Trial Court भरण-पोषण (125 Cr. Pc) तय करते समय पत्नी की इनकम जरूर जांचे, रिविजनल कोर्ट के पास मेंटेनेंस बढ़ाने के दावे के लिए नए सबूतों का मूल्यांकन का अधिकार नहीं
आय के संबंध में जानकारी छिपाने वाली पत्नी को दी जाने वाली मेंटेनेंस की राशि पर हाई कोर्ट ने लगाई रोक, बेटे को मिलती रहेगी राशि

भरण-पोषण के मामलों में फैसला लेने से पहले Trial Court का यह दायित्व है कि वह विवाद करने वाले पक्षों को उनकी आय, संपत्ति और देनदारियों के संबंधित हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दे. इसका पालन न करने वाले पक्ष के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अचल सचदेवा की बेंच ने पति की तरफ से दायर आपराधिक रिविजन याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए Trial Court द्वारा पत्नी को दिए गए भरण-पोषण के आदेश को रद्द कर दिया. कोर्ट ने बेटे के लिए भरण पोषण की राशि में कोई चेंज नहीं किया है.
यह क्रिमिनल रिवीजन एडिशनल प्रिंसिपल जज फैमिली कोर्ट (Trial Court) इटावा द्वारा केस नंबर 380/2022 (आशी वर्मा और अन्य बनाम गौरव वर्मा) में दिए गए एक ही फैसले और आदेश के खिलाफ दायर किया गया था. यह केस 125 Cr.P.C. के तहत थाना कोतवाली इटावा में दर्ज था. दोनों रिवीजन एक ही फैसले से जुड़े थे इसलिए अलग-अलग नतीजों की संभावना को खत्म करने के लिए कोर्ट ने एक ही आदेश के जरिए फैसला सुनाया.
क्रिमिनल रिवीजन नंबर 4251/2024 दाखिल करने वाला Trial Court में विरोधी पक्ष था ने 16.07.2024 के आदेश से नाराज होकर दायर किया है. इस आदेश के तहत, धारा 125 के तहत दायर अर्जी मंजूर कर ली गई थी. Trial Court ने रिवीजन करने वाले को निर्देश दिया था कि वह आवेदक श्रीमती आशी वर्म को 8,000 रुपये प्रति माह बेटे यजुर वर्मा को 5,000 रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता दे.
क्रिमिनल रिवीजन नंबर 5177/2024 के तहत अर्जी में पुनरीक्षणकर्ता ने 16.07.2024 Court के विवादित आदेश में संशोधन की मांग की थी. यह संशोधन पत्नी और बेटे के लिए मंजूर की गयी भरण-पोषण राशि में वृद्धि की मांग की गयी थी. इसमें ट्रायल कोर्ट के आदेश की वैधता को चुनौती नहीं दी गई थी.
तथ्यों के अनुसार श्रीमती आशी वर्मा ने अपनी और अपने अवयस्क पुत्र के लिए पति गौरव शर्मा के विरुद्ध Cr.PC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग करते हुए एक आवेदन प्रस्तुत किया. कहा गया कि उनका विवाह 08.12.2010 को हिंदू रीति-रिवाजों और संस्कारों के अनुसार हुआ था. उनके माता-पिता ने विवाह के अवसर पर उपहार और दहेज के रूप में एक चार-पहिया वाहन, नकद राशि, आभूषण तथा अन्य वस्तुएं दी थीं, जिस पर विवाह में लगभग 30,00,000/- रुपये का व्यय हुआ था.
आरोप लगाया गया कि उनके निजी उपयोग के लिए दिए गए आभूषण उनके ससुराल वालों ने उनसे छीन लिए थे और विवाह के बिल्कुल प्रारंभ से ही उनके ससुराल वाले उन पर इस बात का दबाव डाल रहे थे कि वह अपने पिता से कहकर संपत्ति अपने पति के नाम हस्तांतरित करवाएं.
उसके पिता अपने दामाद प्रति माह 20,000/- रुपये की राशि देते आ रहे थे. वर्ष 2021 में उनके पति ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया जिसके उपरांत उन्होंने अपने मायके में शरण ली. इस मामले को सुलझाने हेतु एक पंचायत बुलाई गई और 20,00,000/- रुपये भुगतान के बाद उसे उसके ससुराल वापस ले जाया गया लेकिन उसके बाद भी उसके साथ क्रूरता जारी रही और उस पर लगातार यह दबाव डाला जाता रहा कि वह अपने पिता को अपनी संपत्ति अपने पति के नाम करने के लिए राजी करे.

