Adoption की वैध कानूनी जरूरतें पूरी तो बायोलॉजिकल पिता का अपने नाजायज बच्चे को गोद लेना गैर कानूनी नहीं

बच्चे को Adoption के लिए निर्धारित प्रक्रियाओं को पूरा किया गया है तो किसी हिंदू पुरुष को, केवल नाजायज बच्चे का बायोलॉजिकल पिता होने के कारण, Hindu Adoption and Maintenance Act, 1956′ के तहत ऐसे Adoption से नहीं रोक नहीं है. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने सीपीसी की धारा 100 के तहत दाखिल सेकंड अपील को खारिज कर दिया है और ट्रायल कोर्ट के साथ निचली अपीलीय अदालत द्वारा सुनाये गये आदेश को बरकरार रखा है.
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के तहत यह दूसरी अपील निचली अदालतों के एक जैसे फैसलों के खिलाफ दाखिल की गयी थी. इन फैसलों के तहत वादी-प्रतिवादी द्वारा सेल डीड को रद्द करने के लिए दायर मुकदमे को स्वीकार कर लिया गया था. यह फैसला ट्रायल कोर्ट द्वारा 16.08.1979 को दिया गया था और निचली अपीलीय अदालत ने 02.02.1980 को इसे बरकरार रखा था. बेसिकली यह विवाद कुछ कृषि भूखंडों से संबंधित है जो वादी के अनुसार, बदलू की भूमिधारी जोत थे. कहा जाता था कि बदलू आर्य समाज के सिद्धांतों को मानने वाले थे.
वादी, राम केश, ने दावा किया कि वह बदलू का जैविक पुत्र था जो उस समय बुध राम से विवाहित थी. वादी का जन्म उस विवाह के दौरान उसकी माँ और बदलू के बीच संबंधों से हुआ था. बाद में बदलू ने अपना बेटा गोद (Adoption) ले लिया था. वादी ने आरोप लगाया कि बदलू के गोद (Adoption) लिए हुए बेटे का दर्जा होने के बावजूद, प्रतिवादियों ने बदलू की स्थिति का फायदा उठाया. वे उसे इलाज के बहाने ले गए और उसके बाद विवादित कृषि भूमि के संबंध में अपने पक्ष में 18.06.1973/19.06.1973 का बिक्री विलेख हासिल कर लिया.
प्रतिवादियों ने कथित गोद लेने (Adoption) की बात पर भी विवाद किया और परिवार रजिस्टर में वादी के संबंध में उचित प्रविष्टि न होने का हवाला दिया
प्रतिवादी-अपीलकर्ताओं ने मुकदमे का विरोध किया. उनका मुख्य तर्क यह था कि बदलू ने स्वेच्छा से और जानबूझकर बिक्री विलेख निष्पादित किया था. वादी बदलू का गोद लिया (Adoption) हुआ बेटा नहीं था इसलिए उसे मुकदमा चलाने का कोई अधिकार नहीं था. प्रतिवादियों ने कथित गोद लेने (Adoption) की बात पर भी विवाद किया और परिवार रजिस्टर में वादी के संबंध में उचित प्रविष्टि न होने का हवाला दिया.
ट्रायल कोर्ट ने मामले के मुख्य मुद्दों को तय करने के बाद यह माना कि वादी बदलू का गोद लिया हुआ (Adoption) बेटा था और इसलिए उसे मुकदमा करने का अधिकार था. कोर्ट ने यह भी माना कि विवादित सेल डीड (बिक्री विलेख) बदलू का वैध काम नहीं था और इसे रद्द किया जाना चाहिए, और इसी के अनुसार वादी के पक्ष में फैसला सुनाया.
कोर्ट ने 28.07.1980 के अपने आदेश से मौजूदा दूसरी अपील को स्वीकार करते हुए, फैसले के लिए कानून के निम्नलिखित महत्वपूर्ण सवाल तय किए:
(i) क्या कोई व्यक्ति अपने ही नाजायज बेटे को गोद (Adoption) ले सकता है?
(ii) क्या निचली दोनों अदालतों का यह निष्कर्ष कि संबंधित सेल डीड कीमत के लिए सही ढंग से निष्पादित नहीं किया गया था, कानूनी रूप से गलत है?
