+91-9839333301

legalbulletin@legalbulletin.in

| Register

Religion change करने से ही किसी व्यक्ति का ‘अनुसूचित जनजाति’ का दर्जा अपने आप खत्म नहीं हो जाता, 3 याचिकाएं खारिज

Religion change करने से ही किसी व्यक्ति का 'अनुसूचित जनजाति' का दर्जा अपने आप खत्म नहीं हो जाता, 3 याचिकाएं खारिज
Arun-Kumar J.

किसी दूसरे धर्म में धर्म परिवर्तन (Religion change) करने से ही किसी व्यक्ति का ‘अनुसूचित जनजाति’ का दर्जा अपने आप खत्म नहीं हो जाता. कोई व्यक्ति अनुसूचित जनजाति का सदस्य बना रहता है या नहीं, यह तथ्यों पर निर्भर करता है. इसका फैसला आदिवासी पहचान की जरूरी विशेषताओं की जांच करके किया जाएगा.

ऐसे तथ्यों की जांच के समय पारंपरिक रीति-रिवाज, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और संबंधित आदिवासी समुदाय द्वारा स्वीकार्यता को ध्यान में रखा जायेगा. ‘चिंथडा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के इस फैसले पर आधार बनाकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने ननकी उर्फ नईमुन्निशा द्वारा दाखिल तीन याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिसमें सोनभद्र जिले के दुद्धी तहसील में जमीन की रजिस्ट्री को अमान्य ठहराने वाले राजस्व अधिकारी के आदेशों को चुनौती दी गई थी.

याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि वह जन्म से भुइयां अनुसूचित जनजाति की सदस्य हैं और उन्होंने 2011 से 2018 के बीच गौर जनजाति के विक्रेताओं से रजिस्टर्ड बैनामों के जरिए बगारू गांव में कृषि भूमि खरीदी थी. दुद्धी के उप जिलाधिकारी  ने 22 जनवरी 2026 को अलग-अलग आदेश पारित कर इन बैनामों को यूपी राजस्व संहिता, 2006 की धारा 99/157-बी का उल्लंघन मानते हुए शून्य घोषित कर दिया था और जमीन राज्य सरकार में निहित करने का निर्देश दिया था.

Religion change कर नईमुन्निशा हो गईं, और दशकों तक मुस्लिम पहचान के साथ रहीं

राज्य की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल अनूप त्रिवेदी ने दलील दी कि याचिकाकर्ता ने सिराजुद्दीन से इस्लामी रीति से विवाह किया, नाम बदलकर (Religion change) नईमुन्निशा हो गईं, और दशकों तक मुस्लिम पहचान (Religion change) के साथ रहीं.उनके बच्चों के नाम भी मुस्लिम हैं तथा परिवार रजिस्टर में धर्म मुस्लिम दर्ज है. राज्य ने यह भी कहा कि जनजातीय प्रमाण पत्र तथ्य छिपाकर हासिल किया गया.

इसे भी पढ़ें….बार एसोसिएशन में महिलाओं की 30 फीसदी भागीदारी: नए सिरे से नहीं होंगे बुलंदशहर बार एसोसिएशन के चुनाव, नामिनेशन को मंजूरी

याचिकाकर्ता के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के रमेशभाई दाभाई नाइका मामले का हवाला देते हुए कहा कि केवल विवाह से जन्मजात जनजातीय स्टेटस समाप्त नहीं हो जाता, और संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में धर्म परिवर्तन (Religion change) को लेकर अनुसूचित जाति आदेश जैसा कोई अपवाद नहीं है.

याचिकाकर्ता के पास ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि Religion change के बाद भुइयां समुदाय के साथ उसका जुड़ाव लगातार बना हुआ था. सक्षम अधिकारी और इस कोर्ट के सामने पेश किए गए सबूतों और जानकारी पर विचार करने के बाद कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता भुइयां समुदाय के साथ अपने लगातार जुड़ाव को संतोषजनक ढंग से साबित नहीं कर पाई. वह ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत पेश नहीं कर सकी, जिससे यह पता चले कि उन हालात के बावजूद, उसने भुइयां अनुसूचित जनजाति के रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन जारी रखा, उसके सामाजिक और सामुदायिक जीवन में हिस्सा लेती रही और उस समुदाय द्वारा पहचानी और स्वीकार की जाती रही.
बेंच ने दी राय

जस्टिस अरुण कुमार ने कहा कि धर्म परिवर्तन (Religion change) मात्र से जनजातीय दर्जा स्वतः समाप्त नहीं होता, लेकिन यह तय करना तथ्य का प्रश्न है कि व्यक्ति ने समुदाय की परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक जुड़ाव को कायम रखा या नहीं. कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहीं कि उन्होंने भुइयां समुदाय से निरंतरता बनाए रखी.

इसे भी पढ़ें….मैरिज रजिस्ट्रेशन से पहले वर-वधू की उम्र का सत्यापन जरूरी, फिर कैसे हो रहा है बाल विवाह: इलाहाबाद हाई कोर्ट

कोर्ट ने अख्लाक हुसैन मामले (2020) का हवाला देते हुए कहा कि कानून द्वारा प्रतिबंधित हस्तांतरण को पंजीकरण, राजस्व अभिलेख में दर्ज होने या वर्षों तक कब्जे में रहने से भी वैध नहीं ठहराया जा सकता. कोर्ट ने विलंब और प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की दलीलें भी खारिज कर दीं और कहा कि उप जिलाधिकारी के आदेश में कोई क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं है. 14 सितंबर 2026 को दिए फैसले में तीनों याचिकाएं खारिज करते हुए 22 जनवरी 2026 के आदेशों को बरकरार रखा.

इसे भी पढ़ें….सपा सांसद इकरा हसन के खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन में चल रही केस प्रोसीडिंग पर हाई कोर्ट ने लगायी रोक

कानून का कोई ऐसा सामान्य नियम नहीं है, जिसके तहत कोई व्यक्ति केवल धर्म बदलने (Religion change) के कारण अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं रह जाता. धर्म परिवर्तन (Religion change) के बाद भी कोई व्यक्ति जनजाति का सदस्य बना रह सकता है. यह असल में तथ्यों का सवाल है जिसे जनजाति की विशेषताओं, रीति-रिवाजों, परंपराओं और जनजातीय समुदाय के साथ लगातार बने रहने वाले जुड़ाव के आधार पर तय किया जाना चाहिए.
बेंच ने की टिप्पणी

इसे भी पढ़ें….बच्चा गवाह के बयान पर सजा सुनाया जाना संभव लेकिन संदेह होने पर भरोसेमंद सबूतों का महत्व ज्यादा, 41 साल बाद हत्या के आरोप बरी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *