इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: किसी व्यक्ति का मृतक का Legal heir होना अपने आप उसे फैमिली पेंशन का हकदार नहीं बनाता
कोर्ट ने कहा, उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करने वाली कोर्ट यह तय नहीं कर सकती कि मृत कर्मचारी की फैमिली पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ पाने का हकदार कौन है

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति का मृतक का Legal heir होना ही उसे फैमिली पेंशन का हकदार नहीं बनाता है. कोर्ट ने कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 372 के तहत उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करने वाली अदालत यह अंतिम रूप से तय नहीं कर सकती कि मृत कर्मचारी की Legal heir कौन है और फैमिली पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ पाने का हकदार कौन है. इन लाभों का अधिकार संबंधित सेवा नियमों से तय होगा. इसके लिए सक्षम प्राधिकारी को लागू नियमों के आधार पर निर्णय लेना होगा.
जस्टिस अनिल कुमार दशम ने यह आदेश और फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि मृत व्यक्ति का कानूनी वारिस (Legal heir) होना और उसके किसी विशेष सेवा लाभ का हकदार होना दो अलग-अलग प्रश्न हैं. उत्तराधिकार कानून के तहत कानूनी वारिस (Legal heir) का निर्धारण किया जा सकता है, लेकिन फैमिली पेंशन और अन्य सेवा लाभों का अधिकार संबंधित वैधानिक नियमों के अनुसार ही तय होगा.
मामला उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल रहे दिवंगत सुशील कुमार के सेवा लाभों से संबंधित है. उनकी पत्नी शशि ने विभाग के पास जमा 2,64,521 रुपये में Legal heir के तौर परआधे हिस्से के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र मांगा था. यह धनराशि पेंशन, ग्रेच्युटी, समूह बीमा और अन्य सेवा लाभों से संबंधित थी. शशि का कहना था कि उनकी शादी सुशील कुमार से 16 जून 1994 को हुई थी और वह तथा सुशील कुमार की मां सोना देवी उनके कानूनी वारिस (Legal heir) हैं.
दूसरी तरफ सोना देवी और अन्य प्रतिवादियों ने देव सहगल को सुशील कुमार का बेटा बताते हुए शशि के दावे का विरोध किया. निचली अदालत ने शशि को सुशील कुमार की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी माना था. साथ ही पारिवारिक रजिस्टर और अन्य दस्तावेजों के आधार पर देव सहगल को भी उनका बेटा (Legal heir) स्वीकार किया था. हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 16 का हवाला देते हुए अदालत ने नाबालिग देव को उसके अभिभावक सोना देवी के माध्यम से फैमिली पेंशन देने का निर्देश दिया था. ग्रेच्युटी, सामान्य भविष्य निधि और समूह बीमा की धनराशि शशि, सोना देवी और नाबालिग के बीच देय मानी गई थी.
हाईकोर्ट में केस की सुनवाई के दौरान पत्नी शशि के अधिवक्ता की ओर से दलील दी गयी कि उत्तर प्रदेश पुलिस असाधारण पेंशन नियम, 1961 के तहत फैमिली पेंशन मृत कर्मचारी की विधवा (Legal heir) को मिलनी चाहिए. वहीं, प्रतिवादियों ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 16 के तहत अमान्य विवाह से जन्मे बच्चे को वैध संतान का दर्जा प्राप्त है और उसे पिता के सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता.
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जोध सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और श्रीमती वायलेट इसाक बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के फैसलों का उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि फैमिली पेंशन मृत कर्मचारी की संपत्ति का हिस्सा नहीं होती, बल्कि संबंधित सेवा नियमों के तहत पात्र व्यक्ति को मिलने वाला लाभ है. इसी तरह, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का अधिकार भी उन पर लागू नियमों के अनुसार तय किया जाएगा.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का मृतक का Legal heir होना अपने आप उसे फैमिली पेंशन का हकदार नहीं बनाता. इसी प्रकार, किसी बच्चे का मृत कर्मचारी का बेटा होना भी उसे सेवा नियमों के विपरीत पेंशन पाने का अधिकार नहीं देता. उत्तराधिकार प्रमाणपत्र मुख्य रूप से कर्ज और प्रतिभूतियों से संबंधित होता है. इसलिए इसके आधार पर अदालत सेवा लाभों के अंतिम हकदार का निर्धारण नहीं कर सकती.
सक्षम प्राधिकारी को निर्देश सभी पक्षों के दावों पर लागू सेवा नियमों के अनुसार नए सिरे से Legal heir पर फैसला करे
हाईकोर्ट ने शशि की अपील स्वीकार करते हुए सहारनपुर के अपर जिला जज, कोर्ट नंबर 10 के 24 सितंबर 2011 के आदेश को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जिसमें फैमिली पेंशन और अन्य सेवा लाभों के अंतिम हकदार तय किए गए थे. अदालत ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह सभी पक्षों के दावों पर लागू सेवा नियमों के अनुसार नए सिरे से Legal heir के आधार पर फैसला करे. इस दौरान वह निचली अदालत की उन टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होगा, जिन्हें हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया है.