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30 साल पुराने Service Dispute मामले में कोर्ट का बड़ा निर्णय: कर्मचारी नौकरी से हटाया जाएगा लेकिन वेतन की रिकवरी नहीं होगी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपनाया मानवीय दृष्टिकोण, 30 साल तक कोर्ट के स्टे आर्डर पर नौकरी करता रहा कर्मचारी

30 साल पुराने Service Dispute मामले में कोर्ट का बड़ा निर्णय: कर्मचारी नौकरी से हटाया जाएगा लेकिन वेतन की रिकवरी नहीं होगी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लगभग तीन दशक पुराने Service Dispute मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए याचिकाकर्ता की अपील को खारिज कर दिया. चूंकि याचिकाकर्ता Service Dispute मामले में कोर्ट के स्टे आर्डर के चलते 30 साल तक अस्थायी नौकरी में रहा और नियमित वेतन प्राप्त करता रहा, इस पर मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कोर्ट ने 30 सालों तक कर्मचारी को किये गये वेतन भुगतान की रिकवरी पर रोक लगा दी है.

जस्टिस अनीस कुमार गुप्ता की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए प्रशासनिक नियुक्तियों, तदर्थ सेवाओं (Service) और सरकारी कर्मचारियों की बर्खास्तगी से जुड़े कई अहम कानूनी पहलुओं को उजागर किया. कोर्ट रवींद्र पाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (रिट याचिका संख्या 30577, वर्ष 1995) की सुनवाई कर रही थी. यह पूरा कानूनी विवाद वर्ष 1995 का है.

उत्तर प्रदेश के एटा स्थित सरकारी मूक-बधिर बालिका विद्यालय में वर्ष 1991 में याचिकाकर्ता रवींद्र पाल सिंह को कनिष्ठ लिपिक के पद पर अस्थायी/तदर्थ आधार पर नियुक्त (Service) किया गया था. उनकी नियुक्ति 8 मई 1991 के नियुक्ति पत्र के माध्यम से तय वेतनमान पर की गई थी.

नियुक्ति के समय ही यह स्पष्ट कर दिया गया था कि उनकी यह Service पूरी तरह से अस्थायी

नियुक्ति के समय ही यह स्पष्ट कर दिया गया था कि उनकी यह सेवा (Service) पूरी तरह से अस्थायी है और इसे बिना किसी पूर्व सूचना या कारण बताए कभी भी समाप्त किया जा सकता है. इसके बाद, लगभग चार वर्षों तक सेवा (Service) देने के बाद, 29 सितंबर 1995 को राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों ने ‘उत्तर प्रदेश अस्थायी सरकारी सेवक (सेवा से समाप्ति) नियम, 1975’ का हवाला देते हुए एक महीने का नोटिस देकर उनकी सेवाएं (Service) समाप्त कर दीं.

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इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने तुरंत इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और वर्ष 1995 में ही रिट याचिका दाखिल की. जब यह याचिका वर्ष 1995 में उच्च न्यायालय में आई, तो 1 नवंबर 1995 को न्यायालय ने याचिकाकर्ता को बड़ी राहत देते हुए एक अंतरिम आदेश पारित किया. इस अंतरिम आदेश के जरिए अदालत ने याचिकाकर्ता की Service बर्खास्तगी पर रोक लगा दी और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को नियमित रूप से हर महीने वेतन और एरियर का भुगतान करते रहें.

उस समय पारित अंतरिम आदेश में अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि इस मामले की अंतिम सुनवाई करके इसे छह महीने के भीतर निस्तारित किया जाना चाहिए. परंतु अदालतों में मुल्तवी और मुकदमों के अत्यधिक बोझ के चलते यह मामला अगले 30 वर्षों तक लंबित रहा. इन तीन दशकों के दौरान, अंतरिम संरक्षण के सहारे याचिकाकर्ता लगातार अपनी Service में बने रहे. याचिका दाखिल करते समय उनकी उम्र 28 वर्ष थी, और अब फैसले के वक्त उनकी आयु लगभग 59 वर्ष हो चुकी है.

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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि चूंकि याचिकाकर्ता की Service एक स्थायी पद के विरुद्ध हुई थी, इसलिए उसे 1975 के नियमों के तहत केवल “Temperory Service” मानकर अचानक नहीं हटाया जा सकता. उन्होंने यह भी दलील दी कि Service समाप्त करने से पहले उन्हें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के तहत सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया, जो कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 311(2) का उल्लंघन है.

दूसरी ओर, राज्य सरकार के अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि संबंधित संस्थान की स्थापना वर्ष 1990 में हुई थी. शुरुआत में कामकाज चलाने के लिए तदर्थ नियुक्तियां की गई थीं, जो नियमित चयन प्रक्रिया पूरी होने तक ही प्रभावी थीं. नियुक्ति पत्र की शर्तों के अनुसार, जब तक किसी कर्मचारी की Service का विधिवत पुष्टिकरण नहीं हो जाता, उसकी स्थिति एक अस्थायी या तदर्थ कर्मचारी की ही रहती है. इसलिए 1975 के नियमों के तहत एक महीने का नोटिस देकर Service समाप्त करना पूरी तरह वैध है.

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जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने और पत्रावलियों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति के बाद कभी भी उनकी Service के पुष्टिकरण का कोई आदेश पारित नहीं हुआ था. उत्तर प्रदेश राज्य सरकारी सेवक पुष्टिकरण नियम, 1991 (U.P. State Government Servants Confirmation Rules, 1991) के नियम-4 के तहत यह स्पष्ट है कि जब तक सक्षम प्राधिकारी द्वारा औपचारिकता पूरी कर पुष्टिकरण आदेश जारी नहीं किया जाता, तब तक कर्मचारी की स्थिति अस्थायी बनी रहती है.

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि

अस्थायी प्रकृति: तदर्थ नियुक्ति अपने आप में एक अस्थायी व्यवस्था है, जो नियमित चयन होने तक ही टिकती है. इसे स्थायी अधिकार नहीं माना जा सकता.

अनुच्छेद 311 का दायरा: अदालत ने दोहराया कि संविधान का अनुच्छेद 311 केवल तभी लागू होता है जब बर्खास्तगी या निष्कासन का आदेश ‘दंडस्वरूप’ हो. वर्तमान मामला नियमों के तहत एक सामान्य समाप्ति का था, इसलिए इसमें सुनवाई के विशेष अवसर की अनिवार्यता नहीं थी. कोर्ट ने तकनीकी और कानूनी तर्कों के आधार पर याचिकाकर्ता की मुख्य याचिका को खारिज कर दिया और यह माना कि 29 सितंबर 1995 का Service बर्खास्तगी आदेश कानून के विरुद्ध नहीं था, तथापि अदालत ने मामले के मानवीय पहलुओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया.

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चूंकि याचिकाकर्ता ने अदालत के अंतरिम आदेश के बल पर पिछले 30 वर्षों से अधिक समय तक लगातार अपनी सेवाएं (Service) दी थीं और अब वे लगभग सेवानिवृत्ति की आयु (59 वर्ष) पर पहुंच चुके हैं, इसलिए कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि पिछले तीन दशकों के दौरान अंतरिम आदेश के तहत याचिकाकर्ता को जो भी वेतन और वित्तीय लाभ दिए जा चुके हैं, उनकी किसी भी प्रकार की रिकवरी राज्य सरकार द्वारा नहीं की जाएगी.

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