Minor Crime का तथ्य न बताया गया हो तो भी चयन निरस्त नहीं किया जा सकता, चयन निरस्तीकरण आदेश रद्द

जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की बेंच अनिल कुमार यादव की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. याची का सेलेक्शन कांस्टेबल पद पर हो चुका था. चयनित होने के बाद उसे ट्रेनिंग के लिए वाराणसी जनपद एलॉट किया गया था. ट्रेनिंग शुरू होने से पहले अभ्यर्थियों का करैक्टर वेरीफिकेशन उनके मूल जनपद से कराया गया.
इससे पहले मेडिकल परीक्षण के दौरान उनके एक फॉर्म भरवाया गया और शपथ पत्र लिया गया. इसमें अभ्यर्थियों से उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे की जानकारी देने को कहा गया था. कांस्टेबल अनिल कुमार यादव ने अपने खिलाफ दर्ज एक मामले (Minor Crime) की जानकारी शपथ पत्र में नहीं दी थी.
इसी के आधार पर उसका चयन एसएसपी, वाराणसी ने 14 जनवरी 2007 के आदेश से निरस्त कर दिया था. आधार यह लिया गया था कि उसके खिलाफ धारा 323, 504, 506, 427 आईपीसी के तहत एफआईआर दर्ज थी जिसे उसने आवेदन के समय छिपा लिया था. हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अपराध मामूली प्रकृति (Minor Crime) का था. उनका कहना था कि इस मामूली प्रकृति (Minor Crime) के अपराध के कारण याची का चयन निरस्त नहीं किया जा सकता है.
नौकरी न मिल पाने के भय से याची ने Minor Crime के तथ्य को नहीं बताया
कहा यह भी गया कि नौकरी न मिल पाने के भय से याची ने Minor Crime के तथ्य को नहीं बताया था, परंतु इससे उसकी अयोग्यता नहीं हो जाती. हाईकोर्ट ने भी अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह केस तथा कमीश्नर आफ पुलिस बनाम संदीप कुमार व अन्य सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आधार बनाकर याची की याचिका मंजूर कर लिया तथा चयन निरस्तीकरण आदेश को रद्द कर दिया.
हाईकोर्ट ने सरकार के शीर्ष अधिकारियों को आदेश की प्रति उपलब्ध कराने को कहा है ताकि भविष्य में इस तरह से Minor Crime और मामूली धारा में दर्ज एफआईआर जैसे तथ्य का भर्ती की प्रक्रिया पूरी करने के दौरान अभ्यर्थी की तरफ से गोपन करने पर चयन निरस्त करने की कार्यवाही की पुनरावृत्ति न हो.
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि सरकार इस मामले में एक नीति बनाए और उसमें उन अपराधों की श्रेणी बनाए जिसमें स्पष्ट हो कि किन अपराधों में चयन निरस्त होगा और किन अपराधों में चयन निरस्त नहीं होगा. हाईकोर्ट का कहना था कि ऐसी नीति बनाने से नियुक्ति प्राधिकारियों को आगे चयन में स्पष्टता होगी.
आवासीय स्कूल में शिक्षक से मारपीट और जबरन इस्तीफा लेने पर कोर्ट की टिप्पणी जिनपर पीढ़ी के भविष्य संवारने का दायित्व, उनके साथ दुर्व्यवहार गंभीर चिंतनीय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आवासीय विद्यालय में संविदा पर कार्यरत हिंदी शिक्षक से मारपीट कर जबरन इस्तीफा लेने के आरोप को गंभीरता से लिया है. कोर्ट ने कहा कि यदि आरोप सही हैं तो मामला बेहद गंभीर है. शैक्षणिक संस्थान से भावी पीढ़ी को आदर्श व्यवहार सीखने की अपेक्षा की जाती है, वहां इस तरह की गतिविधियां नहीं होनी चाहिए. यह आदेश जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने हरि नारायण की याचिका पर दिया है.
याची के अधिवक्ता नित्यानंद श्रीवास्तव ने दलील दी कि याची महिला समाख्या द्वारा स्थापित विहान बालक/बालिका आवासीय विद्यालय में पूर्णकालिक हिंदी शिक्षक के रूप में संविदा पर कार्यरत था. उसे वार्डन की जिम्मेदारी भी दी गई थी. 15 मार्च 2026 को निरीक्षण के दौरान प्रतिवादी संख्या पांच और छह ने उसके साथ मारपीट की और दबाव बनाकर उसका इस्तीफा ले लिया. याची ने अधिकारियों और पुलिस से शिकायत की, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं की गई. उसने स्वेच्छा से इस्तीफा नहीं दिया है और वह आज भी सेवा जारी रखना चाहता है.
कोर्ट ने प्रतिवादी संख्या 2, 3, 5 और 6 को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है. नोटिस की तामील सात दिन के भीतर सुनिश्चित करने तथा प्रतिवादियों को तीन सप्ताह में जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है. कोर्ट ने प्रतिवादी संख्या तीन को 15 मार्च की घटना की जांच करने की भी अनुमति दी है. जांच से पहले प्रतिवादी पांच और छह को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का अवसर देना होगा. याची को भी सुनने के बाद जांच रिपोर्ट हलफनामे के साथ कोर्ट में पेश करनी होगी. मामले की अगली सुनवाई 14 अक्तूबर 2026 को दोपहर दो बजे होगी.