विकसित भारत 2047 के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नीति जरूरी: Justice Vinod Diwakar

इलाहाबाद हाई कोर्ट के Justice विनोद दिवाकर ने कहा है कि विकसित भारत 2047 के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नीति का निर्माण किया जाना चाहिए. इंडिया हैबिटेट सेंटर स्थित गुलमोहर हॉल में न्यायिक सुधार और संवैधानिक नैतिकता विषय पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए Justice दिवाकर ने यह बात कही. प्रोग्राम आईआईटी एलुमनाई काउंसिल द्वारा आयोजित किया गया था. “वर्ल्ड विजडम कनेक्ट” पहल की पहली कड़ी “समर्थ भारत” के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि विचार रखे.
Justice दिवाकर ने कहा कि 2047 तक विकसित भारत का सपना कोई “बड़ा सपना” नहीं, बल्कि बड़े आकार का चोला पहना एक छोटा सपना है. सपने का आकार महत्वाकांक्षा की विशालता के बराबर नहीं होता. यह हमारी अच्छाई की अभिव्यक्ति है, न कि आत्म-प्रशंसा. बड़े सपने देखने का अर्थ है खुद को दुनिया के सामने उजागर करना, असफलता और मूर्खता का जोखिम उठाना. उन्होंने जोर देकर कहा कि बड़े सपने केवल प्रतिभा और संसाधनों से नहीं, बल्कि अनुशासन के साथ प्रतिदिन ऊर्जा बढ़ाने से पूरे होते हैं.
Justice दिवाकर ने कहा कि न्यायपालिका केवल संविधान की संरक्षक नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता की आधारशिला है. उन्होंने बताया कि अदालतों की दक्षता सीधे व्यापार सुगमता, नियामक अनुपालन और विवाद समाधान को प्रभावित करती है. उनके अनुसार कोई भी राष्ट्र केवल उत्पादन या धन संचय से आत्मनिर्भर नहीं बनता, असली विकसित राष्ट्र कानून के शासन, न्यायिक अखंडता और संस्थाओं में जनविश्वास पर टिका होता है.
उन्होंने लगभग 2,325 वर्ष पूर्व कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख किया, जिसमें राज्य के सात अंगों राजा, मंत्री, जनपद, दुर्ग, कोष, दंड और मित्र तथा धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन जैसे कानून के चार स्रोतों का वर्णन है. उन्होंने अर्थशास्त्रकार एंगस मैडिसन के हवाले से बताया कि अंग्रेजों के आगमन तक भारत विश्व की जीडीपी में लगभग 25-27 प्रतिशत का योगदान देता था.
पश्चिम की ओर मुड़ते हुए उन्होंने सुकरात के मुकदमे, प्लेटो और अरस्तू की परंपरा, तथा सिकंदर और राजा पोरस के बीच झेलम नदी के युद्ध का उल्लेख किया. उन्होंने जॉर्ज ग्रोट की “संवैधानिक नैतिकता” की अवधारणा और डॉ. बीआर अंबेडकर द्वारा संविधान सभा में इसके उल्लेख को याद करते हुए कहा कि यह नैतिकता स्वाभाविक नहीं, बल्कि सायास विकसित करनी होती है.
Justice दिवाकर ने “ऑक्सफोर्ड हैंडबुक ऑफ कंपैरेटिव जुडिशियल बिहेवियर” का हवाला देते हुए कहा कि न्यायाधीशों का व्यवहार केवल कानून से नहीं, बल्कि जाति, धर्म, पहचान और उनकी संज्ञानात्मक सोच से भी प्रभावित होता है. उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायिक प्रणाली की असली चुनौती लंबित मामलों या न्यायाधीशों की कमी नहीं, बल्कि न्यायिक नवाचार के परिणाम और न्यायाधीशों के निर्णयों के प्रभाव हैं. उन्होंने न्यायिक नियुक्तियों में वंशवाद, भाई-भतीजावाद और जातिवाद जैसी आलोचनाओं का भी उल्लेख किया.
उन्होंने बताया कि भारत विश्व बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में 2014 के 142वें स्थान से 2020 में 63वें स्थान पर पहुंचा, लेकिन “एनफोर्सिंग कॉन्ट्रैक्ट्स” श्रेणी में अब भी निचले पांच देशों में शामिल है, जहां 81.1 प्रतिशत मामलों को निपटने में पांच वर्ष से अधिक और 57 प्रतिशत को दस वर्ष से अधिक समय लगता है. Justice दिवाकर ने क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के 2025 सर्वेक्षण का हवाला दिया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए पसंदीदा स्थान के रूप में लंदन शीर्ष पर रहा, जबकि भारत को महज 2 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने चुना.
Justice दिवाकर ने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य के लिए “न्याय प्रशासन हेतु राष्ट्रीय न्यायिक नीति” बनाई जानी चाहिए
Justice दिवाकर ने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य के लिए “न्याय प्रशासन हेतु राष्ट्रीय न्यायिक नीति” बनाई जानी चाहिए, जो देश के 25 उच्च न्यायालयों, 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में संरचनात्मक और प्रक्रियात्मक एकरूपता ला सके. इसके साथ ही उन्होंने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए निरंतर क्षमता-निर्माण कार्यक्रमों की आवश्यकता पर भी बल दिया, ताकि संवैधानिक नैतिकता को बढ़ावा मिले और व्यक्तिगत तथा संस्थागत व्यवहार में तालमेल बन सके.
कहा कि संवैधानिक अदालतों में न्यायिक नियुक्तियां किसी चालाकीपूर्ण एल्गोरिदम की उपज नहीं होतीं .बल्कि ये देश की वैचारिक दिशा, समाज और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी विश्वसनीयता को आकार देती हैं.
वर्ल्ड विजडम कनेक्ट आईआईटी एलुमनाई काउंसिल की एक राष्ट्रीय पहल है, जो विकसित भारत की आकांक्षा के इर्द-गिर्द निर्मित है और चार प्रश्नों पर आधारित है समर्थ (क्षमता और आत्मनिर्भरता), समृद्ध (प्रचुरता और समृद्धि), स्वस्थ (स्वास्थ्य और समग्रता), और सर्वोदय (सबका उत्थान). आईआईटी एलुमनाई काउंसिल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के स्नातकों का एक समूह है, जो नेटवर्क की विशेषज्ञता, पूंजी और पहुंच को भारत के दीर्घकालिक राष्ट्रीय विकास की दिशा में लगाने का कार्य करता है.