फर्जी Remand Order पेश करने पर हाई कोर्ट ने दिया वकील समेत कई लोगों पर 2 सप्ताह में एफआईआर दर्ज करने का आदेश

सुनवाई के दौरान न्यायालय के समक्ष दो अलग-अलग Remand Order दिनांक 03.मई 2026 प्रस्तुत हुए. एक Remand Order याचिका के साथ और दूसरा Remand Order राज्य सरकार की काउंटर एफिडेविट के साथ. दोनों Remand Order में अंतर पाए जाने पर पीठ ने मामले की तह तक जाने के लिए रिमांड मजिस्ट्रेट के न्यायालय से रिकॉर्ड तलब किया था.
जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ के आदेश पर ललितपुर के जिला न्यायाधीश ने अपर जिला एवं सत्र/विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) से Remand Order की विस्तृत जांच कराई. 29 जून 2026 की जांच रिपोर्ट में पाया गया कि: असली Remand Order वही है जिस पर पीठासीन अधिकारी और अभियुक्त के हस्ताक्षर मौजूद हैं, जो काउंटर एफिडेविट के साथ पन्ना संख्या 18-19 पर दाखिल था.
Remand Order की यह प्रतिलिपि नकल विभाग से जारी प्रमाणित प्रति नहीं थी
याचिका के साथ लगाया गया प्रपत्र केवल एक अहस्ताक्षरित प्रोफार्मा रिमांड शीट है, जिसे आदेश के रूप में पेश किया गया. Remand Order की यह प्रतिलिपि नकल विभाग से जारी प्रमाणित प्रति नहीं थी, बल्कि बिना उचित प्रक्रिया अपनाए प्राप्त की गई एक छायाप्रति थी, जिस पर बाद में ओथ कमिश्नर की मुहर लगाई गई.

जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अनुपम वर्मा ने जानबूझकर अनाधिकृत तरीके से यह Remand Order प्रपत्र प्राप्त कर, इसे आदेश के रूप में हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत कर न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास किया.
गंभीरता को देखते हुए खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अनुपम वर्मा, जितेंद्र सिंह निरंजन और जिला न्यायालय ललितपुर के कुछ कर्मचारी Remand Order की जालसाजी और उसकी फर्जी प्रमाणित प्रति जारी कराने में शामिल पाए गए हैं. कोर्ट ने निर्देश दिया कि: जिला न्यायाधीश, ललितपुर, दो सप्ताह के भीतर सभी संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराएं.
दोषी पाए गए न्यायालय कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही शुरू की जाए. पुलिस जांच हेतु याचिका का समस्त रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाए. जिला न्यायाधीश एक माह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट न्यायालय को सौंपें. मामले की अगली सुनवाई अब 10 अगस्त 2026 को निर्धारित की गई है.
हत्या के मामले में आरोपी बरी, गवाहों की मौजूदगी पर उठाए सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा जिले के एक हत्या मामले में दोषी ठहराए गए अपीलकर्ता चुनुबाद को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है. जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस चवन प्रकाश की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया. मामला 1986 का है, जब बांदा के कमासिन थाना क्षेत्र में सहेंद्रपाल नामक व्यक्ति का अपहरण कर उसकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी और शव को जला दिया गया था.
ट्रायल कोर्ट ने केदार, बहादुर और चुनुबाद को धारा 148, 364, 302 और 201 आईपीसी के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. अपील के दौरान केदार और बहादुर की मृत्यु हो गई, जिसके बाद यह अपील केवल चुनुबाद तक सीमित रह गई.
हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के दोनों प्रत्यक्षदर्शी गवाह राजेश और भोला मृतक के रिश्तेदार थे और दोनों परिवार के बीच पुरानी आपराधिक रंजिश का इतिहास था, जिससे वे “हितबद्ध गवाह” की श्रेणी में आते हैं. अदालत ने यह भी नोट किया कि घटना स्थल तक गवाहों के साथ गए अन्य स्वतंत्र गवाहों महेश और राज करण को अभियोजन ने पेश नहीं किया, जो पुष्टिकारक साक्ष्य के अभाव को दर्शाता है.
कोर्ट ने घटनाक्रम को भी अविश्वसनीय पाया हथियारबंद अपराधियों द्वारा धमकी देने के बावजूद गवाहों का पीछा करना और अपराधियों का उन्हें जीवित छोड़ देना स्वाभाविक व्यवहार नहीं लगता. इन परिस्थितियों के आधार पर अदालत ने माना कि गवाहों की घटनास्थल पर मौजूदगी ही संदिग्ध है, जिससे पूरा अभियोजन पक्ष कमजोर पड़ गया. कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया और चुनुबाद को सभी आरोपों से बरी कर दिया.