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान पति की ओर से तर्क दिया गया कि पत्नी ने Trial Court से अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में जरूरी तथ्य छिपाए थे. पत्नी की अपनी एक अच्छी-खासी स्वतंत्र आय है जो इनकम टैक्स रिटर्न और संपत्ति की जानकारी देने वाले दस्तावेजों से प्रमाणित है. दस्तावेज साबित करते हैं कि वह अपना गुजारा करने में पूरी तरह सक्षम है.
पति अपने पिता की जगह पर एक रेस्टोरेंट चलाता था और उसकी मासिक आय सीमित थी, जो पत्नी की दर्ज आय से भी कम थी. पति ने अपने नाबालिग बेटे का भरण-पोषण करने पर कोई आपत्ति नहीं जताई और बच्चे के पक्ष में तय की गई गुजारा भत्ता राशि देने के लिए अपनी पूरी सहमति जताई.
आरोप लगाया गया कि पत्नी ने बिना किसी उचित कारण के अपनी मर्जी से वैवाहिक घर छोड़ दिया था और उसके परिवार वालों ने पति और उसके बुज़ुर्ग माता-पिता पर बेवजह दबाव डालने के लिए ही उनके खिलाफ झूठे और गंभीर आपराधिक मामले दर्ज करवाए थे.
इसके विपरीत पत्नी की ओर से तर्क दिया गया कि दहेज की बढ़ती माँगों के कारण शारीरिक और मानसिक क्रूरता का शिकार होना पड़ा, जिसका नतीजा यह हुआ कि उसे जबरदस्ती वैवाहिक घर से निकाल दिया गया. दावा किया गया कि पत्नी के पास गुजारे या आर्थिक सहायता का कोई स्वतंत्र जरिया नहीं था. अपना गुजारा करने तथा अपने नाबालिग बच्चे को पालने-पोसने के लिए वह पूरी तरह से अपने पिता की मदद पर निर्भर थी.
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने पाया कि Supreme court द्वारा ‘रजनीश बनाम नेहा’ मामले में तय किए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार—गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में दोनों पक्षों के लिए अपनी संपत्ति, आय और देनदारियों के बारे में पूरी और सच्ची जानकारी देते हुए एक हलफनामा दायर करना अनिवार्य है.
यह सख्त नियम तथ्यों को छिपाने, बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने और बेवजह के मुकदमों को रोकने के लिए लागू किया गया था. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यह हलफनामा केवल एक औपचारिकता नहीं बल्कि यह उचित गुजारा भत्ता तय करने का एक मुख्य आधार है और तथ्यों को छिपाने या गलत जानकारी देने के रूप में इस नियम का कोई भी उल्लंघन करने पर गंभीर कानूनी और दंडात्मक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.
रिकॉर्ड की जाँच करने पर हाई कोर्ट ने पाया कि पत्नी की आर्थिक स्थिति के संबंध में रिकॉर्ड में ही एक बहुत बड़ी विसंगति मौजूद थी. एक तरफ उसने Trial Court में दायर हलफनामे में अपनी आय “शून्य” बताई थी, दूसरी तरफ उसने उसी समय हाई कोर्ट में दायर एक ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका’ के साथ अपने ‘नेट वर्थ’ का प्रमाण पत्र और इनकम टैक्स रिटर्न भी जमा किए थे, जिनमें उसकी वार्षिक आय काफी अच्छी-खासी दिखाई गई थी.
हाई कोर्ट ने कहा कि Trial Court ने पति द्वारा पेश किए गए इस महत्वपूर्ण दस्तावेजी सबूत को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया
हाई कोर्ट ने कहा कि Trial Court ने पति द्वारा पेश किए गए इस महत्वपूर्ण दस्तावेजी सबूत को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया, उस पर चर्चा नहीं की और उसका कोई जिक्र भी नहीं किया जो कि न्यायिक विवेक का स्पष्ट रूप से इस्तेमाल न करने के बराबर था. हाई कोर्ट ने कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि केवल कुछ स्वतंत्र आय होने से ही कोई पत्नी, Cr.PC. की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा करने के अधिकार से स्वतः ही वंचित नहीं हो जाती; बशर्ते कि ऐसी आय उसके वैवाहिक घर में बिताई गई जीवनशैली के अनुसार उसका गुजारा करने के लिए अपर्याप्त हो.
कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी द्वारा अलग-अलग न्यायिक मंचों पर लिए गए विरोधाभासी रुख को देखते हुए Trial Court का यह कानूनी दायित्व था कि वह सबूतों की गहन जाँच करे और उन खुलासों के बीच सामंजस्य स्थापित करे. महत्वपूर्ण वित्तीय संकेतकों का मूल्यांकन करने में Trial Court की विफलता ने विवादित आदेश को अत्यधिक कमजोर बना दिया.
कोर्ट ने टिप्पणी की कि पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार के दायरे के संबंध में उसकी शक्तियाँ विशुद्ध रूप से पर्यवेक्षी प्रकृति की हैं, न कि अपीलीय प्रकृति की. एक पुनरीक्षण न्यायालय किसी आदेश की वैधता, औचित्य, या क्षेत्राधिकार संबंधी शुद्धता की जाँच तो कर सकता है, लेकिन वह आमतौर पर भरण-पोषण की राशि को बढ़ाने या घटाने के लिए अपने स्वयं के तथ्यात्मक निष्कर्षों को उस आदेश के स्थान पर प्रतिस्थापित नहीं कर सकता.
गुजारा भत्ते में किसी भी बदलाव या बढ़ोतरी के लिए, मूल रूप से बदली हुई परिस्थितियों का सबूत देना जरूरी है, जिसके लिए नए सबूतों की जाँच की जानी चाहिए. इसके लिए, दोनों पक्षों के पास Trial Court में Cr.P. की धारा 127 के तहत एक वैकल्पिक उपाय मौजूद है. “भले ही दोनों पक्षों ने अपने हलफनामे जमा कर दिए हों, फिर भी कोर्ट को गुजारा भत्ते की रकम तय करते समय, उन हलफनामों में दिए गए बयानों और उनके समर्थन में पेश किए गए दस्तावेजी सबूतों पर जरूर विचार करना चाहिए.
कोर्ट ने कहा कि इस तरह के विचार का अभाव साफ तौर पर यह दिखाता है कि फैसला जल्दबाजी में लिया गया है और इसमें जरूरी दिशा-निर्देशों को नजरअंदाज किया गया है. जहाँ कोर्ट ने मानी हुई आय को नजरअंदाज़ करके, रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों के बिना ही अपना कोई निष्कर्ष निकाल लिया हो, वहाँ रिविजनल कोर्ट दखल दे सकता है, गुजारा भत्ते की रकम पर दिए गए फ़ैसले को बदल सकता है और उस गलती को सुधार सकता है.
नतीजतन, हाई कोर्ट ने कहा कि जहाँ Trial Court के उस आदेश में कोई गड़बड़ी या गैर-कानूनी बात नहीं थी, जिसमें नाबालिग बेटे को दिए गए गुजारा भत्ते के अधिकार और रकम को सही ठहराया गया था, वहीं पत्नी को गुजारा भत्ता देने वाले आदेश के हिस्से पर पूरी तरह से दोबारा विचार करने की जरूरत थी. हाई कोर्ट ने मामले को Trial Court में वापस भेज दिया है ताकि तय दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए, पत्नी की असल संपत्ति, देनदारियों और आय का ठीक से आकलन करके, पति-पत्नी के गुजारा भत्ते के बारे में एक नया और तर्कसंगत फैसला लिया जा सके.
भरण-पोषण की राशि बढ़ाने के लिए परिस्थितियों में आए बदलावों का सबूत देना अनिवार्य है, जिसमें नए सबूत पेश करना और उनका मूल्यांकन करना शामिल है. रिविजनल कोर्ट के पास इस तरह का मूल्यांकन करने की शक्ति नहीं होती है.
यदि Trial Court के समक्ष आवेदक ने विपक्षी पक्ष की शुद्ध आय के संबंध में कोई ठोस या स्पष्ट सबूत पेश किए बिना केवल मौखिक दलील दी है तो ट्रायल कोर्ट के लिए उचित निश्चितता के साथ भरण-पोषण की राशि का आकलन करना लगभग असंभव हो जाता है ताकि वह न्यायसंगत भरण-पोषण का आदेश दे सके. ऐसी स्थिति में, आवेदक और विपक्षी पक्ष द्वारा दाखिल किए गए आय, संपत्ति और देनदारियों के हलफनामे अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं.
बेंच ने निष्कर्ष जजमेंट में कोट कराया
CRIMINAL REVISION No. – 4251 of 2024; Gaurav Verma V/s State of U.P. and 2 others