अदालत ने इसे खारिज कर दिया.
चूंकि अभियुक्त पदम सिंह जमानत पर था, इसलिए उच्च न्यायालय ने उसे 15 दिनों के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण (Surrender) करने का निर्देश दिया. साथ ही, जिला सत्र न्यायाधीश, गाजियाबाद को इस आदेश के अनुपालन के लिए ई-मेल के माध्यम से तत्काल प्रति भेजने का निर्देश दिया गया है. यदि अभियुक्त तय समय सीमा के भीतर आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो निचली अदालत उसकी गिरफ्तारी के लिए आवश्यक कानूनी कदम उठाने को स्वतंत्र होगी.