कोर्ट में तर्क दिया गया कि हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत किसी नाजायज बच्चे को उसके असली पिता द्वारा गोद लेना (Adoption) मान्य नहीं था, क्योंकि इस अधिनियम के अनुसार, गोद दिए जाने वाले बच्चे का अपने असली माता-पिता के परिवार से रिश्ता खत्म हो जाना चाहिए. इस मामले में, असली पिता खुद अपने नाजायज बेटे को गोद लेता है, जो अधिनियम की धारा 12 के प्रावधानों के खिलाफ है.
यह भी तर्क दिया गया है कि धारा 9 के अनुसार, मां बच्चे को गोद तभी दे सकती है जब पिता की सहमति हो, सिवाय तब जब पिता की मृत्यु हो गई हो, उसने पूरी तरह और हमेशा के लिए दुनिया छोड़ दी हो, या वह हिंदू न रहा हो. इसलिए, याचिकाकर्ता को उसकी मां द्वारा उसके पिता के पक्ष में गोद लेना (Adoption) कानूनन मान्य नहीं था. इसके अलावा यह तर्क दिया गया कि डिस्ट्रिक्ट जज द्वारा एक्ट की धारा 9(4) को लागू करने के पीछे दिए गए तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि गोद लेने की कथित घटना के समय यह प्रावधान लागू नहीं था.
कोर्ट के सामने पहला सवाल उस कानूनी प्रावधान की जांच करने की मांग करता है जो कथित गोद लेने की तारीख को लागू था. वादी द्वारा बताए गए गोद लेने की घटना 1970 की थी. इसलिए, उस समय लागू कानून Hindu Adoption and Maintenance Act, 1956′ था.
बेंच ने कहा कि अपीलकर्ताओं का तर्क इस धारणा पर आधारित है कि सिर्फ इस तथ्य से कि बदलू वादी का असली या कथित पिता था, उसके लिए वादी को गोद लेना (Adoption) कानूनी रूप से असंभव हो गया था. मैं इस बात को नहीं मान सकता. इस एक्ट में ऐसी कोई रोक नहीं है. इसके उलट, सेक्शन 10, जो गोद लिए जा सकने वाले लोगों के बारे में बताता है, किसी नाजायज बच्चे को सिर्फ उसके नाजायज होने के आधार पर बाहर नहीं करता.
एक्ट का सेक्शन 2 (bb) खुद, अपने लागू होने के मकसद से, जायज या नाजायज बच्चों को साफ तौर पर मान्यता देता है. सेक्शन 10 बताता है कि गोद लिए जाने (Adoption) वाले व्यक्ति को हिंदू होना चाहिए, उसे पहले गोद नहीं लिया गया होना चाहिए, उसकी शादी नहीं हुई होनी चाहिए और आम तौर पर उसकी उम्र पंद्रह साल से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए. कानूनी अयोग्यताओं में नाजायज होने का जिक्र कहीं नहीं है.
सेक्शन 11(i) पर आधारित तर्क भी अपील करने वालों की मदद नहीं करता. सेक्शन 11(i), बेटे को गोद लेने के मामले में, गोद लेने वाले पिता या माँ को ऐसे हिंदू बेटे, बेटे के बेटे या बेटे के बेटे के बेटे के होने से रोकता है जो Adoption के समय जीवित हों, चाहे वे जायज खून के रिश्ते से हों या गोद लेने से. इस तरह कानूनी भाषा खास तौर पर जायज खून के रिश्ते या गोद लेने का जिक्र करती है. यह नाजायज बेटे के होने को सेक्शन 11(i) के तहत कानूनी अयोग्यता नहीं मानती.
निचली अदालतों द्वारा एकमत से स्वीकार किए गए सबूतों के आधार पर, वादी को गोद लेने की प्रक्रिया साबित हो गई थी. जिला न्यायाधीश द्वारा धारा 9(4) का जिक्र करना सही कानूनी आधार नहीं था; फिर भी, यह अंतिम निष्कर्ष कि वादी को बडलू ने कानूनी रूप से गोद लिया था, उस गोद लेने की घटना पर लागू तथ्यों और कानून के आधार पर सही ठहराया जा सकता है.
SECOND APPEAL No. – 1210 of 1980 Budhi Ram And Others V/s Ram Kesh