बिना Notice दिए उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 38(1) के तहत पारित आदेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाई रोक

बिना Notice दिए एक महिला के खिलाफ राजस्व अभिलेखों में सुधार से जुड़े फैसले महराजगंज जिले के एसडीएम नौतनवां के आदेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है. याचिकाकर्ता सुमिंत्रा देवी ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 38(1) के तहत पारित आदेश को चुनौती दी थी. याचिका के अनुसार, यह आदेश तहसीलदार की रिपोर्ट के आधार पर, प्रतिवादी संख्या 5 के आवेदन पर पारित किया गया था, लेकिन याचिकाकर्ता को न तो कोई Notice भेजा गया और न ही उसे सुनवाई का कोई अवसर दिया गया.
राज्य सरकार की ओर से स्थायी अधिवक्ता ने प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए कहा कि यह आदेश अपीलीय है, इसलिए याचिका सुनवाई योग्य नहीं है. लेकिन याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जब सुनवाई का अवसर ही नहीं दिया गया, तो वैकल्पिक उपचार याचिका पर सुनवाई में बाधा नहीं बन सकता.
जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की एकल पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के व्हर्लपूल कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम रजिस्ट्रार ऑफ ट्रेडमार्क्स, मुंबई (1998) मामले में प्रतिपादित सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि मामले की प्रकृति और संक्षिप्त तर्कों को देखते हुए इसे नए सिरे से सुनना उचित होगा, बशर्ते प्रतिवादियों को भी सुनवाई का अवसर दिया जाए.
कोर्ट ने विपक्षी को Notice जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगा है.मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर 2026 को नए सिरे से होगी और उप जिलाधिकारी, नौतनवा द्वारा 15 दिसंबर 2025को पारित मूल आदेश के प्रभाव और क्रियान्वयन पर रोक लगा दी गई है. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अतुल कुमार पांडेय ने पैरवी की.
मेसर्स गौरसन्स हाई-टेक इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को जारी डिमांड Notice की कार्रवाई पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लगायी रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस प्रकाश पाडिया और जस्टिस सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण द्वारा मेसर्स गौरसन्स हाई-टेक इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को जारी डिमांड Notice की कार्रवाई पर रोक लगा दी है और राज्य सरकार सहित विपक्षियों से जवाब मांगा है. याचिकाकर्ता कंपनी ने प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालक अधिकारी द्वारा 18 मई, 17 जुलाई और 9 सितंबर 2026 को जारी तीन डिमांड Notice को रद्द करने की मांग की थी.
कंपनी की ओर से अधिवक्ता रोहन गुप्ता ने अदालत को बताया कि Notice का जवाब 10 सितंबर 2026 को ही प्राधिकरण कार्यालय में जमा कर दिया गया था. सबसे अहम बात यह रही कि 9 सितंबर के अंतिम Notice में होटल में रह रहे व्यक्तियों को तीन दिन के भीतर हटाने का निर्देश दिया गया था, अन्यथा पट्टा निरस्त करने की चेतावनी दी गई थी. याचिका के अनुसार बिना किसी Notice या सुनवाई के मौके के परिसर की तीन जगहों को सील कर दिया गया.

अदालत ने प्राधिकरण की वकील अंजलि उपाध्याय से पूछा कि क्या सीलिंग से पहले कोई Notice दिया गया था. इस पर उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसा कोई नोटिस कभी नहीं दिया गया. कोर्ट ने पाया कि 9 सितंबर के Notice में सीलिंग का कहीं जिक्र ही नहीं था, फिर भी उसी नोटिस के आधार पर परिसर सील कर दिया गया. कोर्ट ने कहा कि प्राधिकरण कारण बताओ Notice की सीमा से आगे नहीं जा सकते.
इस सिद्धांत के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया गया, जिनमें कहा गया था कि विभाग नोटिस में न दर्शाए गए आधार पर कार्रवाई नहीं कर सकता. सुनवाई के दौरान निर्देश लेने के बाद प्राधिकरण की अधिवक्ता ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि परिसर को तुरंत सील मुक्त कर दिया जाएगा और याचिकाकर्ता के जवाब पर सुनवाई कर उचित आदेश पारित किया जाएगा.
दोनों पक्षों की सहमति से कोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता दो सप्ताह के भीतर नोटिसों का विस्तृत जवाब दाखिल करेगा. प्राधिकरण उसके बाद तीन सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार उचित आदेश पारित करेगा. अगले छह सप्ताह तक या जवाब पर निर्णय होने तक, जो भी पहले हो, याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई भी उत्पीड़नात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी.